गंगा और नर्मदा के पानी में लाशों का तैरना किस बात की सूचना है?

बिहार और उत्तरप्रदेश की नदियों में लाशों का मिलना लगातार जारी है। जिसके बाद से ही कई सवाल उठ रहे हैं
अपडेटेड May 16, 2021 पर 17:53  |  स्रोत : Moneycontrol.com

चंदन श्रीवास्तव


लाश लिखें, लाशों की कतार लिखें या गंगा के पानी में तैरती हुई लाश लिखें-- वक्त के इस मुकाम पर जिंदगी की सच्चाई के बारे में कैसे और क्या लिखें ? सच्चाई के बयान के लिए सही लफ्ज तलाशते इस वाक्य में लाश तीन जगह है और इन तीनों से तीन दुख बंधे हैं—अपने घाव में अलग, अपने भाव और प्रभाव में अलग ।


लाश लिखना आसान है क्योंकि किसी लाश का दिख जाना आसान है। `राम नाम सत्य` है की आवाज हमारे लिए कितनी जानी-पहचानी है। किसी गली से गुजरते, किसी सड़क पर चलते, अपने रोज की जिन्दगी को पैरों और कंधों से खींचते, माह-दो माह पर ये आवाज हमारे चाहे-अनचाहे कानों में पड़ ही जाती है।


हम गर्दन मोड़ते हैं, आखों के कोर से अर्थी देखते हैं और तनिक असहज होकर जीवन के उस सहज सत्य के स्वीकार और सम्मान में हाथ जोड़ देते हैं जिसे ये दुनिया ना जाने कब से मृत्यु कहते आयी है। यह मृत्यु के स्वीकार का क्षण होता है— जीवन के नश्वर होने के बोध का क्षण ! जाती हुई अर्थी को देख मन में यह सच कौंधता है कि एक दिन हमें भी इस दुनिया से यों ही कूच कर जाना है।


लाशों का कोई ना कोई अपना होता है


जाती हुई अर्थी को लेकर कौन, क्या और कैसे का सवाल उभरता तो है लेकिन बहुत खटकता नहीं। कौन मरा और मौत कैसे हुई कि सवाल इतना बेसब्र होकर नहीं उभरता कि हम इसकी खोज-पूछ में लग जायें। शवयात्रा में शामिल लोगों का रुंधे और हारे स्वर में `राम नाम सत्य है` का उच्चार मन को आश्वस्त करता है कि लाश अकेली नहीं है, कि उसके साथ सुख-दुख के साथी रहे कुछ लोग हैं, कि एक जिंदगी बेशक तमाम हुई लेकिन उसकी कहानी कम से कम शवयात्रा में शामिल इन लोगों के बीच जिन्दा रहेगी।


एक इत्मीनान जागता है कि जीवन समाप्त नहीं हुआ, उसका एक हिस्सा शवयात्रा में शामिल लोगों की जिन्दगी का हिस्सा बनकर अभी कायम रहेगा। अर्थी को उसकी आखिरी मंजिल और मृतक की कहानी को जिंदगी मिल जायेगी। जीवन के कायम रहने का सच मृत्यु के कायम रहने वाले सच को ढंक देता है !


बिहार के गांव की वह लड़की जिसने कोविड के कारण पहले पिता को खोया, फिर मां को।  उसकी मां की लाश को अर्थी नसीब ना हुई, गांव का साथ नसीब नहीं हुआ, चिता ना मिल पायी। साथ देने को कोई ना था, लड़की ने मिट्टी खोदी और लाश को दफ्न किया । फिर भी, वो लाश लावारिस नहीं थी, उस लाश के लिए एक बेटी थी, गांव की मिट्टी थी। उस लड़की की मां की लाश बेनाम और बेपता नहीं थी। गांव-ज्वार की हृदयहीनता की निशानी के तौर पर ही सही यह कहानी आगे बहुतों की यादों में जिन्दा रहेगी।


यूपी के गांव का अधनंगा फकीर सा दिखता वो बुजुर्ग और उसकी सींक सी पतली, थकी हुई बाहें ! इन थकी हुई बाहों पर जो बोझ था, उसे दुनिया की किसी तराजू पर नहीं तौला जा सकता। साइकिल के फ्रेम में फंसी हुई लाश, भरे-पूरे दिन में चारो तरफ झांकता हुआ सन्नाटा और इस सन्नाटे की पृष्ठभूमि में बे-पर्दा होकर दिखता गांव !


सब उस लाश और बुजुर्ग के निपट निस्सहाय और अकेले हो जाने की निशानी हैं। फिर भी, यूपी के गांव की वो लाश लावारिस नहीं थी, लाश की निस्सहायता और अकेलेपन की कथा को कहने, सहने और अपने जीवित रहते पूरे गांव-समाज की निर्दयता पर किसी सवाल सा तना रहने को वो अधनंगा फकीर, एक बुजुर्ग जिन्दा है !


जब कोई नहीं होता तो सिस्टम होता है


लेकिन लाशों की कतार ! क्या लाशों की कतार लिखते हुए वैसा ही सहज रहा जा सकता है जैसा कि लाश लिखते हुए ? ना, लाशों की कतार हममें से ज्यादातर के लिए एक अनजाना दृश्य है, हममें से ज्यादातर ऐसे दृश्य के साक्षी नहीं बने। कोविड-19 की इस लहर से पहले लाशों की कतार कथा-कहानियों की बात थी। किताबों में लिखी बातें, गुजरी सदियों की महामारियों, लड़ाइयों और प्राकृतिक आपदाओं से जुड़ी बातें !


लेकिन कोविड-19 की इस लहर में लाशों की कतार गुजरे वक्त की सत्यकथाओं की बात नहीं रह गई। टेलीविजन का पर्दा, पत्रिकाओं के कवर पेज, फेसबुक का पन्ने पर लदे वीडियो इस वक्त में लाशों के बारे में नहीं कह-बता रहे, अब वे लाशों की कतार के बारे में बता-दिखा रहे हैं।


अब आपकी आंखों के आगे लाशों की कई कतार हैं— एक कतार वह जो श्मसान के बाहर वाली जमीन पर लगी है, एक कतार वह जो श्मशान के भीतर जलती चिताओं की लगी है, एक कतार वह जो अस्पतालों के भीतरखाने बनी मॉचरि के बाहर लगी है, एक कतार वह जो मॉचरि से निकलकर बाहर की सड़क तक जा रही है।     


लाशों की कतार लगी हो तो फिर उसमें लाश नहीं बल्कि उसका कतार में होना ही मुख्य बन जाता है। कतार एक तरतीब की सूचना है, एक सिस्टम के मौजूद होने का साक्ष्य। कतार में लगी हर लाश दरअसल अपनी मंजिल की तलाश में अधबीच लेटी लाश होती है, उसके आगे लाश होती है और पीछे भी। वह एक लाश की राह रोकती है तो दूसरी लाश उसकी राह को रोक रखती है। कतार की लाशों को अपनी आखिरी मंजिल का पता नहीं होता, उनकी मंजिल क्या होगी, ये सिस्टम के आदेश से तय होता है। 


सिस्टम इन लाशों को एक नंबर देता है। लाशों को इंतजार होता है कि कभी उनका नंबर आएगा और वो निर्धारित की गई गति से निर्धारित की हुई दिशा में निर्धारित तरीके से सुपुर्दे-खाक तक पहुंचेंगी। कौन मरा, कैसे मरा और उसके अपने अब कहां, कैसी दशा में है—ये सवाल एकबारगी स्थगित हो जाते हैं। आप लाश नहीं देखते, लाशों की कतार देखते हैं और मान लेते हैं कि इन लाशों की नियति का निर्धारण अब उस मशीन के हाथ में है जिसे "सिस्टम" कहा जाता है।


गो कि हर वो जिन्दगी जो सिस्टम से हारकर अब लाशों की कतार में शामिल है, एक निजी कहानी लेकर चलती है लेकिन ये निजी कहानी और उससे उठते सवाल मुख्य नहीं रह जाते। सिस्टम लाशों की कतार के बारे में जानता है, निजी जिन्दगियों के बारे में नहीं।


सिस्टम फिक्र करता है कि लाशों की कतार खत्म हो, जीवितों के आने-जाने का रास्ता फिर से बहाल हो, सबकुछ साफ-सुथरा, भला-चंगा दिखे और अपनी इस फिक्रमंदी की वजह से ही वह लाशों को लावारिस नहीं रहने देता। वह लाशों की नियति पर अपनी मोहर लगा देता है।


इस मोहर के लगने के साथ कतार में लगी लाशें अपने परिजन और परिचितों की नहीं रह जाती, वह सिस्टम की जिम्मेदारी बन जाती हैं। तो, आप कह सकते हैं कि कतार में लगी लाशों का अपना यों तो कोई नहीं होता फिर भी उनकी जिम्मेवारी उठाने के लिए एक सिस्टम होता है।


तैरती लाशों का नो-मैन्स लैंड


मगर गंगा और नर्मदा के पानी में तैरती और रेत में गड़ी हुई लाशें ! क्या इन लाशों का कोई अपना होता है, क्या इन लाशों को अपनी नियति का पता होता है ? क्या तैरती हुई लाशों के बारे में आप कह सकते हैं कि वो कहां से आयीं, किस गांव के किस घर के किस फर्द की कहानी सुनाने को बेसब्र कोई लाश गंगा के पानी में तैर रही हैं?


ना, गंगा के पानी में तैरती लाशें किसी के परिजन के निस्सहाय और भरे-पूरे संसार में अकेले रह जाने का साक्ष्य नहीं होतीं। परिजन निस्सहाय भी होते तो क्या वे लाश को गंगा में बहने के लिए छोड़ देते ? और जो वे ऐसा करते तो फिर ये क्यों समझें कि वो परिजन थे ?


परिजन ना सही, क्या सिस्टम होता है गंगा में तैरती लाशों के लिए ? ना, इन लाशों से अगर कुछ झांकता है तो यही कि वैसी कोई शय मौजूद नहीं है जो इन लाशों पर अपने होने की मोहर लगाये, उन्हें नाम ना सही एक नंबर दे और अपने तरतीब के भीतर रखते हुए उनकी नियति तय करे।


नदी के पानी पर बहती लाशों का कोई देश नहीं होता, उनके लिए कोई सिस्टम नहीं होता। वो तैरती हुई जैसे `ना-कहीं` होती हैं, वो हर जगह और हर हाथ से हासिल इनकार की डूबती-उतराती तहरीर भर होती हैं जिसे पानी की लहरें चंद रोज में मिटा देंगीं !


आप जिन चीजों को जोड़-गूंथ कर अपने जेहन में किसी जीवित आदमी की तस्वीर बनाते हैं, जैसे  नाम और पहचान, गांव-घर, जाति और धर्म, देश और भाषा, इनमें से सारा कुछ मृतक के साथ भी समान रुप से जोड़ा जा सकता है। पहचान के इन्हीं घेरों में जीकर कोई किसी रोज मृत्यु तक पहुंचता है।


लेकिन नदी के पानी पर तैरती लाशों के साथ पहचान के इन घेरों को नहीं जोड़ा सकता। पानी में तैरती हुई लाश एक मुकम्मल बयान होती है कि नाम और पहचान के इन तमाम घेरों ने उसके साथ दगा किया, कि आदमियों की जमात ने ही मिलकर किसी दिन अपने आदमी होने से इनकार कर दिया। नो मैन्स लैंड सिर्फ मुल्कों की सच्चाई नहीं वह जीवितों के बीच नदी में तैरती लाशों की भी सच्चाई है !


लेखक - सामाजिक, सांस्कृतिक स्कॉलर हैं।


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