आधुनिक भारत के राजा विलासी नहीं बल्कि अपनी जनता का खयाल रखने वाले थे

आधुनिक भारत के राजा-महाराजा सिर्फ युद्ध करने और राजपाट चलाने और सुख- सुविधा भोगने में ही नहीं लगे रहते थे बल्कि कुछ राजा लोग लीक से हटकर भी काम करते थे

अपडेटेड May 18, 2022 पर 9:15 AM
Story continues below Advertisement
बड़ौदा के महाराजा अछूतों के लिए भी लड़े थे लेकिन इस बात की चर्चा बहुत कम होती है

सुरेंद्र किशोर

बड़ौदा के महाराजा ने 1900 शताब्दी की शुरुआत में ही बहु-विवाह पर पाबंदी लगा दी थी। इसके साथ ही उन्होंने सबके लिए निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा की भी व्यवस्था कर दी थी। चर्चित पुस्तक ‘फ्रीडम एट मिडनाइट’ के लेखक लिखते हैं कि ये ऐसी सुविधाएं थीं जो भारत के ब्रिटिश शासित इलाकों में उपलब्ध नहीं थीं। डोमिनीक लापियर और लैरी कॉलिन्स की भारत पर लिखी यह किताब 1975 में आई थी और बहुत चर्चा में रही थी।

लेखकों ने लिखा है कि भारतीय राजा-महाराजाओं ने बहुत सराहनीय सफलताएं भी हासिल की थीं। जिन रियासतों के शासक प्रबुद्ध विचार के थे, पश्चिमी ढंग की शिक्षा प्राप्त कर चुके थे...उन रियासतों की प्रजा को ऐसी सुविधाएं और अधिकार भी प्राप्त थे, जो अंग्रेजों के सीधे शासन में रहने वालों को भी नहीं मिले हुए थे।


इसी तरह बड़ौदा के महाराजा अछूतों के लिए भी लड़े थे। लेकिन इस बात की बहुत चर्चा नहीं हुई। लेकिन इस काम के लिए उनकी लगन किसी भी तरह गांधी जी से कम नहीं थी। महाराजा ने अछूतों के रहने और उनके पढ़ाने की व्यवस्था की थी। अपने खर्चे से न्यूयार्क की कोलंबिया यूनिवर्सिटी में उस आदमी को पढ़ाया, जो आगे चलकर इन्हीं अछूतों का नेता बना। ये शख्स थे डॉक्टर भीमराव आम्बेडकर।

वही नहीं, बीकानेर के महाराजा ने अपनी प्रजा की सुविधा के लिए राजस्थान में अपनी रेगिस्तानी रियासत में जगह -जगह झीलें बनवा कर और बाग लगवा कर उसे स्वर्ग जैसा बना दिया। ‘फ्रीडम एट मिडनाइट’ के अनुसार भोपाल में औरतों को बराबरी का जो दर्जा दिया गया, ऐसा अधिकार स्त्रियों को हिंदुस्तान में कहीं और नसीब न था।

मैसूर में विज्ञान की शिक्षा की सबसे अच्छी संस्था थी। वहां पानी से बिजली पैदा करने के लिए कई बांध बनाए गए थे। कई उद्योग भी लगाए गए थे। जयपुर के महाराजा इतिहास के एक सबसे बड़े खगोल शास्त्री के वंशज थे। उन्होंने ग्रीक गणितज्ञ यूक्लिड के ‘रेखागणित के सिद्धांत’ नामक पुस्तक का संस्कृत में अनुवाद किया था। उनकी राजधानी में संसार की सबसे प्रमुख वेधशाला थी।

इस विवरण से यह भी पता चलता है कि राजा-महाराजा सिर्फ युद्ध करने और राजपाट चलाने और सुख- सुविधा भोगने में ही नहीं लगे रहते थे बल्कि कुछ राजा लोग लीक से हटकर भी काम करते थे। डोमिनिक और लैरी ने इन राजा-महाराजाओं की अगली पीढ़ियों की भी चर्चा की है। राजा-महाराजाओं की नई पीढ़ियों में पहले जैसी तड़क-भड़क नहीं थी। नई पीढ़ी के अनेक राजा -महराजा अपने पूर्वजों की तरह विलासप्रिय नहीं थे। बल्कि, वे अपने रियासतों में परिवर्तन और सुधार के प्रति भी अधिक सजग थे।

भारत के लिए तीन दशकों तक 8-9% की विकास दर को बरकरार रखना एक चुनौती: NITI Aayog CEO

लेखक लिखते हैं कि "गद्दी पर बैठने के साथ ही पटियाला के आठवें महाराजा ने पहला काम यह किया कि अपने पिता सर भूपेंद्र सिंह का हरम बंद करवा दिया। ग्वालियर के महाराजा एक सरकारी अधिकारी की बेटी से शादी करके अपने पिता के आलीशान महल से अलग रहने लगे थे।" जो राजा-महाराजा बड़ी योग्यता के साथ शासन चलाते थे,उनके बारे में भी कई बार आम लोगों के दिमाग में झूठी बातें बैठाई जाती थीं।

दूसरी ओर, अंग्रेजों के जमाने के एक रिटायर ICS अफसर ने अपने संस्मरण में लिखा था कि "कहीं गरीबों के घरों में बड़े पैमाने पर आग लगने पर सरकार की ओर से राहत की कोई व्यवस्था नहीं रहती थी। हम स्थानीय व्यापारियों से चंदा लेकर उन गरीबों को राह पहुंचाते थे।" लेखक जोड़ी की पुस्तक में हैदराबाद के सातवें निजाम के बारे में लिखा गया है कि "वह बहुत दुबले-पतले, छोटे से कद के बूढ़े आदमी थे। मुश्किल से सवा पांच फीट का कद होगा और वजन सिर्फ 90 पौंड।

उनकी रियासत उप महाद्वीप के बीच में थी और उसमें 2 करोड़ हिन्दू और 30 लाख मुसलमान थे। बरसों सुपारी चबाते रहने की वजह से उनके दांत सड़ चुके थे। उन्हें हर दम डर लगा रहता था कि कहीं उनका दरबारी जलन के मारे उन्हें जहर दे देगा। इसीलिए वह जहां भी जाते थे,अपने साथ एक खाना चखने वाला ले जाते थे। जिसे उनके साथ खाना पड़ता था।

उनके खाने में हमेशा एक ही बंधी हुई चीजें होती थीं। जैसे मलाई, मिठाई, फल, सुपारी और रात में एक प्याली अफीम। निजाम हिन्दुस्तान के एकमात्र शासक थे ,जिन्हें ‘एक्जाल्टेड हाइनेस’ का खिताब मिला था। अंग्रेजी तख्त के सबसे निष्ठावान मित्र थे। बहुत मजहबी और आलिम मुसलमान थे। वह और मुस्लिम शासक वर्ग के कुछ लोग मिलकर भारत की सबसे विस्तृत और सबसे बड़ी आबादी वाली रियासत पर शासन करते थे।

निजाम ने पहले विश्व युद्ध के समय अंग्रेजों के युद्ध कोष में ढाई करोड़ पौंड की रकम दी थी। निजाम की अपार धन -दौलत के साथ- साथ उनकी कंजूसी की भी बड़ी चर्चा थी। वह बहुत ही मैला सूती पायजामा पहनते थे। उनके पैरों में बहुत ही घटिया किस्म की जूतियां होती थीं। जो वह बाजार से कुछ ही रुपए में मंगा लेते थे। पैंतीस साल से वह वही एक फंफूदी लगी हुई तुर्की टोपी पहनते आए थे। इसके अलावा भी उनकी कई अजीब ओ गरीब कहानियां प्रचलित थीं।’’

(लेखक राजनीतिक मामलों के जानकार और वरिष्ठ पत्रकार हैं)

हिंदी में शेयर बाजार स्टॉक मार्केट न्यूज़,  बिजनेस न्यूज़,  पर्सनल फाइनेंस और अन्य देश से जुड़ी खबरें सबसे पहले मनीकंट्रोल हिंदी पर पढ़ें. डेली मार्केट अपडेट के लिए Moneycontrol App  डाउनलोड करें।