कंधार विमान अपहरण के समय पहले तो "किसी भी कीमत पर" बंधकों की रिहाई पर दलों के बीच आम सहमति बन गई थी। पर, केंद्र सरकार ने जब एक कीमत देकर बंधकों को रिहा करवा दिया तो बाद में कई राजनीतिक दल अपनी बात से पलट गए। क्योंकि उस दुर्भाग्यपूर्ण घटना से दलों ने राजनीतिक फायदा उठाने की कोशिश की। अब तो लगता है कि इस तरह के मामलों में इस देश के राजनीतिक दलों की यही फितरत बन चुकी है। यह देश की सुरक्षा के लिए खतरे की घंटी है। चिंताजनक बात यह है कि ऐसी राजनीति देश की सीमाओं की रक्षा के मामलों में भी होती रहती है। मुंबई के ताज होटल पर सन 2008 में हुए आतंकी हमले के समय भी यही हुआ।
