पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों (Five State Assemblies Elections) के नतीजों की तस्वीर साफ हो गई है। 2024 में लोकसभा चुनावों से पहले इसे बड़ा चुनाव माना गया। इसके नतीजें भविष्य की राजनीति के संकेत दे रहे हैं। लेकिन, एक बात ध्यान देने पर समझ में आती है। वह यह कि क्या देश की जनता ने कांग्रेस को बाय-बाय कर दिया है? ऐसा इसलिए कि देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी कुल 690 में से सिर्फ 58 सीटें जीतने जा रही है। यह संख्या नतीजें आधिकारिक रूप से घोषित होने पर थोड़ी बदल सकती है। आइए थोड़ा और करीब से तस्वीर को देखने की कोशिश करते हैं।
कांग्रेस के खाते में सिर्फ 8 फीसदी सीटें
पांच राज्यों में कुल 690 सीटे हैं। इनमें सबसे ज्यादा 403 यूपी में हैं। 117 सीट पंजाब में हैं। उत्तराखंड में 70, गोवा में 40 और मणिपुर में 60 सीटें हैं। यूपी में कांग्रेस को सिर्फ 2 सीट मिली है। पंजाब में 18 सीट मिलती दिख रही है। गोवा में 12. उत्तराखंड में 17 और मणिपुर में 9 सीटे कांग्रेस कांग्रेस को मिल सकती हैं। इस तरह कांग्रेस पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में 690 में से सिर्फ 58 सीट जीत सकी है। इस तरह कांग्रेस के खाते में सिर्फ 8.4 फीसदी सीट आ रही है।
यूपी में लगातार कमजोर हो रही कांग्रेस की जमीन
सबसे खराब स्थिति कांग्रेस की यूपी में है। इस बार सिर्फ 2 सीटें मिल रही हैं। इससे पहले 2017 में हुए राज्य विधानसभा चुनावों में कांग्रेस को 7 सीटें मिली थीं। तब कांग्रेस ने 114 सीटों पर चुनाव लड़ा था। 2012 के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस ने राज्य की 355 सीटों पर चुनाव लड़ा था। इसमें से वह 28 सीटें जीत सकी थी। यह दिखाता है कि उत्तर प्रदेश में लाख कोशिशों के बावजूद कांग्रेस लगातार कमजोर हो रही है। कहा जाता है कि देश में प्रधानमंत्री की कुर्सी का रास्ता उत्तर प्रदेश से होकर जाता है। ऐसे में जब स्थिति किसी पार्टी की उत्तर प्रदेश में ऐसी है तो उसके भविष्य का अंदाजा लगाया जा सकता है।
काम न आया 'लड़की हूं लड़ सकती हूं' का नारा
कांग्रेस की महासचिव प्रियंका गांधी को पार्टी ने बड़ी उम्मीद के साथ उत्तर प्रदेश की जिम्मेदारी सौंपी थी। 2019 के लोकसभा चुनाव के वक्त यूपी की पॉलिटिक्स में प्रियंका की एंट्री से कांग्रेस के कार्यकर्ताओं में उत्साह लौटा था। उम्मीद थी कि लोकसभा चुनाव के दौरान की गई मेहनत का नतीजा यूपी के 2022 के विधानसभा चुनावों में दिखेगा। प्रियंका की मेहनत में कमी नहीं रही। उन्होंने 'लड़की हूं, लड़ सकती हूं' का नारा दिया। इससे महिलाओं में कांग्रेस की फिर से लोकप्रियता बढ़ती दिख रही थी। लेकिन, आसमान को ढंकने वाले बादल बिना बरसे ही लौट गए।
चुनाव रणनीतिकार प्रशांत किशोर के कांग्रेस से जुड़ने की खबर आई थी। पश्चिम बंगाल विधान सभा चुनावों में उन्हों ताल ठोंक कर तृणमूल कांग्रेस को जीत दिलाई थी। उनके कांग्रेस से जुड़ने की खबर से उम्मीद बंधी थी कि पश्चिम बंगाल जैसा चमत्कार फिर हो सकता है। माना जा रहा था कि 'लड़की हूं लड़ सकती हूं' नारे के पीछे प्रशांत किशोर का दिमाग था। लेकिन, जिस तरह से यूपी के चुनावी मैदान पर कांग्रेस चारों खाने चित हुई है, उससे लगता है कि प्रंशात किशोर की भी अपनी सीमाएं हैं।
कांग्रेस के उत्तराखंड में भाजपा से सत्ता छीन लेने की उम्मीद की जा रही थी। लेकिन, वह तो कांटे के मुकाबले में भी नहीं आ सकी। पंजाब में उसने सत्ता गंवा दी है। ऐसा लगता है जैसे कांग्रेस ने पंजाब की सत्ता गंवाने के लिए खूब मेहनत की। नवजोत सिंह सिद्धू के बगावती तेवर के आगे कांग्रेस झुकती नजर आई। कैप्टन अमरिंदर सिंह ने राज्य को अच्छा गवर्नेंस दिया था। लेकिन, कांग्रेस को सिद्धू में भविष्य नजर आया। सिद्धू की राजनीतिक ताकत का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि मुख्यमंत्री बनने का सपना देखने वाला व्यक्ति एक विधानसभा चुनाव भी नहीं जीत पाया। हां, उसने पंजाब में अच्छी सेहत वाली कांग्रेस को आईसीयू में जरूर पहुंचा दिया।