15 अप्रैल 2012
वार्ता

नई दिल्ली।
क्रिकेट के मैदान पर प्रतिद्वंद्वी टीम के खिलाफ चौके-छक्के की बरसात करने वाले धुरंधर बल्लेबाज युवराज सिंह ने उचित इलाज से भले ही फेफड़े के कैंसर को परास्त कर दिया, लेकिन हमारे देश में हर साल साढ़े पांच लाख लोग इस बीमारी के कारण मौत के मुंह में चले जाते हैं जबकि जागरूकता, धन, सही समय पर पहचान और चिकित्सा की बदौलत बहुत सी जानें बचायी जा सकती है।

कैंसर विशेषज्ञों के अनुसार फेफड़े का कैंसर हमारे देश में कैंसर से होने वाली मौतों का एक प्रमुख कारण बन गया है और पिछले पांच दशक के दौरान धूम्रपान की वजह से इस बीमारी के मामलों में तेजी से इजाफा हुआ है, लेकिन इसके बावजूद युवा पीढ़ी धूम्रपान की लत को नहीं छोड़ती जो कैंसर से होने वाली 09 प्रतिशत मौत का कारण है।

फेफड़े के कैंसर के विशेषज्ञ तथा एशियन इंस्टीट्यूट ऑफ मेकिडल साइंसेस के प्रमुख सर्जन डॉ. एन.के पाण्डे कहते हैं कि आमतौर पर फेफड़े का कैंसर 45 साल की उम्र के बाद होता है, लेकिन जिस तरह युवाओं में धूम्रपान का चलन बढ़ रहा है, उसे देखते हुए कम उम्र में ही यह बीमारी उन्हें जकड़ रही है। इसके लक्षणों की ओर अक्सर युवा ध्यान नहीं देते और जब तक इलाज के लिए पहुंचते हैं, तब तक बहुत देर हो चुकी होती है।

शोध पत्रिका लैंसेंट में प्रकाशित आंकड़े के अनुसार वर्ष 2011 में देश में कैंसर से मरने वाले लोगों की संख्या पांच लाख 56 हजार थी जिसमें से 25 प्रतिशत मौतें उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र में हुई। देश में वर्ष 2010 के दौरान 30 से 69 आयु वर्ग के 70 प्रतिशत से अधिक लोग कैंसर का शिकार हुए, जिनमें तंबाकू और गर्भाशय के कैंसर से मरने वाले लोगों की संख्या सबसे अधिक रही।

डॉ. पाणडे कहते हैं कि भारत में कैंसर महामारी की तरह बढ़ रहा है और करीब 20 से 30 लाख लोग कैंसर से ग्रस्त होने के खतरों से घिरे हैं। हमारे देश में हर साल आठ से नौ लाख कैंसर के मामलों का पता चलता है और हर साल साढ़े 5 लाख लोगों की मौत हो जाती है। कैंसर के 70 से 80 प्रतिशत से अधिक मामलों का पता उस समय चलता है जब कैंसर तीसरी या चौथी अवस्था में पहुंच चुका होता है और ऐसी अवस्था में मरीजों का इलाज नहीं किया जा सकता हालांकि कैंसर के लक्षणों को कम करने के लिये कुछ उपाय अवश्य किये जा सकते हैं।

एसोसिएशन ऑफ सर्जन्स ऑफ इंडिया एएसआई के पूर्व अध्यक्ष डॉ. पाण्डे कहते हैं कि शहरों में स्वास्थ्य सेवाओं के उपलब्ध होने के कारण फेफड़े के कैंसर का पता चल जाता है, लेकिन गांवों में लोग इससे अनभिज्ञ रहते हैं और वहां समुचित स्वास्थ्य सुविधाएं भी नहीं हैं। इसलिए वहां फेफड़ों के कैंसर के मामलों का पता या तो नहीं चल पाता या बहुत देर से चलता है।

डॉ. पाण्डे के अनुसार कैंसर के लक्षणों में खांसी आना, ठंड लगना, भूख खत्म हो जाना, नींद न आना से लेकर मुंह से खून निकलना तक शामिल है, लेकिन शुरूआती चार लक्षणों को लोग गंभीरता से नहीं लेते। धूम्रपान करने वाले यह भी नहीं सोचते कि उनके घर में उनके बच्चे, पत्नी, माता-पिता, उनके मित्र और आसपास से गुजरने वाले वे लोग तक इस बीमारी के शिकार हो सकते हैं जो स्वयं धूम्रपान नहीं करते।

इंद्रप्रस्थ अपोलो अस्पताल की कैंसर विशेषज्ञ डॉ. सपना नांगिया का कहना है कि कैंसर की जंग को जीतने के लिये उसके बारे में जागरूकता जरू री है और सही समय पर पहचान, सही इलाज और हिम्मत की बदौलत हर मरीज युवराज सिंह की तरह इस बीमारी के छक्के छुड़ा सकता है। वह कहती है कि कैंसर के कारणों में पहले नंबर पर तंबाकू है। बीड़ी, सिगरेट, हुक्का, खैनी, पान, जर्दा और पान मसाला सभी कैंसर में बराबर हिस्सेदार हैं। कैंसर का कामयाब इलाज काफी हद तक उसके सही वक्त पर पहचान यानी कि शुरूआती अवस्था में उसकी पकड़ पर निर्भर है।

कैंसर के प्रमुख चेतावनी संकेत इस प्रकार हैं- तीन हफते से ज्यादा आवाज में बदलाव, तीन हफ्ते से ज्यादा खांसी, कोई घाव जो भर न रहा हो, मस्से या तिल की बनावट या रंग में बदलाव, बदहजमी या बगैर कोशिश वजन में गिरावट, मल-मूत्र त्यागने की आदत में बदलाव, खून या पानी का रिसाव तथा शरीर में कहीं कोई गांठ बनना।