दुनिया में वायु ऊर्जा के निर्माण सामर्थ्य के आधार पर भारत का पांचवा स्थान है। लेकिन, विविधताओं से भरे इस देश में वायु ऊर्जा के प्रचालन को बढ़ाना चुनौतीभरा है। भारत की विविधता लोगों के खानपान की तौर-तरीकों में सबसे ज्यादा नजर आती है। जहां देश के एक क्षेत्र में गेहूं बुनियादी भोज्य पदार्थ है, वहीं दूसरे प्रदेश में गेहूं के बजाय लोग सोयाबीन के आटे का ज्यादा इस्तेमाल करते हैं। वैसे ही जहां एक ओर भारतीय वायु ऊर्जा संघ (इंडियन विंड पावर एसोसिएशन) के मुताबिक तमिलनाडु के छोटे वायु ऊर्जा निर्माता पवनचक्की लगा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर बेलगाम की कुल 216 मेगावॉट वायु ऊर्जा निर्माण करने की क्षमता के इस्तेमाल के लिए एक निजी कंपनी परियोजना तैयार कर रही है जो 13 मेगावॉट बिजली तैयार करेगी। जैसे खाने-पीने की आदतें क्षेत्र के हिसाब से बदलती हैं, वैसे ही वायु ऊर्जा निर्माण करने के हालात और संसाधनों में अंतर नजर आता है।

नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय के मुताबिक अक्षत ऊर्जा क्षेत्र की कुल संस्थापित क्षमता का 70 फीसदी हिस्सा वायु ऊर्जा का है और सरकार का लक्ष्य मार्च 2017 तक अक्षत ऊर्जा के निर्माण को दोगुना करके 55 गीगावॉट करने का है। इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए वायु ऊर्जा क्षेत्र का बड़ा योगदान होगा। नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय के मुताबिक मौजूदा साल में भारत में 19,662 मेगावॉट वायु ऊर्जा निर्माण क्षमता की संस्थापना की गई है। अग्रणी वित्तीय सेवा कंपनी रिलायंस कैपिटल ने भी चीन के मिंग यांग विंड पावर ग्रुप के साथ मिलकर वायु ऊर्जा संयुक्त काश्तकार (ज्वाइंट वेंचर) किया है, जिसमें कंपनी 100 करोड़ रुपये का निवेश कर रही है। मिंग यांग पावर ग्रुप विंड टरबाइन का उत्पादन करता है और ग्राहकों को विस्तृत सेवाएं मुहैया करता है। भारत के वायु ऊर्जा के सामर्थ्य को देखते हुए मायट्राह जैसी कंपनियां इस क्षेत्र में उतर रही हैं, जिसकी 5,000 मेगावॉट की क्षमता के साथ सिर्फ हवा से बिजली का उत्पादन करके देश की सबसे बड़ी स्वतंत्र ऊर्जा निर्माता बनने की योजना है।

बजट 2013-14 में वायु ऊर्जा परियोजनाओं के लिए उत्पादन आधारित प्रलोभनों, अक्षत ऊर्जा परियोजनाओं के लिए सस्ते कर्ज और शेल गैस परियोजनाओं के लिए राजस्व सहभाजन (रेवेन्यू-शेयरिंग) पर नीति की घोषणा के बाद वायु ऊर्जा क्षेत्र और भी ज्यादा आकर्षक हो गया है। इससे हवा के अच्छे बहाव वाले राज्यों में जैसे - तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, गुजरात, कर्नाटक, करेल, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान और पश्चिम बंगाल में निवेश बढ़ने से नौकरियों के मौके भी बढ़ेंगे।

वायु ऊर्जा क्षेत्र के विकास के लिए सरकार की अनुकूल नीतियां अहम हैं। भारत सरकार ने राज्यों के लिए अक्षय खरीद बाध्यता (रीन्यूएबल पर्चेज ऑब्लिगेशन या आरपीओ) जरूरी किया है, जिसके तहत हर राज्य के लिए तय की गई न्यूनतम अक्षत ऊर्जा खरीदना अनिवार्य है। सरकार ने अक्षत ऊर्जा प्रमाणपत्र (रीन्यूएबल एनर्जी सर्टिफिकेट या आरईसी) तंत्र को फिर से लागू किया है, जिससे खुले बाजार में बिजली बेचने वाले अक्षत ऊर्जा निर्माता आरईसी में लेन-देन कर सकते हैं। इस तरह के कदमों से कंपनियों को अक्षत ऊर्जा के निर्माण के लिए अनुकूल वित्तीय प्रलोभन मिलता है, जिसकी वजह से अक्षत ऊर्जा परियोजनाओं से बेहतर मुनाफा मिल पाता है।

नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय ने राष्ट्रीय अपतटीय वायु ऊर्जा नीति (नेशनल ऑफशोर विंड एनर्जी पॉलिसी) का मसौदा जारी किया है, जिसके तहत अपतटीय वायु ऊर्जा परियोजाओं के लिए बिजली निर्माण के पहले 10 साल तक कर-मुक्ति, सीमा शुल्क में छूट और उपकरण और तकनीक की खरीद पर उत्पाद शुल्क माफी जैसे वित्तीय प्रलोभन दिए जाएंगे। मसौदे के मुताबिक राष्ट्रीय अपतटीय वायु ऊर्जा प्राधिकरण (नेशनल ऑफशोर विंड एनर्जी अथॉरिटी) संसाधन आकलन और सर्वेक्षण करेगा और तट से 12 समुद्री मील तक समुद्री सीमा तक वायु ऊर्जा परियोजनाओं की स्थापना के लिए कंपनियों के साथ करार करेगा। इसके अलावा पर्याप्त अनुभव वाली निजी कंपनियों को भी मुफ्त में आंकडे संग्रहण करने की इजाजत होगी।

वहीं, देश में वायु जैसे निसर्ग के अनमोल तोहफे को योग्य तरीके से इस्तेमाल और इसके लिए बनाए गए नियमों पर नजर संप्रदाय मौजूद है। पर्यावरण कर्मण्यतावादी और विशेषज्ञ की मांग है कि साल 2017 तक देश में वायु ऊर्जा निर्माण क्षमता दोगुनी होने की संभावना को देखते हुए हवा से बिजली बनाने के लिए पर्यावरण-अनुकूल नियम बनाए जाएं। सेंटर फॉर साइंस एंड इंवाइरमंट (सीएसई) की रिपोर्ट के मुताबिक कई परियोजनाओं के जंगलों में स्थित होने से स्थानीय पर्यावरण पर असर पड़ेगा। वायु ऊर्जा क्षेत्र के बढ़ने के साथ लाभ-निरपेक्ष संगठनों (नॉन-प्रॉफिट ऑर्गनिजैशन) भी आगे आई हैं, जिससे इस क्षेत्र की सभी चुनौतियों और आपत्तिजनक मुद्दों को विश्लेषण हो रहा है। देखा जाए तो दो दशक पहले पहली विंड टरबाइन के स्थापना के बाद देश में इस क्षेत्र की काफी प्रगति हो चुकी है। अब इंतजार उस दिन का है जब घर-घर में हवा से बनाई गई बिजली से उजाला होगा।

जीई गैस टरबाइन: भारत की ऊर्जा निर्माण जरूरत पूरी करने में मदद

1. जीई 11-340 मेगावॉट के हेवी ड्यूटी गैस टरबाइन के विस्तृत विकल्प मुहैया कराता है

2. 6बी-3 हेवी ड्यूटी गैस टरबाइन की संस्थापना लागत और रखरखाव की जरूरतें कम हैं और इसकी 1200 से ज्यादा इकाइयां लगाई जा चुकी हैं, जिनका 600 लाख घंटों से ज्यादा संचालन किया जा चुका है

3. 1995 में बाजार में उतारे जाने के बाद 6एफए-3 हेवी ड्यूटी गैस टरबाइन 100-300 मेगावॉट बिजली के सहउत्पादन या संयुक्त च्रक के लिए पहली पसंद बन चुकी है

4. 9ई-3 हेवी ड्यूटी गैस टरबाइन जीई की सबसे शक्तिशाली और ग्राहकों का पसंदीदा 50 हर्ट्ज उपकरण है। रेगिस्तान की गर्मी या उष्णदेशीय की नमी से लेकर अत्यधिक ठंड जैसे विकट वातावरणों इस टरबाइन की अब तक संस्थापित की गई इकाइयां 230 लाख घंटों से ज्यादा काम कर चुकी हैं

5. 9एफ-3 हेवी ड्यूटी गैस टरबाइन संयुक्त चक्र, सहउत्पादन, सरल चक्र के संयंत्रों के लिए लोकप्रिय विकल्प बन गई है, जहां कामकाज में लचीलापन और उच्च कोटि का प्रदर्शन को सबसे ज्यादा तवज्जो दी जाती है

6. जीई के 9एफ-5 हेवी ड्यूटी गैस टरबाइन 50 हर्ट्ज के बेस लोड और चक्रीय अनुप्रयोगों वाले उन संयंत्रों के लिए उपयुक्त है जहां ईंधन लागत सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है

7. 9एफ-7 गैस टरबाइन 40 फीसदी से ज्यादा सरल चक्र कार्यक्षमता हासिल कर पाती है और साथ ही दूसरी टरबाइन के मुकाबले इसका परिचालन लचीला है

8. एमएस5001 सिंगल-शाफ्ट हेवी ड्यूटी गैस टरबाइन है, जिसकी अनोखी विश्वसनीयता और उपलब्धता का सबूत इसकी स्थापित की जा चुकी 2500 इकाइयां हैं

9. एमएस5002 गैस टरबाइन है, जिसकी रूपरेखा गैस बूस्टिंग, गैस इंजेक्शन/री-इंजेक्शन, तेल और गैस पाइप लाइन, एलएनजी संयत्र, और गैस के भंडारण जैसे यांत्रिक उपयोगों के लिए की गई है। ये टरबाइन दो रूपों में उपलब्ध है - एमएस5002सी और एमएस5002डी

10. एमएस5002ई डुअल-शाफ्ट टरबाइन है, जिसकी उपयुक्ता बिजली निर्माण और यांत्रिक उपयोगों के लिए साबित हो चुकी है

हवा से बिजली का निर्माण करने वाली टरबाइन

1. जीई की क्लास 1 1.5-77 विंड टरबाइन अपने प्रदर्शन और विश्वसनीयता के लिए मशहूर है। जीई ने अपने क्लास 1 1.5-70.5 विंड टरबाइन में सुधार किया है और रोटर लंबाई बढ़ाई है और नियंत्रण तकनीक में बदलाव किया है, जिससे सालाना ऊर्जा उत्पादन में बढ़ोतरी हुई है। 

2. 1.5-82.5 विंड टरबाइन की तुलना में कंपनी की 1.6-82.5 विंड टरबाइन सालाना अतिरिक्त बिजली का उत्पादन करती हैं। प्रतिद्वंदियों के मुकाबले कम लागत के साथ अतिरिक्त बिजली निर्माण से जीई की इन टरबाइन से ग्राहकों को ज्यादा फायदा मिलता है।

3. 1.6-82.5 विंड टरबाइन के मुकाबले जीई की 1.6/1.7-100 विंड टरबाइन का स्वेप्ट एरिया 47 फीसदी ज्यादा होता है, जिससे 7.5 मीटर प्रति सेकेंड की हवा के गति की दशा में 1.6-100 विंड टरबाइन का उत्पादन (एईपी) 20 फीसदी और 1.7-100 विंड टरबाइन का उत्पादन 24 फीसदी बढ़ता है।

4. जीई ने अपने 1.85-82.5 विंड टरबाइन का विकास करके 1.5 मेगावॉट प्लैटफॉर्म में सुधार किया है। जीई की 1.85-82.5 विंड टरबाइन अब हवा के भारी बहाव वाले क्षेत्रों के लिए पसंदीदा टरबाइन बन गई हैं।

5. जीई की 1.6-87 विंड टरबाइन के विकास से ग्राहकों को ज्यादा फायदा मिलता है। 1.6-82.5 विंड टरबाइन के मुकाबले 11 फीसदी बड़े स्वेप्ट एरिया और ज्यादा उत्पादन (एईपी) से ग्राहकों ज्यादा मुनाफा होता है।

6. जीई ने अपने निरंतर विकास से 2.5-100 विंड टरबाइन बनाई है, जो मल्टी-मेगावॉट वायु क्षेत्र में अग्रणी विंड टरबाइन है। बेहतर कार्यक्षमता, ज्यादा विश्वसनीयता और ग्रिड के साथ अखंड एकीकरण से ये टरबाइन गुणवत्ता की सुनिश्चितता की मिसाल बन गई हैं

7. जीई की 2.5-120 विंड टरबाइन दुनिया की सबसे ज्यादा कार्यक्षमता विंड टरबाइन में से एक हैं। ये दुनिया की ऐसी पहली विंड टरबाइन है जो हवा के कम दबाव वाले क्षेत्रों में भी वैश्विक स्तर के कार्यक्षमता और बिजली निर्माण करती हैं

8. ग्राहकों को ज्यादा पहुंचाने के लिए जीई की 2.5 मेगावॉट सीरीज विंड टरबाइन प्लैटफॉर्म का और विकसित किया गया है और कंपनी ने 2.85-100 और 2.85-103 विंड टरबाइन को बाजार में उतारा है

9. 2.5 मेगावॉट की सीरीज के बेहतरीन प्रदर्शन को देखते हुए जीई ने 3.2-103 विंड टरबाइन का विकास किया है, जो 2.85-103 के विश्वसनीय प्रदर्शन के साथ 5 फीसदी ज्यादा बिजली का निर्माण करती हैं

नतीजे आसपास के वातावरण पर निर्भर करते हैं; वातावरण में बदलाव के साथ नतीजों में भी बदलाव हो सकता है