अलविदा फ्लाइंग सिख! आपने सिखाया कि खेल के मैदान में हिन्दुस्तानी होने का क्या मतलब होता है

मिल्खा सिंह अब इस दुनिया में नहीं रहे, लेकिन उन्होंने जिस तरह से भारतीयों का सिर गर्व से ऊंचा किया है वो आज भी सबके दिल में बसे हुए हैं
अपडेटेड Jun 19, 2021 पर 21:13  |  स्रोत : Moneycontrol.com

चंदन श्रीवास्तव


सेकेंड के सौवें हिस्से में आप ओलंपिक में मेडल पाने से पीछे छूट सकते हैं और चंद मिनट पहले जब खबर आयी है कि भारत का पिछली सदी का सर्वश्रेष्ठ धावक नहीं रहा तो आप जान चुके हैं कि इस धावक के लिए आईसीयू में मौत से जिंदगी की लड़ाई भी कुछ ऐसी ही होनी थी, एकदम आखिर पल तक हार ना मानने की एक अथक लड़ाई !


चंद घंटे पहले तक की खबर थी कि उम्र के 90 बरस पार कर चुका एक बुजुर्ग अस्पताल के आईसीयू में लेटा है। डाक्टर कह रहे हैं कि हालत नाजुक है, नब्ज बेशक अभी डूबी नहीं है लेकिन वह अब कभी भी दगा दे सकती है। इस बुजुर्ग को पिछले महीने से कोविड के वायरस ने जकड़ रखा है।


डॉक्टर बेटी खुद आईसीयू में मौजूद है। पिता की सेहत पर उसकी पल-पल नजर बनी हुई है। आशंका है कि अनहोनी किसी भी लम्हे सच की शक्ल में सामने आ सकती है। बेटी लाइलाज वायरस को खूब अच्छी तरह जानती है। अभी चंद रोज पहले इस वायरस ने उससे मां को छिन लिया है।


कोविड वायरस की दूसरी लहर में लाखों हिन्दुस्तानियों ने जान गंवायी है। इसलिए, आईसीयू में लेटे बुजुर्ग की कहानी की शुरुआत आपको खास ना लगेगी, कोविड-काल के न्यू नार्मल का हिस्सा जान पड़ेगी।


लेकिन अगर आपको पता हो कि इस कहानी की डॉक्टर बेटी का नाम मोना मिल्खासिंह है, कोविड वायरस से 13 जून को जान गंवाने वाली उनकी मां निर्मल मिल्खासिंह थीं और आईसीयू में लेटे बुजुर्ग कोई और नहीं प्लाइंग सिख मिल्खासिंह हैं, तब क्या गुजरेगी आपके दिल पर ?


आईसीयू में लेटे बुजुर्ग को कोरोना-काल के न्यू नॉर्मल का हिस्सा मानकर चुप्पी साध लेना फिर मुश्किल हो जाएगा। आपके हाथ मिल्खासिंह की सेहत की दुआ मांगने के लिए उठेंगे। लेकिन नहीं, दुआ मांगने का वक्त इन पंक्तियों को लिखने के बीच ही गुजर गया। अनहोनी अब हो चुकी है। खबर आ गई है कि फ्लाइंग सिख हमें छोड़कर चला गया।


फ्लाइंग सिख मिल्खा सिंह की Covid-19 से 91 साल की उम्र में मौत, 5 दिन पहले पत्नी भी चल बसी थीं


अब आपको गुजरा वक्त याद आयेगा, गुजरे वक्त ट्रैक पर दौड़ती मिल्खासिंह की कई कहानियां याद आयेंगी।


मिल्खा सिंह का हिन्दुस्तान


याद आएगा कि इस खिलाड़ी ने अपनी एक अदा से भारत नाम के नये मुल्क के सीने में यह भाव भरा था कि किसी मुल्क के लिए आजादी के मायने क्या होते हैं। याद आएगा कि उस पुराने हिन्दुस्तान में ठेठ हिन्दुस्तानी होने का मतलब क्या होता था, जब इस देश के पास लोगों का पेट भरने का लिए ना दो जून की रोटी हुआ करती थी और ना देह ढंकने के लिए सबको ढाई गज कपड़ा नसीब था।


हां, यहां बात 1958 के हिन्दुस्तान की हो रही है। देश को आजाद हुए बस एक दशक बीता था और इस देश को गुलाम बनाने वाले मुल्क के ज्ञानी-विज्ञानी कह रहे थे कि वह भी कोई देस है महाराज! वहां तो लोगों के मन पर सांप-सपेरे, जादू-टोने और ओझा-गुनिया का राज चलता है। गरीबों, अनपढ़ों और जातियों में बंटे उस मुल्क में आजादख्याल इंसान गढ़ने वाला ना तो नया ज्ञान-विज्ञान ठहर सकता है और ना ही सबको बराबरी का हक देने वाला लोकतंत्र ही पैर जमा सकता है।


लेकिन फिर इसी मुल्क एक नुमाइंदे ने समंदर पार के देश इंग्लैंड की धरती पर एक अचंभित करने वाली दौड़ लगायी और वह दौड़ इस आजाद देश के इतिहास में गौरव का एक कीर्तिमान बन गई। वह दौड़ खुद को लोकतंत्र की धरती और लोकतंत्र का मुहाफिज कहने वाले गोरे लोगों की जमीन पर आधुनिक भारत के उदय के एक धमक की तरह थी।


वह दौड़ वैसी ही थी जैसे कि पोखरण में पहला परमाणु विस्फोट ! जैसे उपग्रह आर्यभट्ट की अंतरिक्ष में उड़ान, जैसे स्कवाड्रन लीडर राकेश शर्मा का अंतरिक्ष से सारे जहां से अच्छा हिन्दुस्तां कहना ! हां, वह दौड़ आधुनिकता की राह पर चल निकले भारत के पैरों की सबसे चमकदार तहरीर थी।


शहर कार्डिफ की वो दौड़


साल 1958 का कॉमनवेल्थ गेम्स ! तब इसके नाम के साथ अनिवार्य रुप से ब्रिटिश एम्पायर शब्द भी जुड़ा रहता था। उस साल ये गेम्स युनाइडेट किंगडम के वेल्स के एक शहर कार्डिफ में होने थे। कुल 35 देशों के इस खेल में भागीदारी के लिए 1130 एथलीट भेजे थे। एथलीट भेजने वाले इन 35 देशों में कुछ ब्रिटिश साम्राज्य का हिस्सा रहकर आजाद हो चुके थे तो कुछ पर अब भी ब्रिटिश हुकूमत कायम थी।


खेल के लिए भारत से जाने वाले एथलीट में एक थे मिल्खा सिंह। माह भर पहले टोक्यो में हुए एशियन गेम्स में वे दो गोल्ड मेडल जीत चुके थे लेकिन कार्डिफ में हो रहे कॉमनवेल्थ गेम्स की बात निराली थी। वहां मिल्खा सिंह का नाम किसी ने ना सुना था।


इंग्लैंड के उस धरती पर खेल देखने वाले लोगों में इक्का-दुक्का ही हिन्दुस्तानी थे और ज्यादातर दर्शकों के लिए भारत अब भी सांप-संपेरों, टोने-टोटके और गुफा-कंदरा में ध्यान लगाने वाले योगी-मुनियों का देश था।


चार सौ चालीस यार्ड के उस दौड़ के फायनल से पहले मिल्खा सिंह के आंखों से नींद गायब थी। मिल्खा सिंह का मुकाबला आस्ट्रेलिया, इंग्लैंड, कनाडा, केन्या, जमैका और युगांडा जैसे देशों के विश्वस्तरीय और कीर्तिमानी एथलीटस् से था। दिल पर ये बोझ भारी था कि कॉमनवेल्थ गेम्स में भाग ले रहे देशों के बीच भारत ही सबसे ज्यादा आबादी वाला देश है और इस देश ने अबतक कॉम्नवेल्थ गेम्स में कोई स्वर्णपदक नहीं जीता है।


फाइनल की दौड़ से ऐन पहले मिल्खा सिंह ने जमीन को मत्था टेका, प्रार्थना के शब्द बुदबुदाये कि मेरे मालिक, आज मैं पूरे जोश-ओ-जुनून से दौड़ लगाने जा रहा हूं लेकिन भारत की लाज अब तुम्हारे हाथ में है। और, दौड़ शुरु हुई...


मिल्खा सिंह ने शुरुआती 350 यार्ड की दूरी सबसे तेजी से पार की। देह की सारी ताकत निचोड़ कर दौड़े थे वे। उनका प्रतिस्पर्धी, दक्षिण अफ्रीका का गोरा धावक मैलकॉम स्पेन्स उनसे बस चंद कदम पीछे था। कोच ने इसी धावक को लेकर उन्हें आगाह किया था।


मैलकॉम स्पेन्स विश्वस्तरीय और कीर्तिमानी क्षमता का धावक था। उसकी अपनी ही शैली थी। वह शुरुआती आधी दूरी कुछ धीमी गति से दौड़ता। एक-दो धावक आगे हों तो उसे फिक्र नहीं होती। लेकिन फिर, बाकी दूरी वह बुलेट की रफ्तार से दौड़ता था। उस वक्त तक अपनी ऊर्जा के चरम पर पहुंच रहे प्रतिस्पर्धी धावकों के लिए स्पेन्स को पकड़ पाना नामुमकिन होता था।


मिल्खासिंह के लिए कोच ने रणनीति बनायी थी कि तुम्हें शुरुआत से ही पूरी ताकत से दौड़ना है। और, मिल्खासिंह इसी सीख पर अमल करके दौड़ रहे थे। वे आऊटर लेन में थे। स्पेन्स के खिलाफ बड़ी बढ़त बना चुके थे लेकिन फिर उन्होंने पीछे मुड़कर देखा। स्पेन्स का चेहरा एकदम ही उन्हें अपने कंधे के पास नजर आया। मिल्खासिंह के कदम फिनिशिंग लाइन के नजदीक थे लेकिन स्पेन्स तूफान की गति से मिल्खासिंह से लीड लेना चाह रहा था। लेकिन मिल्खासिंह ने धीरज रखा, कोच की बात को याद किया कि सारी ताकत निचोड़कर दौड़ना है और पीठ तक पहुंच चुका तूफान उन्हें पीछे छोड़े इसके पहले ही उन्होंने फिनिशिंग लाइन पार कर ली।


बस फर्लांग भर की दूरी से वे अपनी जिंदगी की इस सर्वश्रेष्ठ दौड़ को जीत गये थे। उनका क्लॉक टाइम रहा 46.6 सेकेंड यानि रिकार्डधारी मैलकॉम स्पेन्स से 0.3 सेकेंड पहले पहुंचे थे मिल्खासिंह फिनिशिंग लाइन पर। कनाडा का चार्ल्स टेरेन्स लोबो 47 सेकेंड के समय के साथ दौड़ में तीसरे नंबर पर था।


दर्शक-दीर्घा तालियों से गूंज रहा था। दर्शक दीर्धा की तालियों में उस वक्त सिर्फ हैरत गूंज रही थी कि: आखिर भारत के गंवई इलाके में पला-बढ़ा एक लड़का जिसने अपनी जिन्दगी की सारी शुरुआती दौड़ नंगे पैर लगायी, जिसे कभी ढंग की ट्रेनिंग नहीं मिली, उसने कॉमनवेल्थ खेलों में गोल्डमेडल कैसे जीत लिया।.


मेडल पॉडियम पर चढ़ते मिल्खा सिंह की आंखों में आंसू थे। कार्डिफ के मैदान में तिरंगा लहरा रहा था, राष्ट्रगान बज रहा था, किसी हिन्दुस्तानी ने कॉमनवेल्थ गेम्स में पहली बार स्वर्णपदक जीता था। मिल्खा सिंह उस घड़ी में खुद ही कह रहे थे- मिल्खा, तूने आज सचमुच अपने देश का नाम गर्व से ऊंचा किया है।


दर्शक-दीर्घा से एक महिला मिल्खासिंह को बधाई देने के लिए बढ़ी। ये महिला कोई और नहीं देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु की बहन और यूएनओ की पूर्व जेनरल विजयलक्ष्मी पंडित थीं। उन्होंने बधाई दी, कहा प्रधानमंत्री तुमसे मिलना चाहते हैं।


जीत का सेहरा बांधे एथलीटस् की भारतीय टीम स्वदेश लौटी। देश भर में जश्न का माहौल था, हर हिन्दुस्तानी का सीना गर्व से तना हुआ था, अविभाजित भारत के गांव के एक छोरे ने हुकूमत करने वाले अंग्रेजों की धरती पर एक वर्ल्डरिकार्डधारी गोरे को पहली बार हराया था था।


मिल्खासिंह ने प्रधानमंत्री से भेंट की। प्रधानमंत्री ने उनका कंधा थपथपाया। फौजी वर्दी में खड़े मिल्खासिंह और उनकी बायीं बांह को अपने हाथों से थामे प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु की तस्वीर अब भी इंटरनेट पर देखने को मिल जाती है। देश के प्रथम प्रधानमंत्री ने देश को कॉमनवेल्थ गेम्स में प्रथम गोल्ड मेडल दिलवाने वाले अपनी फौजी खिलाड़ी से पूछा- आज चाहे जो मांग लो, यह देश तुम्हें ईनाम के तौर पर मुंहमांगा हर कुछ देने को तैयार है !


मिल्खा सिंह चाहते तो पंजाब में हजार एकड़ की जमीन मांग सकते थे। आखिर वे किसान के लड़के थे। वे चाहते तो लुटिएन्स दिल्ली में दो-चार बंगले मांग सकते थे। आखिर वे अविभाजित भारत के पाकिस्तान बन चले हिस्से से किसी तरह जान बचाकर पहुंचे शरणार्थी की जिन्दगी गुजार चुके थे और उनके दिल में भी आ ही सकता था कि पाकिस्तान से आये शरणार्थियों को अगर भारत में बसाया जा रहा है तो मुझे बंगला मिले देश की राजधानी में मिले।


लेकिन मिल्खासिंह ने देश के प्रधानमंत्री से ये सब नहीं मांगा। उन्होंने गौरव के उस लम्हे को याद किया जब कार्डिफ के मैदान में तिरंगा लहराया था, राष्ट्रगान बजा था। मिल्खा सिंह ने अपनी कीर्तिमानी उपलब्धि को उस लम्हे को राष्ट्र को समर्पिंत कर दिया, प्रधानमंत्री से कहा कि अगर कुछ देना हो तो मेरी जीत की खुशी में इस देश में एक दिन की छुट्टी की घोषणा कर दीजिए।


और, इतिहास कहता है कि प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु ने अपने एथलीट की भावनाओं को सम्मान किया, छुट्टी की घोषणा की। मिल्खा की जीत इस देश में उसी क्षण अमर हो गई, मिल्खा सिंह भी उसी क्षण देश के इतिहास में अमर हो गये थे। पूरा देश जीत के उस लम्हे के गौरव को याद करने में जैसे एक और अखंड हो गया।


कार्डिफ की जीत के मायने


कार्डिफ में मिली वो जीत सिर्फ खेल के मैदान में मिली जीत नहीं थी। वो जीत कई मायनों में अहम थी। जैसे कॉमनवेल्थ में उस साल भारत को एक नहीं दो स्वर्णपदक मिले थे। दूसरा स्वर्णपदक पहलवान लीला राम ने हैवीवेट कैटेगरी में जीता था। लेकिन किसी विश्वरिकार्डधारी गोरे को उसकी ही धरती पर हराकर कॉमनवेल्थ गेम्स में स्वर्णपदक जीतने की मनोवैज्ञानिक बाधा देश ने मिल्खा सिंह के पैरो से लांघी थी।


कार्डिफ की उस दौड़ इस मायने में भी ऐतिहासिक है कि 1958 के बाद भारत को कुल 52 सालों की प्रतीक्षा करनी पड़ी। पांच दशक की प्रतीक्षा के बाद कृष्णा पूनिया ने 2010 के कॉमनवेल्थ गेम्स में ट्रैक एंड फील्ड केटेगरी में देश को विमन्स डिस्कस थ्रो में स्वर्णपदक दिलाया।


मिल्खा सिंह ने अपनी निजी और पेशेवर जिंदगी में कई अहम दौड़ लगायीः जैसे वह दौड़ जब वे 1960 में रोम ओलंपिक गेम्स के 400 मीटर की रेस में दौड़े और फाइनल तक पहुंचने वाले पहले भारतीय बने। इस दौड़ में कार्डिफ के उनके प्रतिद्वन्द्वी स्पेन्स ने उन्हें मात्र 0.1 सेकेंड से पीछे करके तीसरा स्थान हासिल किया था। बावजूद इसके, अगले चालीस साल तक किसी भारतीय के लिए मिल्खासिंह का 400 मीटर की रेस में हासिल किया गया यह रिकार्ड समय अटूट रहा।


फिर कार्डिफ से तुरंत पहले टोक्यो में हुए एशियाई खेलों में लगायी गई वह दौड़ जिसमें मिल्खा सिंह ने दो-दो स्वर्णपदक जीते थे। या, टोक्यो में हुए गेम्स से पहले कटक में हुए नेशनल गेम्स में 200 और 400 मीटर में लगायी गई दौड़ वह जिसमें उन्होंने रिकार्ड बनाया।


इसके भी पीछे जायें, उस घड़ी में जब वे 1951 में भारतीय सेना में शामिल हुई और 400 फौजियों के बीच हुए क्रास-कंट्री दौड़ में उन्हें मुकाम तो छठा हासिल हुआ लेकिन उनके इंस्ट्रकटर को आगे जाहिर हो गया कि मिल्खा सिंह की रगों में देश के लिए दौड़ लगा सकने वाला लोहा और पारा है।


या, फिर वह दौड़ जब उन्होंने लाहौर में एशिया के सबसे तेज धावक होने का सेहरा बांधकर चलने वाले पाकिस्तानी एथलीट अब्दुल खलिक को हराया और पाकिस्तानी जेनरल अयूब खान ने उन्हें फ्लाइंग सिख के नाम से नवाजा।


या लाहौर वाली इस दौड़ से बहुत पहले, देश के बंटवारे के वक्त पश्चिम पंजाब के मुजफ्फरगढ़ के गोविन्दपुरा में बसे गांव कोट अड्डू में स्कूली साथी के साथ नंगे पांव तपती रेत पर लगायी गई ढेर सारी दौड़। गांव कोट अड्डू की ही दौड़ में शामिल है एक वह दौड़ भी जब मिल्खासिंह जान बचाने के लिए भागे थे। दंगाइयों ने गांव पर हमला किया था, पिता तलवार के वार से घायल होकर जमीन पर पड़े थे और मिल्खा सिंह से कहा था—भाग मिल्खा, भाग !


इन सभी दौड़ों पर भारी है कार्डिफ की दौड़। हां, कार्डिफ की दौड़ में पहली बार साबित हुआ था कि आजादी की आधी रात को अतीत के अंधियारों और उजालों से दामन अलगाकर आधुनिक राष्ट्रों की श्रेणी में शामिल होने और अपनी नियति से साक्षात्कार करने का नेहरु का वादा, कोरा वादा नहीं था।


कार्डिफ की दौड़ में पहली बार किसी भारतीय ने अपनी दौड़ से दिखाया कि भारत आधुनिकता की राह पर निकल चुका है, वह आधुनिकता जिसका वादा है कि कोई अदना सा इंसान अपनी कूबत से चाहे तो अव्वलों के बीच भी अव्वल होकर निकल सकता है।    


लेखक सामाजिक, सांस्कृतिक स्कॉलर हैं।


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