Agnipath Scheme protests: जिन युवाओं में दम होगा उनका ही विजय पथ तैयार करेगा अग्निपथ

अग्निपथ युवाओं को एक बेहतरीन मौका दे रहा है, जिसमें हर वर्ष लगभग 40,000 लोग सेना के लिए चुने जाएंगे, जिनमें से 10,000 सर्वश्रेष्ठ जवानों को स्थाई रूप से भरती दे दी जाएगी। शेष 30,000 को चार साल बाद 12 लाख रुपये मिलेंगे और तमाम केंद्र और राज्य सरकारों की नौकरियों में आरक्षण मिलेगा

अपडेटेड Jun 20, 2022 पर 11:34 AM
Agnipath Scheme protests: इस स्कीम में शॉर्ट टर्म हायरिंग को लेकर युवाओं में नाराजगी है. लेकिन क्या यह रोष जायज है?

भुवन भास्कर

भारत में रोजगार हमेशा से एक संवेदनशील मुद्दा रहा है। लेकिन कमाल की बात है कि सामाजिक रूप से बेरोजगारी एक भयंकर समस्या होने के बावजूद शायद ही कभी किसी चुनाव में राजनीतिक मुद्दा बनती है। निजी तौर पर भले ही युवा बेरोजगारी को एक महत्वपूर्ण चुनावी मुद्दा बताएं, लेकिन वोटिंग पैटर्न में शायद ही कभी इसका असर दिखता हो। इसलिए जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अगले डेढ़ सालों में युवाओं को 10 लाख नए रोजगार देने का ऐलान किया, तो एक बार ऐसा लगा कि जिस तरह मोदी ने पिछले एक दशक में विकास को चुनावी रणनीति का केंद्र बना दिया, कुछ वैसा ही शायद अब रोजगार के साथ भी होने वाला है।

मोदी के 10 लाख रोजगार देने की घोषणा को ‘मास्टरस्ट्रोक’ बताया गया क्योंकि अभी से लेकर 2024 में होने वाले आम चुनावों तक यदि वास्तव में 10 लाख युवाओं को रोजगार मिल सका, तो उससे पैदा होने वाली सकारात्मकता और उत्साह निश्चित तौर पर मतदाताओं की सोच में सबसे ऊपर होगा।


पीएम मोदी की इस घोषणा के चंद घंटों के बाद ही सरकार की ओर से एक और घोषणा की गई, जिसका संबंध भी रोजगार से ही था, लेकिन जिसने 10 लाख रोजगार के ‘मास्टरस्ट्रोक’ से बना माहौल रातोरात पलट कर रख दिया। छोटी अवधि के लिए सेना में भरती के इस ‘अग्निपथ’ पर बिहार से शुरू हुआ कथित छात्र आंदोलन, देश भर में पहले पथराव, फिर ट्रेनों और रेलवे स्टेशनों को आग लगाने और फिर आम लोगों, छोटे बच्चों को ले जा रही स्कूल बसों और रास्ते से जाने वाली निजी गाड़ियों पर हमलों तक पहुंच गया।

क्यों बढ़ी नाराजगी?

सवाल यही है कि आखिर उत्तर भारत के कई राज्यों में मोदी सरकार की इतनी महत्वपूर्ण घोषणाओं के बाद भी युवा खुश होने के बजाए, इतना नाराज क्यों है? यह सवाल बेहद गंभीर है, और इसे समझने के लिए एक पैटर्न को समझना होगा जो मोदी सरकार के 2014 में सत्ता में आने के बाद से ही चल रहा है। इस पैटर्न की शुरुआत नरेंद्र मोदी सरकार के साल भर पूरा होने के साथ ही हो गई थी।

मई 2015 में केंद्र सरकार ने देश में औद्योगिक विकास की रफ्तार बढ़ाने के लिए लोकसभा में भूमि अधिग्रहण सुधार विधेयक पेश किया था। लेकिन राज्यसभा में विधेयक के आने के पहले कई राज्यों में विपक्षी दलों ने ऐसा तूफान उठाया, कि सरकार को यह कानून वापस लेना पड़ा।

Agnipath protests updates: दिल्ली-गुड़गांव एक्सप्रेसवे पर भारी जाम, बिहार-झारखंड में स्कूल बंद, हाई अलर्ट पर राज्य

इस प्रयोग की सफलता के बाद इसे कई मौकों पर दुहराया गया, जिनमें सबसे कुख्यात नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) और कृषि सुधार कानून रहे हैं। जिस तरह भूमि अधिग्रहण कानून के खिलाफ इस तरह माहौल बनाया गया, जैसे इसके बाद हर किसान की जमीन अंबानी और अडाणी के कब्जे में चली जाएगी, उसी तरह CAA के बारे में यह कहा गया कि इसके बाद देश के हर मुसलमान को देश से बाहर निकाल दिया जाएगा, जबकि सच्चाई यह है कि CAA का भारत में रहने वाले किसी भी व्यक्ति से कोई लेना-देना ही नहीं था। हालात इस हद तक खराब हुए कि सरकार को CAA ठंडे बस्ते में डालना पड़ा।

इसके बाद कृषि सुधार कानूनों की बारी आई, जिसके बारे हुए सर्वेक्षणों से यह बात सामाने आई कि देश का लगभग 80% किसान इसका समर्थन कर रहा था। लेकिन दो राज्यों, पंजाब और हरियाणा तथा पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कुछ किसानों ने साल भर तक राजधानी दिल्ली को बंधक बना कर पूरे देश में ऐसा माहौल बनाया कि जैसे इन कानूनों के लागू हो जाने से किसान भूखा मर जाएगा।

वस्तुस्थिति यह थी कि ये कानून भारतीय कृषि की सूरत बदलने की क्षमता रखते थे और किसानों की कृषि विपणन की समस्या का स्थाई समाधान पेश कर सकते थे। लेकिन सबने देखा कि किस तरह इसके विरोध में हुए आंदोलन में खालिस्तान समर्थक नारों से लेकर बेअदबी के लिए एक दलित की हत्या और एक लड़की का बलात्कार तक हुआ। पंजाब में बिगड़ते हालात और आंदोलन को मजहबी रंग दिए जाते देख आखिरकार मोदी ने इन कानूनों को वापस ले लिया।

और अब वही फॉर्मूला अग्निपथ योजना के खिलाफ अपनाया जा रहा है। सेना के कई सेवानिवृत्त शीर्ष जनरलों ने इस योजना को सेना के आधुनिकीकरण के लिहाज से अत्यंत महत्वपूर्ण बताया है। यहां तक कि यदि युवाओं के लिहाज से भी देखा जाए तो यह एक अद्भुत योजना है।

सेना में भरती के लिए बिहार, यूपी, हरियाणा जैसे राज्यों में लाखों युवक तैयारी करते हैं, लेकिन उनमें से हर वर्ष सिर्फ 50-60 हजार युवकों की भरती हो पाती है और बाकी या तो अन्य परीक्षाओं की तैयारी करते हैं या फिर बेरोजगार रहते हैं क्योंकि ये युवक अमूमन आर्थिक रूप से कमजोर श्रेणी के परिवारों से आते हैं। इनके पास इतनी रकम नहीं होती कि ये सेना की परीक्षा में असफल होने के बाद अपना कोई व्यवसाय कर सकें या फिर बेहतर सेवाओं के लिए अच्छी कोचिंग का लाभ ले सकें।

अग्निपथ इन युवाओं को एक बेहतरीन मौका दे रहा है, जिसमें हर वर्ष लगभग 40,000 लोग सेना में चयनित होंगे, जिसमें से 10,000 सर्वश्रेष्ठ जवानों को स्थाई रूप से भरती दे दी जाएगी। शेष 30,000 को चार साल बाद 12 लाख रुपये मिलेंगे और तमाम केंद्र और राज्य सरकारों की नौकरियों में आरक्षण मिलेगा। यहां तक कि निजी कंपनियों के सिक्योरिटी डिपार्टमेंट में भी ऐसे प्रशिक्षित पूर्व सैनिकों के लिए विशेष अवसर होंगे। जो युवा आगे पढ़ना चाहेंगे, उनके पास अपने परिवार को संभालने के साथ ही अच्छी कोचिंग का लाभ लेने लायक पर्याप्त फंड होगा और जो युवा अपना कोई कारोबार करना चाहेंगे, उनके पास भी 12 लाख रुपये की सीड मनी उपलब्ध होगा।

फिर घूम-फिर कर सवाल यही आता है कि यदि सब कुछ अच्छा ही है, तो इतना विरोध क्यों? जैसा कि हमने CAA और कृषि सुधार कानूनों के विरोध में देखा कि पूरा कथित आंदोलन उन लोगों की ओर से चलाया गया, जो दरअसल इन कानूनों से कहीं प्रभावित ही नहीं हो रहे थे, उसी तरह अग्रिपथ विरोधी आंदोलन पर भी ऐसे तत्वों का वरदहस्त दिखने लगा है। शुरुआती जांच में पटना के 6 कोचिंग संस्थानों की भूमिका सामने आई है जिन्होंने वॉट्सऐप संदेशों के जरिए छात्रों को भड़काने की कोशिश की।

सोशल मीडिया के दौर में सच को बहुत लंबे समय तक छिपाना वास्तव में मुश्किल है। इसलिए ऐसे कई वीडियो सामने आए हैं, जिनमें आंदोलनकारी छात्र को न अग्रिपथ योजना के बारे में पता है न यह कि आंदोलन क्यों हो रहा है। ट्रेनों को आग लगाने और पथराव करने वाली भीड़ में ऐसे चेहरे आसानी से देखे जा सकते हैं, जो न तो छात्र हैं और न युवा।

आइसा और SFI जैसे वामपंथी छात्र संगठनों के नेता टीवी चैनलों पर छात्रों के प्रतिनिधि बन कर बयानबाजी कर रहे हैं। कुल मिलाकर पुराना पैटर्न साफ दिख रहा है और ऐसा लगता है कि भारतीय सेना को मजबूत बना कर उसकी कमियों को दूर करने वाली इस अभूतपूर्व योजना के खिलाफ वैसे तत्व एक बार फिर सक्रिय हो गए हैं, जो किसी भी ऐसी योजना से डरते हैं जो भारत का प्रभाव और ताकत बढ़ाना का माद्दा रखती है।

लेकिन सबके बाद देखना यह है कि क्या केंद्र की मोदी सरकार अपने इस फैसले पर कायम रहती है या फिर ऊपर उल्लिखित तीनों ऐतिहासिक सुधारों की तरह इसे भी वापस ले लेती है। हालांकि रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने साफ कहा है कि यह कोई तुरत-फुरत लिया गया फैसला नहीं है और प्रधानमंत्री पिछले 2 सालों से सेना के साथ इस पर विचार-विमर्श कर रहे थे। सेना ने पहले ही सक्रियता दिखाते हुए अग्निपथ के तहत भरतियां शुरू करने की घोषणा कर दी है। ऐसे में उम्मीद की जानी चाहिए कि केंद्र सरकार युवाओं के साथ सेना को सशक्त बनाने की इस महत्वाकांक्षी योजना को उसके अंजाम तक पहुंचाएगी।

(लेखक कृषि और राजनीतिक मामलों के जानकार हैं)

हिंदी में शेयर बाजार स्टॉक मार्केट न्यूज़,  बिजनेस न्यूज़,  पर्सनल फाइनेंस और अन्य देश से जुड़ी खबरें सबसे पहले मनीकंट्रोल हिंदी पर पढ़ें. डेली मार्केट अपडेट के लिए Moneycontrol App  डाउनलोड करें।