Medical College: जल्द ही देश के बड़े अस्पताल अब अपना खुद का मेडिकल कॉलेज भी खोल सकेंगे। केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय में इसे लेकर एक बड़ी बैठक हुई है। इस बैठक में करीब 62 बड़े अस्पतालों ने शिरकत की है। MBBS की सीट बढ़ाने और बाहर पढ़ाई करने जाने वाले छात्रों को ध्यान में रखकर यह फैसला लिया गया है। कई छात्र सरकारी मेडिकल कालेज में सीटें ना मिलने, प्राइवेट मेडिकल कालेज की ज्यादा फीस या वहां पढ़ाई का अच्छा इंतजाम ना होने की वजह से हर साल मेडिकल की पढ़ाई से बाहर हो जाते हैं। इसके पीछे देश में मेडिकल की शिक्षा को अफोर्डेबल बनाने का मकसद है।
इस मीटिंग में जसलोक, ब्रिज कैंडी, कोकिला बेन, सत्य साई हॉस्पिटल्स, अपोलो, मेदांता और अमृता अस्पताल जैसे अस्पताल के मैनेजमेंट शामिल हुए। करीब 10 से 12 अस्पतालों ने इस पर काम करना भी शुरू कर दिया है।
हेल्थ इंफ्रास्ट्रक्चर को मिलेगी मजबूती
मंत्रालय से मिली जानकारी के मुताबिक प्राइवेट अस्पतालों के पास जमीन काफी है। लेकिन सरकारी नियमों के तहत इसके इस्तमाल से पहले कई तरह के परमिशन की जरूरत होती है। प्राइवेट अस्पतालों मेडिकल कॉलेज खोलने के लिए लंबे पेपर वर्क जैसे नियमों में ढील दी जाएगी। ऐसा करने से कई बड़े अस्पताल भी मेडिकल कॉलेज खोल सकेंगे। इससे मेडिकल के क्षेत्र में सीटें भी बढ़ जाएंगी। जिससे अधिक से अधिक छात्र इसकी पढ़ाई कर सकेंगे। ऐसे में अस्पतालों में डॉक्टरों की कमी को भी बहुत हद कर पूरा करने में मदद मिलेगी। सरकार के इस पहल से हेल्थ इंफ्रास्ट्रक्चर को भी मजबूती मिलेगी।
मेडिकल के छात्रों को मिलेगी बड़ी राहत
स्वास्थ्य मंत्रालय का मानना है कि प्राइवेट अस्पतालों के मेडिकल कॉलेज खोलने से इस साल करीब 1500 मेडिकल की सीटें बढ़ सकती हैं। हर साल भारत के कई स्टूडेंट्स चीन रुस और यूक्रेन MBBS की पढ़ाई के लिए चले जाते हैं। इसकी वजह ये है कि भारत के प्राइवेट मेडिकल कालेज में MBBS की फीस और एडमिशन की डोनेशन मिलाकर खर्च 50 लाख से 1 करोड़ तक पहुंच जाता है। जबकि यूक्रेन में रहना और पढ़ाई मिलाकर ये काम 35 लाख में हो सकता है।
हालांकि भारत में प्राइवेट कालेज में सरकारी कोटे की सीटें होती हैं, लेकिन उनमें एडमिशन इतना सरल नहीं है। मैनेजमेंट कोटे की सीटों की फीस बहुत ज्यादा है। केंद्र सरकार के इस कदम से भारतीय मेडिकल की तैयारी करने वाले छात्रों को बड़ी राहत मिल सकती है।