Lok Sabha Elections 2024: इत्र की नगरी कन्नौज में किसे मिलेगी जीत की महक, उम्मीदवार को लेकर कश्मकश में सपा, फिर बाजी मार लेगी BJP?
अब इस सीट पर बीजेपी का कब्जा है, लेकिन यह सीट भी मुलायम परिवार के लिए काफी मजबूत रही है। क्या होगा इस लोकसभा चुनाव (Lok Sabha Elections 2024) में? राजनीतिक समीकरण क्या बनेंगे, क्या बिगड़ेंगे? इन सब सवालों के बीच फिलहाल चुनाव की गोटियां बिछाई जा रही हैं। अब कौन लड़ेगा इस क्षेत्र से? क्या अखिलेश खुद कन्नौज से उतरेंगे? यह समय के गर्त में है। समाजवादी पार्टी इस सीट पर अपने पत्ते खोल नहीं रही है
Lok Sabha Elections 2024: इत्र की नगरी कन्नौज में किसे मिलेगी जीत की महक
Lok Sabha Elections 2024: कन्नौज (Kannauj) की गलियों में घूमते हुए कबीर की कुछ पंक्तियां याद आती हैं- 'कबिरा संगत साधु की, ज्यों गंधी की बास। जो कछु गंधी दे नहिं, तो भी बास सुबास।।' यानी जिस तरह साधु का साथ जीवन को कुछ न कुछ देता है, इसी तरह इत्र अगर कहीं है, तो इत्र मिले न मिले लेकिन उसकी सुगंध का आनंद जरूर मिलता है। इत्र की नगरी कन्नौज। इत्र की खुशबू से यहां की गालियां भी महकती हैं। 2000 से भी ज्यादा इकाइयां यहां इत्र बनाने का काम कर रही हैं, जो दुनिया भर में जाता है। यही नहीं इसी नगर से जो ब्राह्मण निकले वो कान्यकुब्ज ब्राह्मण कहलाए। यहां की बुकनू भोजन का स्वाद ही बदल देती है। कन्नौज कभी बड़े-बड़े साम्राज्यों की राजधानी थी। अंतिम हिंदू वादी शासक हर्षवर्धन ने यहां पर 606 से 647 ईस्वी तक शासन किया।
वह हर 12 साल में प्रयागराज के महाकुंभ में जाते थे और अपना सब कुछ दान कर आते थे। संस्कृत के प्रसिद्ध कवि बाणभट्ट ने हर्षवर्धन के जीवन चरित्र का वर्णन किया है। जयचंद यहीं के शासक थे, जिनके बारे में यह कहा जाता है कि उन्होंने पृथ्वी राज चौहान के साथ विश्वासघात किया। यह अलग बात है कि कन्नौज के इतिहासकार कहते हैं कि जयचंद ने कोई दगाबाजी नहीं की। गलत इतिहास बताया जा रहा है।
बौद्ध चीनी यात्री हेवनसांग ने कन्नौज नगर का जो वर्णन किया है, वो भी अद्वितीय है। बहुत ही खूबसूरत था कन्नौज। कन्नौज शुरू से राजनीति का केंद्र रहा है और एक बार फिर यहां पर चुनाव का डंका बजने जा रहा है। 1967 में इसी धरती पर प्रसिद्ध समाजवादी डॉ. राम मनोहर लोहिया ने कांग्रेस प्रत्याशी को पराजित कर दिया था।
अब इस सीट पर बीजेपी का कब्जा है, लेकिन यह सीट भी मुलायम परिवार के लिए काफी मजबूत रही है। क्या होगा इस लोकसभा चुनाव (Lok Sabha Elections 2024) में? राजनीतिक समीकरण क्या बनेंगे, क्या बिगड़ेंगे? इन सब सवालों के बीच फिलहाल चुनाव की गोटियां बिछाई जा रही हैं।
कन्नौज से कम हुआ सपा का विश्वास
अखिलेश यादव ने इस बार डिंपल यादव को इस क्षेत्र से दूर रखा है। डिंपल यादव इस बार मैनपुरी से चुनाव लड़ रही हैं। वास्तव में पहले समाजवादी पार्टी के नेता कन्नौज को सबसे सुरक्षित क्षेत्र मानते थे, लेकिन पिछले चुनाव में जिस तरह से डिंपल यादव को पराजय मिली उसके बाद सपा का भरोसा इस सीट से कुछ कम हुआ है।
अब कौन लड़ेगा इस क्षेत्र से? क्या अखिलेश खुद कन्नौज से उतरेंगे? यह समय के गर्त में है। समाजवादी पार्टी इस सीट पर अपने पत्ते खोल नहीं रही है, क्योंकि यह खतरे से खाली नहीं है। कई नामों पर विचार चल रहा है।
समाजवादी पार्टी की तरप से कन्नौज सीट पर प्रत्याशी चयन को लेकर जो बहुत ही सोंच विचार चल रहा है, उसके कुछ कारण हैं। 2014 और 2019 के जो चुनाव परिणाम हैं, उससे यह साबित हो जाता है कि कन्नौज सपा के लिए सुरक्षित सीट नहीं बची।
2014 में अखिलेश यादव ने डिंपल यादव को इस रणनीति के तहत मैदान में उतारा था कि डिंपल के उतरने से यह चुनाव आसानी से जीत लेंगे। अखिलेश उस समय उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे और उनकी पत्नी का लोकसभा चुनाव के मैदान में उतरना जीत की गारंटी माना जा रहा था।
2014 की जीत 2019 में हार में बदली
उधर बीजेपी से सुब्रत पाठक मैदान में थे। इसके बावजूद डिंपल यादव को चुनाव जीतने में पसीने आ गए। वह सिर्फ 19 हजार वोटों से चुनाव जीत पाईं। 2019 में समाजवादी पार्टी बहुजन समाज पार्टी और RLD का गठबंधन था। अखिलेश यह बात समझ रहे थे कि इस बार डिंपल यादव की जीत लाखों में होगी, क्योंकि बहुजन समाज पार्टी का वोट भी डिंपल के खाते में जाएगा, लेकिन यह समीकरण काम नहीं आया और डिंपल चुनाव हार गईं। उनको सुब्रत पाठक ने 10,000 वोटों से हरा दिया।
अखिलेश और सपा के लिए गहरा झटका था। इसके चलते ही अखिलेश यादव इस बार यह तय नहीं कर पा रहे हैं कि वो कौन सी रणनीति हो जिससे कन्नौज सीट को फिर से वापस पा सकें। लेकिन यह आसान नहीं है। जहां पर सपा के सामने कुछ और भी दिक्कतें हैं और सपा में आपसी खींचतान साफ-साफ दिखती है। फिलहाल इसलिए सपा में प्रत्याशी की तलाश हो रही है, जो किसी तरह चुनाव जीत सके।
गैर-यादव को मैदान में उतार सकती है सपा
समाजवादी पार्टी यहां पर इस बार किसी गैर यादव को भी मैदान में उतार सकती है। इस रणनीति के तहत कि जिससे दूसरे वर्गों का वोट भी उसे मिल जाए। सपा नेताओं का कहना है कि यादव और मुस्लिम उसके साथ पहले से ही हैं और वो साथ ही रहेंगे। लेकिन यह जीत के आंकड़े तक नहीं पहुंचता। इसलिए इस बात की चर्चा है कि क्या कोई ब्राह्मण उम्मीदवार मैदान में उतरेगा या अति पिछड़ा।
कन्नौज के ही रहने वाले राजन मौर्य कहते हैं कन्नौज से कौन लड़ेगा अखिलेश यादव यह तय नहीं कर पा रहे हैं। भारतीय जनता पार्टी से सुब्रत पाठक का ही चुनाव लड़ना तय माना जा रहा है। सपा के लिए यह सीट कठिन तब हुई, जब 2012 के उपचुनाव में डिंपल यादव निर्विरोध चुनी गई थीं और उनके खिलाफ कोई भी प्रत्याशी नहीं उतरा था। क्यों नहीं उतरा इसको लेकर तमाम आरोप प्रत्यारोप लगे।
सपा पर उठते गंभीर सवाल
सपा पर आरोप लगाया गया की सत्ता के बल पर सपा के दबंगों ने किसी को नामांकन दाखिल नहीं करने दिया। उस समय अखिलेश यादव उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे। शायद इतिहास में ऐसा पहले कभी हुआ हो, जब लोकसभा के चुनाव में कोई निर्विरोध जीत गया हो। सवाल यह जरूर उठे कि क्या किसी को नामांकन दाखिल नहीं करने दिया गया।
कन्नौज के ही रमेश मिश्रा सवाल उठाते हैं कि अगर डिंपल यादव की इतनी ही लोकप्रियता थी कि उनके खिलाफ कोई नामांकन दाखिल करने वाला नहीं था। तब यहां पर उन्हें चुनाव में इतनी मेहनत क्यों करनी पड़ी? सिर्फ दो साल बाद ही हुए चुनाव में डिंपल यादव को बेहद मुश्किल लड़ाई क्यों लड़नी पड़ी। यह सवाल बड़ा है।
कन्नौज सीट की विशेषता यह है कि यहां पर ब्राह्मण भी हैं। यादव मतदाता भी बड़ी संख्या में हैं, लेकिन सबसे ज्यादा संख्या में अति पिछड़े वर्ग के मतदाता हैं और समाजवादी पार्टी इस खतरे को भांप रही है। खतरा यह भी है कि पिछले चुनाव में BSP-SP के साथ थी, इस बार वो अलग चुनाव लड़ रही है।