RBI की रिपोर्ट में कहा गया है कि इस साल मार्च के अंत में इंडिया पर विदेशी कर्ज बढ़कर 620.7 अरब डॉलर हो गया। यह पिछले साल मार्च के मुकाबले 47.1 अरब डॉलर ज्यादा है। इसके बाद विदेशी कर्ज को लेकर बहस शुरू हो गई। दरअसल, श्रीलंका में जारी आर्थिक संकट की एक बड़ी वजह उस पर बड़ा विदेशी कर्ज है।
मीडिया की खबर के मुताबिक, सरकार ने स्थिति साफ की है। एक सूत्र ने बताया है कि केंद्र सरकार पर विदेशी कर्ज को लेकर चल रही अटकलें निराधार हैं। बताया गया है कि इंडिया पर 620 अरब डॉलर के कर्ज में केंद्र सरकार की हिस्सेदारी सिर्फ 130.8 अरब डॉलर है। यह कुल कर्ज का सिर्फ 21 फीसदी है। इसमें स्पेशनल ड्रॉविंग राइट (SDR) एलोकेशन भी शामिल है।
आरबीआई के मुताबिक, इस साल मार्च के अंत में विदेशी कर्ज और जीडीपी का अनुपात घटकर 19.9 फीसदी पर आ गया। यह पिछले साल मार्च में 21.2 फीसदी था। इंडिया को एक साल के अंदर 267.7 अरब डॉलर का कर्ज चुकाना है। इसमें केंद्र सरकार की हिस्सेदारी सिर्फ 7.7 अरब डॉलर है। यह कुल देनदारी के 3 फीसदी से कम है।
मीडिया में सरकारी अधिकारी के हवाले से बताया गया है कि सरकार पर कर्ज का बोझ नियंत्रण योग्य है और पूरी तरह से सेफ है। आरबीआई के मुताबिक, मार्च 2022 के अंत में लॉन्ग टर्म डेट 499.1 अरब डॉलर था। पिछले साल मार्च के मुकाबले यह 26.5 अरब डॉलर ज्यादा है।
इंडिया के कुल विदेशी कर्ज में शॉर्ट-टर्म डेट की हिस्सेदारी इस साल मार्च में बढ़कर 19.6 फीसदी हो गई। पिछले साल मार्च में यह 17.6 फीसदी थी। इसी तरह कुल विदेशी मुद्रा भंडार और शॉर्ट टर्म डेट का अनुपात बढ़कर इस साल मार्च में 20 फीसदी हो गया। यह पिछले साल मार्च में 17.5 फीसदी था।
इस साल मार्च में इंडिया के कुल विदेशी कर्ज में डॉलर वाले कर्ज की हिस्सेदारी 53.2 फीसदी थी। विदेशी कर्ज में रुपया वाले कर्ज की हिस्सेदारी 31.2 फीसदी थी। एसडीआर की हिस्सेदारी 6.6 फीसदी, येन वाले कर्ज की हिस्सेदरी 5.2 फीसदी और यूरो वाले कर्ज की हिस्सेदारी 2.9 फीसदी थी।
RBI हर साल मार्च के अंत में इंडिया पर विदेशी कर्ज का डेट पब्लिश करता है। इसमें यह बताया जाता है कि एक्सटर्नल डेट में कमी आई है या बढ़ा है। इसी तरह केंद्रीय बैंक हर महीने देश के विदेशी मुद्रा भंडार (Forex Reserve) का डेटा जारी करता है।