कुछ राज्यों की वित्तीय स्थिति बहुत खराब, क्या सुधार नहीं हुआ तो श्रीलंका जैसी हो जाएगी हालत?

राज्यों और केंद्र-शासित प्रदेशों का कर्ज और जीएसडीपी का रेशियो बढ़कर वित्त वर्ष 2020-21 में 31.1 फीसदी तक पहुंच गया था। इससे एक साल पहले यह 26.3 फीसदी था

अपडेटेड May 16, 2022 पर 4:47 PM
समय रहते राज्यों के कर्ज में कमी लाने के उपाय नहीं किए गए तो स्थिति बिगड़ सकती है।

कुछ राज्यों की वित्तीय स्थिति बहुत खराब है। उन पर कर्ज का बोझ बहुत बढ़ गया है। 30 जून के बाद उन्हें जीएसटी कंपनसेशन के रूप में केंद्र से भी मदद मिलनी बंद हो जाएगी। चुनाव से पहले किए गए वादों को पूरा करने पर सरकारी खजाने पर बोझ बढ़ जाएगा। एक्सपर्ट्स का कहना है कि अगर जल्द सुधार के कदम नहीं उठाए गए तो कुछ राज्यों की स्थिति श्रीलंका जैसी हो सकती है।

पिछले साल मई में तमिलनाडु में पी थियाग राजन ने राज्य के वित्त मंत्री की जिम्मेदारी संभाली थी। उन्होंने सबसे पहले राज्य की वित्तीय स्थिति को समझने की कोशिश की। उन्होंने 12 मई, 2021 को अंग्रेजी न्यूजपेपर हिंदू से कहा था, "हमें अपने कर्ज और जीएसडीपी (Gross State Domestic Product Ratio) के रेशियो को फिर से 20 फीसदी के लेवल पर लाना है... अगर इसे 17 या 18 फीसदी तक लाया जाता है तो हम कह सकते हैं कि हमने राज्य की वित्तीय स्थिति में सुधार किया है।"

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तीन महीने बाद उन्होंने राज्य की वित्तीय स्थिति पर एक व्हाइट पेपर पेश किया। इसमें कुछ चौंकाने वाली बातें कही गई थीं। इसमें कहा गया था, "राज्य की वित्तीय स्थिति बहुत खराब स्थिति में है। कोविड-19 की महामारी ने स्थिति और खराब कर दी है। इसने तमिलनाडु की वित्तीय स्थिति की पोल खोल कर रख दी है। कोई बफर नहीं बचा है। अब देर करने की कोई गुंजाइश नहीं है।"

तमिलनाडु ऐसा अकेला राज्य नहीं है। राज्यों और केंद्र-शासित प्रदेशों का कर्ज और जीएसडीपी का रेशियो बढ़कर वित्त वर्ष 2020-21 में 31.1 फीसदी तक पहुंच गया था। इससे एक साल पहले यह 26.3 फीसदी था। राज्यों के फाइनेंशियल ईयर 2021-22 के बजट अनुमान के मुताबिक, पिछले साल 31.2 फीसदी के इस रेशियो में हल्की वृद्धि होने का अनुमान था।

राज्यों पर बढ़ता कर्ज चिंता का विषय है। हालांकि, अभी इसकी तुलना श्रीलंका से करना ठीक नहीं होगा। यह सच है कि बढ़ते कर्ज ने श्रीलंका की स्थिति बहुत खराब कर दी, लेकिन यह कर्ज के स्वरूप को समझना होगा। यह कर्ज विदेशी था। 2021 के अंत में श्रीलंका पर विदेशी कर्ज 50.7 अरब डॉलर था। इसमें से सिर्फ 17 फीसदी ही शॉर्ट टर्म कर्ज था। लेकिन, 2021 के अंत में श्रीलंका के केंद्रीय बैंक सेंट्रल बैंक ऑफ श्रीलंका का विदेशी मुद्रा भंडार घटकर सिर्फ 3.1 अरब डॉलर रह गया था। इस साल मार्च में यह घटकर 1.9 अरब डॉलर रह गया।

केंद्र सरकार हमेशा बढ़ते कर्ज को लेकर आलोचकों की चिंता का जवाब यह कहते हुए देती रही है कि उसका 90 फीसदी कर्ज रुपया में है। 30 जून, 2021 को इंडिया पर कुल विदेशी कर्ज 570.3 अरब डॉलर का था। इसमें सरकार के कर्ज की हिस्सेदारी 106.9 अरब डॉलर थी। तब इंडिया का विदेशी मुद्रा भंडार 610 अरब डॉलर था। विदेशी इनवेस्टर्स राज्य के कुल बॉन्ड में 2 फीसदी तक इनवेस्ट कर सकते हैं।

राज्यों को विदेश से आने वाली चीजों और सेवाओं के लिए विदेशी मुद्रा खर्च नहीं करनी पड़ती है। उनका पूरा कर्ज रुपया में है। इसलिए उनकी वित्तीय स्थिति की तुलना राज्यों से नहीं की जा सकती। लेकिन, इसका मतलब यह नहीं कि उनकी वित्तीय स्थिति को लेकर फिक्र करने की बात नहीं है। तमिलनाडु के वित्त मंत्री के व्हाइट पेपर से जाहिर हो चुका है कि रा्ज्यों को जल्द अपनी वित्तीय स्थिति ठीक करने पर फोकस करने की जरूरत है।

रेवेन्यू डेफिसिट के मामले में कोरोना की महामारी शुरू होने से पहले सिक्किम और त्रिपुरा की स्थिति दूसरे राज्यों से अच्छी थी। सिक्किम का रेवेन्यू डेफिसिट इसके जीएसडीपी का 4.4 फीसदी थी। त्रिपुरा का 4.3 फीसदी था। राजस्थान का 3.6 फीसदी, छत्तीसगढ़ का 2.8 फीसदी और आंध्रप्रदेश का 2.7 फीसदी था। वित्त वर्ष 2019-20 में सिर्प 11 राज्य रेवेन्यू सरप्लस में थे।

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