बासमती चावल एक्सपोर्टर्स पर संकट, शिपिंग चार्ज बढ़ा रही चिंता, लगाई सरकार से गुहार

Basmati rice exporters: बासमती राइस फार्मर्स एंड एक्सपोर्टर्स डेवलपमेंट फोरम (BRFEDF) ने सोमवार को सरकार से अपील की है कि निर्यातकों पर बढ़ते मनमाने और अस्पष्ट शिपिंग शुल्क के खिलाफ तुरंत कार्रवाई की जाए

अपडेटेड Apr 27, 2026 पर 3:35 PM
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फोरम की चेयरपर्सन प्रियंका मित्तल ने कहा कि निर्यातकों को ऐसी परिस्थितियों का आर्थिक बोझ उठाने के लिए मजबूर किया जा रहा है,

Basmati rice exporters: बासमती राइस फार्मर्स एंड एक्सपोर्टर्स डेवलपमेंट फोरम (BRFEDF) ने सोमवार को सरकार से अपील की है कि निर्यातकों पर बढ़ते मनमाने और अस्पष्ट शिपिंग शुल्क के खिलाफ तुरंत कार्रवाई की जाए। फोरम का कहना है कि इन बढ़ते खर्चों के कारण कई व्यापारियों के लिए निर्यात करना आर्थिक रूप से असंभव होता जा रहा है।

फोरम के अनुसार, युद्ध जोखिम (War-risk) सरचार्ज 800 डॉलर से लेकर 6000 डॉलर प्रति कंटेनर तक वसूला जा रहा है। कई मामलों में ये शुल्क बिना पूर्व सूचना के लगाए जाते हैं या माल रवाना होने के बाद संशोधित कर दिए जाते हैं। कुछ स्थितियों में कुल शुल्क माल की कीमत के 60 से 70 फीसदी तक पहुंच गया है।

फोरम की चेयरपर्सन प्रियंका मित्तल ने कहा कि निर्यातकों को ऐसी परिस्थितियों का आर्थिक बोझ उठाने के लिए मजबूर किया जा रहा है, जिन पर उनका कोई नियंत्रण नहीं है। उन्होंने इसे व्यापार के लिए गंभीर चुनौती बताया।


पश्चिम एशिया संकट ने शिपिंग लाइनों को एकतरफा तौर पर कार्गो को जेबेल अली, सोहर और सलालाह जैसे बंदरगाहों पर भेजने, कंटेनरों को ट्रांसशिपमेंट हब पर बिना किसी स्पष्टता के रोकने और कुछ मामलों में कंटेनरों को ओरिजिनल बंदरगाहों पर वापस करने के लिए मजबूर किया है।

एक्सपोर्टर्स का कहना है कि इन फैसलों का पूरा फाइनेंशियल खर्च उन्हें उठाना पड़ता है, भले ही इनमें उनकी कोई राय न हो।

BRFEDF ने सरकार से मांग की है कि शिपिंग शुल्क को केवल दी गई सेवाओं से जोड़ा जाए, विवादित शुल्क के कारण कंटेनर रोकने की प्रथा खत्म की जाए और ऐसे वैश्विक संकटों के दौरान माल ढुलाई के लिए स्पष्ट नियम बनाए जाएं।

फोरम ने यह भी बताया कि भारत के शिपिंग महानिदेशालय (DG Shipping) ने निर्यातकों की शिकायतों को दर्ज कर लिया है और उन्हें एक अंतर-मंत्रालयी समूह के समक्ष भेजा गया है, लेकिन जमीनी स्तर पर स्थिति अब भी बेहद कठिन बनी हुई है।

छोटे एक्सपोर्टर्स पर सबसे ज्यादा असर पड़ा है, फोरम ने बड़े ग्लोबल कैरियर्स और अलग-अलग ट्रेडर्स के बीच मोलभाव करने की ताकत में भारी असंतुलन का हवाला दिया, जिससे कई लोगों के पास बहुत कम रास्ते बचे हैं। कुछ ने कहा कि बढ़ते चार्ज ने उन्हें कार्गो पूरी तरह से छोड़ने पर विचार करने के लिए मजबूर कर दिया है।

मित्तल ने कहा, "अगर इस पर ध्यान नहीं दिया गया, तो ऐसी प्रैक्टिस एक मिसाल कायम करने का खतरा है जो भारत के समुद्री व्यापार फ्रेमवर्क में भरोसे को कमजोर कर सकती है।"

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