कंधार विमान अपहरण के समय पहले तो "किसी भी कीमत पर" बंधकों की रिहाई पर दलों के बीच आम सहमति बन गई थी। पर, केंद्र सरकार ने जब एक कीमत देकर बंधकों को रिहा करवा दिया तो बाद में कई राजनीतिक दल अपनी बात से पलट गए। क्योंकि उस दुर्भाग्यपूर्ण घटना से दलों ने राजनीतिक फायदा उठाने की कोशिश की। अब तो लगता है कि इस तरह के मामलों में इस देश के राजनीतिक दलों की यही फितरत बन चुकी है। यह देश की सुरक्षा के लिए खतरे की घंटी है। चिंताजनक बात यह है कि ऐसी राजनीति देश की सीमाओं की रक्षा के मामलों में भी होती रहती है। मुंबई के ताज होटल पर सन 2008 में हुए आतंकी हमले के समय भी यही हुआ।
सीमा पर चीन की ताजा खुराफातों को लेकर भी इस देश में आज भी कोई आम सहमति नहीं बन पा रही है। इसका लाभ हमारे दुश्मन उठाते रहते हैं। इस पृष्ठभूमि में कंधार विमान अपहरण प्रकरण को एक बार फिर याद करना मौजूं होगा। अपहरण सन 1999 के दिसंबर में हुआ था। कंधार अपहरण कांड यह बताता है कि हमारे हुक्मरान अपनी गलतियों से सीखने के लिए कत्तई तैयार नहीं हैं। पाकिस्तान समर्थित कश्मीरी आतंकवादियों ने 24 दिसंबर,1999 को इंडियन एयर लाइंस के विमान- 814 का अपहरण कर लिया। उसे वे कंधार यानी अफगानिस्तान ले गए।
तब भी वह देश तालिबानियों के कब्जे में था।उस विमान के 152 यात्रियों को आतंकियों ने बंधक बना लिया।कई दिनों के शर्मनाक ड्रामे के बाद हरकत उल अंसार के मौलाना मसूद अजहर तथा कुछ अन्य आतंकियों को रिहा करने के बदले में अपहृत विमान के बंधक यात्रियों को छुड़ा लिया गया। आतंकियों को अपने साथ लेकर तत्कालीन विदेश मंत्री जसवंत सिंह कंधार गए थे।
इससे पहले 27 दिसंबर 1999 को दिल्ली में प्रधान मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने सर्वदलीय बैठक बुलाई थी। उस बैठक में यह सहमति बनी थी कि बंधक यात्रियों को किसी भी कीमत पर बचाना है। पर जब कीमत दे दी गई तो उन्हीं दलों के नेतागण समय -समय पर भाजपा और जसवंत सिंह पर यह ताने मारते रहते हैं कि "आप भी तो मसूद अजहर को साथ लेकर कंधार गए थे।"
याद रहे कि विचारक और लोगों को प्रेरित करने में माहिर आतंकवादी अजहर कश्मीर के अनंतनाग में सन 1994 में गिरफ्तार किया गया था। उन्हीं दिनों फिल्म अभिनेता आमिर खान ने कहा था कि "मुझे और मेरे बच्चों को कुछ आतंकवादी बंधक बना लें तो मैं अपनी सरकार से यह कहने के लिए मानसिक रूप से तैयार रहूंगा कि वह मेरी और मेरे बच्चों की परवाह न करें और और देश के व्यापक हित में आतंकवादियों को मार गिराए।"
यह और बात है कि खुद आमिर खान और उनके परिवार को बाद में हिन्दुस्तान में "डर लगने" लगा था। यह बात उन्होंने सार्वजनिक रूप से कही भी थी। कुछ दूसरे देशों के हुक्मरानों ने यह तय कर रखा है कि वे अपहरणकर्ताओं की कोई शर्त नहीं मानेंगे। काश, ऐसा ही साहस हमारे देश के शासक और बंधकों के परिजन समय आने पर दिखाया करते! खुद वाजपेयी मंत्रिमंडल के सदस्य जसवंत सिंह और प्रमोद महाजन कंधार अपहरण के समय आपस में तू -तू मैं- मैं कर रहे थे। महाजन की शिकायत थी कि जसवंत जल्दी मसूद अजहर को लेकर कंधार क्यों नहीं जा रहे हैं।
उधर दिल्ली में बंधकों के परिजन समूह बना कर सरकार की ऐसी-तैसी कर रहे थे। वे चाहते थे कि जल्दी आतंकियों की शत्तें सरकार पूरी कर दे। सरकार ने कारगिल युद्ध के शहीदों की विधवाओं को उन रिश्तेदारों से बात कराई। विधवाएं कह रही थीं कि आतंकियों की शत्र्तें मानने पर और महिलाएं विधवा बनेंगीं। पर, उसका कोई असर उन पर नहीं पड़ा। टी.वी.चैनल वाले उन रिश्तेदारों के हंगामे का दृश्य निरंतर दुनिया भर को दिखा रहे थे। एक बंधक के रिश्तेदार डा.राजीव छिब्बर ने जसवंत सिंह से रोष भरे शब्दों में कहा कि "तब अपहृत रूबैया के बदले आतंकवादी छोड़े गए थे तो अब क्यों नहीं?"
अब जरा तब की प्रशासनिक गलतियों से हाल की गलतियों की तुलना की जाए तो पता चलेगा कि बाद के वर्षों में भी इस मामले में हमारी सरकार ने बहुत कम सीखा है। मुंबई पर आतंकी हमले के बाद जिस तरह की खुफिया,सुरक्षा और प्रशासनिक विफलताएं की खबरें आईं, वे लोगों को याद ही होंगी। अब जरा कंधार कांड के समय की विफलताओं की चर्चा की जाए।तब के कैबिनेट सचिव प्रभात कुमार पर आरोप था कि अपहरण की खबर मिल जाने पर भी बैठक बुलाने में उन्होंने देरी की। पीएमओ के प्रधान सचिव ब्रजेश मिश्र पर आरोप लगा कि विमान जब अमृतसर के पास और फिर अमृतसर में था तब उसे उलझावपूर्ण संकेत भेजे। फैसले में देरी की।
रॉ के प्रमुख पर आरोप लगा कि अपहरण की खबर पाते ही वे चौकन्ना नहीं हुए। एन.एस. जी. प्रमुख ने रॉ की टीम के इंतजार में वक्त गंवाया। वार्ताकारों के बगैर NSG को अमृसर रवाना होना चाहिए था। याद रहे कि अमृसर जाने के लिए विशेष विमान इंतजार करता रहा, पर वार्ताकार नहीं पहुंचे। याद रहे कि अपहरणकर्ता विमान को काठमांडू से लखनऊ, दिल्ली होते हुए अमृतसर ले गए थे। अमृसर में इंधन के लिए विमान रुका। फिर वे उसे कंधार ले गए। तब की केंद्र सरकार की सबसे बड़ी विफलता यह थी कि वह उस विमान को अमृतसर में अपने कब्जे में नहीं कर सकी।
क्या इन गलतियों से भारत सरकार ने बाद के वर्षों में भी कोई शिक्षा ली थी? मुंबई की ताजा घटना इसका नकारात्मक उत्तर देती है। हाल के वर्षों में इन मामलों में भी बेहतरी नजर आ रही है। किंतु फूलप्रूफ प्रबंधन अब भी नहीं।