अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की टैरिफ पॉलिसी ने पूरी दुनिया को झटका दिया है। ट्रंप बाकी दुनिया के साथ अमेरिका के रिश्ते को नए सिरे से गढ़ने के लिए टैरिफ का सहारा ले रहे हैं। यह पिछले कई दशकों से चले आ रहे ग्लोबल व्यापार नियमों के उलट है। हालांकि ट्रंप पहले ऐसे अमेरिकी राष्ट्रपति नहीं है, जिन्होंने ग्लोबल व्यापार नियमों को झटका दिया है। इनसे पहले अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने भी कुछ ऐसा किया था। रिचर्ड निक्सन ने 15 अगस्त 1971 को अचानक गोल्ड स्टैंडर्ड समाप्त करने का ऐलान करके पूरी दुनिया को चौंका दिया था। इस घटना को 'गोल्ड शॉक' के नाम से भी जाना जाता है। दुनिया उस समय भी उतनी ही हैरान थी जितनी आज है। अब ट्रंप के 'टैरिफ शॉक' की तुलना निक्सन के इसी 'गोल्ड शॉक' से की जा रही है।
निक्सन ने क्या किया था और क्यों?
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद 1944 में अमेरिकी डॉलर को सोने से जोड़कर एक स्थिर एक्सचेंज रेट तय की गई थी। वो दर थी 35 डॉलर प्रति औंस सोना। लेकिन जब निक्सन 1969 में राष्ट्रपति बने, तब तक दुनिया में मौजूद डॉलर की मात्रा, अमेरिका के कुल गोल्ड रिजर्व से चार गुना ज्यादा हो चुकी थी। इससे डॉलर का मूल्य कृत्रिम रूप से ऊंचा हो गया था, जिसके चलते अमेरिका का निर्यात महंगा और आयात सस्ता हो गया।
निक्सन ने महंगाई से जूझते हुए एक और साहसी कदम उठाया था। उन्होंने 90 दिनों के लिए वेतन और कीमतों पर फ्रीज लगा दिया, यानी इस दौरान कर्मचारियों के वेतन या सामानों के दाम नहीं बढ़ाए जा सकते हैं। ताकि डॉलर के अवमूल्यन से होने वाली महंगाई को रोका जा सके।
ट्रंप क्या कर रहे हैं और क्यों?
डोनाल्ड ट्रंप भी डॉलर को कमजोर करना चाहते हैं, बिना यह जोखिम उठाए कि डॉलर अपनी दुनिया की रिजर्व करेंसी की हैसियत खो दे। उनकी टैरिफ नीति का उद्देश्य घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देना, चीन जैसे देशों पर दबाव बनाना, और अमेरिका को फिर से महान बनाना है। उनका फोकस है: सेमीकंडक्टर, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, रिन्यूएबल एनर्जी, दुर्लभ खनिज और दवाइयों जैसे रणनीतिक क्षेत्रों में आत्मनिर्भरता हासिल करना।
1971 की तरह, आज भी अमेरिका को महंगाई और व्यापार घाटा जैसे आर्थिक संकटों से जूझना पड़ रहा है। उस दौर में वियतनाम जंग, सोवियत संघ से शीत युद्ध और इजराइल-फिलिस्तीन तनाव गहराया हुआ था। आज वैसा ही भू-राजनीतिक तनाव फिर दुनिया की अर्थव्यवस्था को अस्थिर कर रहा है।
टैरिफ का असर: निक्सन जैसा झटका?
निक्सन के फैसले के दो साल बाद, 1973 में OPEC देशों ने इजराइल का समर्थन करने वाले देशों को तेल का निर्यात रोक दिया। इससे पूरी दुनिया में तेल संकट और आर्थिक अस्थिरता फैल गई। 1976 में IMF को फ्लोटिंग एक्सचेंज रेट स्वीकार करनी पड़ी। यह एक बड़ा बदलाव था, जिसने ग्लोबल करेंसी सिस्टम को हमेशा के लिए बदल दिया। अब ट्रंप की टैरिफ नीति भी उसी तरह की ग्लोबल हलचल पैदा कर सकती है।
आम अमेरिकी पर क्या होगा असर?
निक्सन के दौर में, महंगाई 11 साल में 14% तक पहुंची। खर्च बढ़े, क्रय शक्ति गिरी, और 1980 तक शेयर बाजार ने असल में आधी वैल्यू खो दी (महंगाई को एडजस्ट करने के बाद)। ट्रंप का दावा है कि वो अमेरिका में नौकरियां वापस लाना चाहते हैं, जबकि मार्च 2025 में बेरोजगारी दर सिर्फ 4.2% है, यानी पहले से ही बहुत कम। मगर ट्रंप प्रवासी मजदूरों को बाहर निकालना चाहते हैं। ऐसे में अगर वो ग्लोबल सप्लाई चेन अमेरिका में शिफ्ट भी करवा लें, तो सवाल ये है कि फैक्ट्रियों में काम करेगा कौन?
निक्सन के समय में उत्पादन दो दशक तक गिरता रहा। लेकिन ट्रंप के दौर में ऑटोमेशन और रोबोटिक्स जैसे साधन मौजूद हैं — जो इंसानों की कमी को भर सकते हैं। रोबोट को हेल्थ इंश्योरेंस या ओवरटाइम नहीं चाहिए, जिससे उत्पादकता बढ़ सकती है और कंपनियों को मुनाफा हो सकता है। मगर सवाल फिर वही है — क्या ये आम अमेरिकी नागरिक के लिए अच्छा है?