दुनिया भर के केंद्रीय बैंक (Central Banks) महंगाई के खतरे (Inflation Risk) को भांपने में नाकाम रहे। उन्होंने यह बात मान ली है कि पिछले साल जिस इनफ्लेशन को उन्होंने अस्थायी माना था, उसने अब विकराल रूप धारण कर लिया है। अब वे इसे काबू में करने के लिए अपने सभी हथियारों का इस्तेमाल कर रहे हैं। इसका सीधा असर दुनियाभर के मार्केट्स पर पड़ रहा है। इसका इकोनॉमी की रिकवरी (Economic Recovery) पर भी असर पड़ रहा है।
महंगाई का सही अंदाजा लगाने में केंद्रीय बैंकों की नाकामी से उनकी विश्वसनीयता पर असर पड़ा है। अब भी उन्हें यह समझ नहीं आ रहा कि महंगाई का जिन्न आखिर किस तरह काबू में आएगा। अमेरिकी केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व (Federal Reserve) इसका उदाहरण है। कुछ हफ्ते पहले फेड चेयरमैन जेरोम पॉवेल और उनकी टीम ने बार-बार कहा था कि इंटरेस्ट रेट आधा फीसदी बढ़ाया जाएगा। अब इंटरेस्ट रेट में 0.75 फीसदी वृद्धि की उम्मीद जताई जा रही है। बुधवार को इसका ऐलान होगा। इंडिया में बुधवार देर रात इसके बारे में पता चलेगा। फेड ने बॉन्ड-पर्चेज प्रोग्राम भी बंद कर दिया है। इसका असर भी बॉन्ड यील्ड पर दिख रहा है।
यूरोपियन सेंट्रल बैंक (ECB) की प्रेसिडेंट क्रिस्टिन लेगार्ड ने भी अपना रुख अचानक आक्रामक बना दिया है। रिजर्व बैंक ऑस्ट्रेलिया उन केंद्रीय बैंकों में शामिल है, जिन्होंने उम्मीद के मुकाबले इंटरेस्ट रेट में ज्यादा इजाफा किया है। इनवेस्टर्स केंद्रीय बैंकों के रुख में आए बदलाव से कनफ्यूज्ड हैं।
इनफ्लेशन का सही अंदाजा लगाने में हुई गलती के चलते अब रिसेसशन का रिस्क बढ़ गया है। अमेरिकी स्टॉक मार्केट बियर फेज में एंटर कर गया है। सोमवार को यूएस ट्रेजरी यील्ड में लगातार दो दिन बड़ा उछाल आया। यह 1980 के दशक के बाद दो दिन में आया सबसे बड़ा उछाल था।
बैंक ऑफ जापान के बोर्ड की सदस्य रह चुकी सायुरी शिराई ने कहा, "केंद्रीय बैंक उलझन में हैं। भरोसा हासिल करने के लिए उनके लिए पॉलिसी रेट्स बढ़ाना जरूरी है। इनफ्लेशन को काबू में करने के लिए यह जरूरी है। लेकिन इससे इकोनॉमिक रिकवरी की रफ्तार सुस्त पड़ सकती है।"
लोगों और कंपनियों का यह भरोसा महंगाई को बढ़ने से रोकने में मददगार होगा कि केंद्रीय बैंक इनफ्लेश को काबू में करने में सफल होंगे। लोग इस उम्मीद में कुछ खरीदारी टाल सकते हैं कि फ्यूचर में कीमतों में नरमी आएगी। उधर, कुछ एक्सपर्ट्स का यह कहना है कि फेडरल रिजर्व, ECB और दूसरे केंद्रीय बैंकों को इनफ्लेशन का सही अंदाजा नहीं लगाने का दोषी नहीं माना जा सकता। इसकी वजह यह है कि कीमतों में वृद्धि का बड़ा कारण यूक्रेन क्राइसिस है। इसके चलते दुनियाभर में सप्लाई चेन पर असर पड़ा है।