किसी चीज को सेल (Sell) करने का मतलब उसके बदले पैसा पाना है। यह लेनदेन तय समय में पूरा होना जरूरी है। किसी बिजनेस के चलते रहने के लिए यह जरूरी है। लेकिन, इंडिया के पावर सेक्टर (Power Sector) की कहानी कुछ अलग है। कंपनियां बेच तो रही हैं, लेकिन उन्हें पैसा समय पर नहीं मिल रहा है। इस वजह से बकाया अमाउंट आसमान में पहुंच गया है।
कोल इंडिया (Coal India) का पावर जेनरेशन कंपनियों पर करीब 12,300 करोड़ रुपये बकाया है। इसके बावजूद वह बिजली कंपनियों को कोयला बेच रही है। बिजली बनाने वाली कंपनियों का पावर डिस्ट्रिब्यूशन कंपनियों (Power Distribution Companies) पर 1.1 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा बकाया है। इसके बावजदू वे उन्हें बिजली बेच रही हैं।
डिस्ट्रिब्यूशंस कंपनियों का लॉस बढ़कर 5 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा हो गया है। इसके बावजूद वे कंज्यूमर्स को बिजली बेच रही हैं। टैरिफ बढ़ाने के लिए उन्हें दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। उधर, 'फ्री पावर' अब भी पॉलिटिकल टूल बना हुआ है।
इधर, गर्मी समय से पहले शुरू होने से देश में बिजली की मांग बढ़ गई है। 26 अप्रैल को बिजली की मांग बढ़कर 201 गीगावाट्स पहुंच गई। बिजली की मांग कभी पहले इस लेवल पर नहीं पहुंची थी। सरकार का अनुमान है कि मई-जून में बिजली की मांग बढ़कर 215-220 गीगावाट्स पहुंच जाएगी।
पावर मिनिस्ट्री ने 26 अप्रैल को कहा, "बिजली की बढ़ती मांग से देश में इंडस्ट्रियल एक्टिवटी बढ़ने का संकेत मिलता है।" मार्ट में एनर्जी की डिमांड 8.9 फीसदी बढ़ी। इसमें बढ़ती इंडस्ट्रियल एक्टिविटी के साथ ही किसानों की बिजली की मांग और बढ़ते तापमान का हाथ था।
पावर मिनिस्ट्री ने कहा है, "सरकार और बिजली सप्लाई से जुड़ी दूसरी एजेंसियां बगैर किसी बाधा के सप्लाई बनाए रखने की कोशिश कर रही हैं। रिसोर्सेज के बेहतर इस्तेमाल के उपाय भी किए जा रहे हैं।" इसके बावजद दिन-ब-दिन संकट गहरा रहा है। मुबंई, दिल्ली, लखनऊ सहित देश के कई इलाकों में बत्ती गुल हो रही है।
इलेक्ट्रिसिटी की पूरी सप्लाई चेन पर पेमेंट में देर का असर पड़ रहा है। इस सिस्टम की कड़ियां एक-दूसरे पर आरोप लगा रही हैं। इधर, पावर कट्स बदस्तूर जारी है। जब बिजली बनेगी नहीं तो वह आएगी कहां से? दरअसल, यह पावर क्राइसिस नहीं, कोल क्राइसिस नहीं बल्कि पेमेंट क्राइसिस है।