Movie Review: बबली बाउंसर (Babli Bouncer)
Movie Review: बबली बाउंसर (Babli Bouncer)
कलाकार: तमन्ना भाटिया, अभिषेक बजाज, अल मुनमुम अल सियाम, साहिल वैद, सानंद वर्मा, सौरभ शुक्ला और सव्यसाची चक्रवर्ती आदि
लेखक: मोहम्मद शकील, अमित जोशी, आराधना साह, सुमित घिल्डियाल और मधुर भंडारकर
संगीत: तनिष्क बागची, करण मल्होत्रा
डायरेक्टर: मधुर भंडारकर
निर्माता: स्टार स्टूडियोज एवं जंगली पिक्चर्स
ओटीटी: Disney+Hotstar
'बरेली की बर्फी', 'बधाई हो' और 'राजी' जैसी फिल्में बना चुका जंगली पिक्चर्स अब एक नई फिल्म लेकर आई है। इसका नाम है 'बबली बाउंसर (Babli Bouncer)', जिसमें फेमस एक्ट्रेस तमन्ना भाटिया लीड रोल में हैं। ये फिल्म डिजिटल प्लेटफॉर्म Disney+Hotstar पर रिलीज (आज 23 सितंबर से) हो चुकी है।
बॉलीवुड में फिलहाल महिला नायकों का मौसम है। हमने देखा है कि 'दंगल' में जहां एक हरियाणवी गांव में दो बहनें प्रसिद्धि और स्टारडम के लिए कुश्ती करती हैं। इसके अलावा हमारे पास क्रिकेटर मिताली राज की भी कहानी है जो 'शाबाश मीतू' में भारत का नाम रौशन कर रही है।
अब हमारे पास 'बबली बाउंसर' वाली एक महिला मुक्केबाज की कहानी है। मधुर भंडारकर ने इस फिल्म में तमन्ना भाटिया को एक अवतार में पेश किया है। महिला मुक्केबाज बनीं तमन्ना भाटिया को आप पहले कभी भी ऐसी फिल्मों में नहीं देखा होगा।
तमन्ना भाटिया का हिंदी सिनेमा से रिश्ता करीब 17 साल पुराना है। वो 2005 में हिंदी फिल्म 'चांद सा रोशन चेहरा' में पहली बार नजर आई थीं। इसके अलावा वो अभिजीत सावंत के एल्बम सॉन्ग 'लफ्जों में' में भी नजर आई थीं। इसके बाद तमन्ना ने कई साउथ फिल्मों में काम किया। वो ब्लॉकबस्टर फिल्म 'बाहुबली' के दोनों पार्ट्स में थीं।
फिल्म की कहानी
'बबली बाउंसर' में उनकी एक्टिंग की खूब चर्चा हो रही है। फिल्म में वह बबली तंवर की भूमिका में हैं, जो एक रूढ़िवादी हरियाणा के गांव की एक साधारण युवती है। वह गांव बॉडी-बिल्डर बनने के लिए प्रसिद्ध है। दिल्ली के पास स्थित 'बाउंसर विलेज' के नाम से मशहूर फतेहपुर असोला की कहानी है। इस गांव के हर घर में कोई न कोई बाउंसर है और दिल्ली-NCR में जहां भी जरूरत होती है, यहीं के बाउंसर जाते हैं।
बबली तंवर एक बिंदास और बेधड़क लड़की है। लोग उस पर बाउंसर बनने का दबाव डाल रहे हैं। इसके बाद वह बाउंसर बनती है अपने स्कूल की मास्टरनी के उस बेटे से प्रेम की पींगे बढ़ाने का मौका पाने के लिए जिस पर गांव की शादी में वह पहली नजर में ही फिदा हो गई। वह उससे बहुत प्यार करता है और उस क्लब में बाउंसर के रूप में भी काम करता है जहां बबली को नौकरी मिलती है।
हालांकि, इसके बाद फिल्म खींचना शुरू कर देती है। अधिकांश घटनाएं अपनी पकड़ खो देती है और बाउंसर के जीवन से जुड़े कहानी को समाप्त करने का प्रयास किया जाता है। भंडारकर असमंजस में हैं कि उनकी फिल्म को एक ठोस समापन तक कैसे लाया जाए। फिल्म की शुरूआत से लेकर आखिरी तक शानदार है, लेकिन आखिर में वह एक निराशाजनक फुसफुसाहट में समाप्त हो जाता है। फिर भी फिल्म एक बार जरूर देखने लायक है।
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