06 सितम्बर 2011
आवाज़ समाचार


कैबिनेट ने 117 साल पुराने जमीन अधिग्रहण बिल को बदलने की मंजूरी दे दी  है। नए जमीन अधिग्रहण बिल के तहत किसानों को जमीन के बदले ज्यादा मुआवजा  मिलेगा।

जमीन अधिग्रहण को लेकर उठ रहे विवादों को खत्म करने और किसानों को उचित मुआवजा दिलाने के लिए सरकार ने नया बिल तैयार किया है। ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश का कहना है कि “शीत कालीन कालीन सत्र में संसद की स्टैंडिंग कमेटी बिल पर फैसला ले सकती है।”

नए जमीन  अधिग्रहण बिल में प्रस्ताव है कि 1 से ज्यादा फसल देने वाली जमीन का सिर्फ 5 प्रतिशत हिस्से का ही अधिग्रहण किया जा सकता है। वहीं, 10 साल तक जमीन इस्तेमाल नहीं होने पर राज्य सरकार के पास चली जाएगी।

अधिग्रहण से पहले 80 फीसदी लोगों से सहमति जरूरी होगी। रेलवे, पोर्ट, हाइवे, पावर प्रोजेक्ट के लिए भी सहमति की शर्त लागू की जाएगी। गांवों में जमीन के बाजार भाव का 4 गुना मुआवजे के तौर पर देना होगा। शहरों में जमीन अधिग्रहण के लिए बाजार भाव का 2 गुना मुआवजा देना पड़ेगा।

अधिग्रहण से प्रभावित परिवार के 1 सदस्य को नौकरी देना जरूरी होगा। नौकरी नहीं देने पर 5 लाख रुपये का मुआवजा देना होगा। पहले साल हर महीने 3,000 रुपये और 2 से 20 साल तक हर महीने 2,000 रुपये देने होंगे।

प्रस्तावित नए जमीन अधिग्रहण बिल में अर्जेंसी क्लॉज का इस्तेमाल बहुत कम जगहों पर किया गया  है। सुरक्षा से जुड़े मामलों में ही अर्जेंसी क्लॉज का इस्तेमाल किया  जाएगा। बाकी मामलों में जमीन के मालिक की सहमति से ही अधिग्रहण किया जा सकता है।

हालांकि, उद्योग नए बिल के प्रस्तावों से खुश नजर नहीं आ रहा है। उद्योग का कहना है कि 1 से ज्यादा फसल देने वाली जमीन का अधिग्रहण मुश्किल बनाने से औद्योगीकरण में दिक्कतें आ सकती हैं। इसके अलावा निजी और सार्वजनिक उद्देश्य का मतलब साफ नहीं है।

बिल में  उचित मुआवजा देने का प्रावधान तो दिया गया है, लेकिन मुआवजा तय करने के मापदंड साफ नहीं है। सही आंकड़ों न होने पर जमीन की उचित कीमत तय करना आसान  नहीं होगा। 20 साल तक हर महीने 2,000 रुपये देने के प्रावधान पर उद्योग को कड़ा ऐतराज है।