Who is Eknath Shinde: एक ऑटो ड्राइवर, जिसने उद्धव ठाकरे की तीन-पहिया सरकार को कर दिया पंक्चर
एकनाथ शिंदे (Eknath Shinde) ने लंबा और उतार-चढ़ाव वाला राजनीतिक सफर तय किया है। राजनीति में सालों का अनुभाव ही थी, जो उन्होंने उद्धव ठाकरे (Uddhav Thackeray) की नाक के नीचे से इतने विधायकों को न सिर्फ तोड़ा, बल्कि इस मोड़ पर ला खड़ा किया कि उद्धव को इस्तीफा देना पड़ा
MoneyControl News
अपडेटेड Jun 30, 2022 पर 8:06 PM
एक ऑटो ड्राइवर, जिसने उद्धव ठाकरे की तीन-पहिया सरकार को कर दिया पंक्चर
भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने एक बार फिर अपने फैसले से सबको चौंकाते हुए, शिवसेना (Shiv Sena) के बागी एकनाथ शिंदे (Eknath Shinde) की दिली तमन्ना को पूरा कर दिया है। गुरुवार को बीजेपी नेता और राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस (Devendra Fadnavis) ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर मुख्यमंत्री के लिए एकनाथ शिंद के नाम की घोषणा की। साथ ही उन्होंने ये भी कहा कि वे इस सरकार से बाहर रहेंगे, यानि वे कोई पद नहीं लेंगे।
मुख्यमंत्री के लिए अपने नाम घोषणा होने के बाद एकनाथ शिंदे ने कहा, "हमने जो कदम उठाया है, वो किसी ने कुछ पाने के लिए नहीं किया है। यह सब का एक विचार, बालासाहेब ठाकरे जी का हिंदुत्व और राज्य के विकास की बात है। इसलिए हम यह एजेंडा लेकर आगे जा रहे थे।"
उद्धव ठाकरे से बगावत शुरू करने के समय से ही शिंदे, बालासाहेब ठाकरे और उनके हिंदुत्व के मुद्दे पर लगातार जोर देते आ रहे हैं। आज भी उन्होंने मीडिया से ये ही कहा, "हम लोग हमारे शिवसेना प्रमुख बालासाहेब ठाकरे जी की हिंदुत्व की जो भूमिका है, उसको आगे बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं।"
असल में एकनाथ शिंदे बाल ठाकरे और उनके हिंदुत्व को लेकर इतने मुखर इसलिए हैं, क्योंकि वे शिवसेना के काफी पुराने और वरिष्ठ नेता हैं। कभी ठाणे की सड़कों पर ऑटो चलाने वाले शिंदे ने अपने दम पर राजनीति में ऐसा मुकाम हासिल किया कि लोग उन्हें 'ठाणे का ठाकरे' कहने लगे।
एकनाथ शिंदे ने लंबा और उतार-चढ़ाव वाला राजनीतिक सफर तय किया है। राजनीति में सालों का अनुभाव ही थी, जो उन्होंने उद्धव ठाकरे की नाक के नीचे से इतने विधायकों को न सिर्फ तोड़ा, बल्कि इस मोड़ पर ला खड़ा किया कि उद्धव को इस्तीफा देना पड़ा।
एकनाथ शिंदे का जीवन
शिवसेना में शामिल होने से पहले शिंदे अपनी जवानी के दिनों में सतारा के जवाली तालुका से शहर आ गए थे। वह सबसे पहले चर्चाओं में तब आए, जब उन्होंने पार्टी के लिए लेबर यूनियन शुरुआत की थी।
1997 में सबसे पहले शिंदे ठाणे नगर निगम के लिए चुने गए थे। इसके बाद उन्हें एक पारिवारिक दुख से भी गुजरना पड़ा। जब उनके दो बच्चे दीपेश और शुभदा उनकी ही आंखों के सामने गांव में डूब गए थे। हालांकि, वह धीरे-धीरे अपने गुरु आनंद दिघे की मदद से इस दुख से उभरे और 2001 में निगम में सेना के नेता बन गए। शिंदे को जल्द ही ठाणे में पार्टी के काम के लिए नियुक्त किया गया, जिससे उन्हें इस इलाके में पकड़ बनाने में मदद मिली।
2001 में एक सड़क दुर्घटना में अपने गुरु आनंद दिघे की मौत के बाद शिंदे ने पार्टी में हुए खालीपन को भर दिया। वह 2004 में विधानसभा के लिए चुने गए और पार्टी के संगठन पर अपनी पकड़ बना ली।
शिवसेना में कब बढ़ा कद
शिंदे ने 2005 में मुंबई में पार्टी के रैंकों को मजबूत किया। जब नारायण राणे के लोगों ने शिवसैनिकों के कांग्रेस में जाने के बाद उनका मुकाबला किया। ये पहली बार था, जब शिवसेना समर्थकों को सड़कों पर चुनौती का सामना करना पड़ा।
पार्टी ने शिंदे पर भरोसा किया। शिंदे पर शिवसेना की निर्भरता तब और बढ़ गई, जब शिवसेना के संस्थापक बाल ठाकरे के भतीजे राज ठाकरे ने पार्टी छोड़ दी और 2006 में महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (MNS) बनाई थी।
कहा जाता है कि कांग्रेस, जो उस समय सत्ता में थी। उसने शिंदे को मंत्री पद का प्रस्ताव भी दिया था। लेकिन उन्होंने शिवसेना छोड़ने से इनकार कर दिया था।
देवेंद्र फडणवीस से बढ़ी करीबी
शिंदे ने अपने बेटे श्रीकांत को 2014 में कल्याण से लोकसभा के लिए चुने जाने में मदद की। श्रीकांत शिंदे एक आर्थोपेडिक सर्जन हैं। जब शिवसेना ने भारतीय जनता पार्टी (BJP) के साथ अपना 25 साल पुराना गठबंधन तोड़ा और अपने दम पर विधानसभा चुनाव लड़ा, तो शिंदे विपक्ष के नेता बन गए।
जब शिवसेना बीजेपी के नेतृत्व वाली सरकार में शामिल हुई, तब वह लोक निर्माण मंत्री बने थे। माना जाता है कि शिंदे के PWD मंत्री के कार्यकाल ने उन्हें पूर्व मुख्यमंत्री और बीजेपी नेता देवेंद्र फडणवीस के करीब ला दिया था।
जब MVA सरकार सत्ता में आई, तो शिंदे ने कई विधायकों को गठबंधन में लाने में अहम भूमिका निभाई थी। माना जाता है कि उद्धव ठाकरे के मुख्यमंत्री बनने से पहले, उनकी इच्छा थी कि इस सरकार की कमान उनके हाथ में हो। हालांकि, शिंदे को अहम शहरी विकास विभाग का प्रभार दिया गया है।
शिवसेना के लिए सबसे बड़े संकटमोचक बने शिंदे
उद्धव ठाकरे की कार्यशैली और सहयोगी राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) के प्रभुत्व को देखते हुए शिंदे पार्टी के लिए सबसे बड़े संकटमोचक के रूप में उभरे।
कहा जाता है कि उनके पास चौबीसों घंटे काम करने की क्षमता है। उन्होंने अपनी पढ़ाई फिर से शुरू की और यशवंतराव चव्हाण महाराष्ट्र ओपन यूनिवर्सिटी से बीए पूरा करने में कामयाबी हासिल की। शिंदे ने मास्टर प्रोग्राम के लिए भी दाखिला लिया था।
Covid-19 महामारी के दौरान, शिंदे जमीन पर काफी एक्टिव थे। वह मेडिकल एड की व्यवस्था कर रहे थे और अस्पतालों का दौरा कर रहे थे। शिवसेना मेडिकल एड यूनिट की उनकी टीम ने भी कोरोना के मरीजों को अस्पताल में बेड और ऑक्सीजन दिलाने में काफी मदद की थी।
भले ही MVA गठबंधन के दौरान एकनाथ शिंदे का मुख्यमंत्री बनने का सपना पूरा नहीं हो पाया, लेकिन देवेंद्र फडणवीस से उनकी करीबी इस बार काम आ गई और उनका ये सपना भी पूरा हो गया।
फडणवीस का आभार जताते हुए शिंदे ने कहा, "संख्या के हिसाब से फडणवीस मुख्यमंत्री बन सकते थे, लेकिन उन्होंने बड़ा दिल दिखाया और मैं इसके लिए उन्हें धन्यवाद देता हूं।"