"दुर्भाग्यपूर्ण है कि हिंदुओं के पवित्र स्थान को गिरा कर यहां पर मस्जिद बना दी गई लेकिन अब बहुत मुश्किल है इस शिकायत का कोई हल निकल पाना क्योंकि इस घटना के 356 साल गुजर चुके हैं। इसलिए अब जो किया जा सकता है वह यही है कि सभी पक्ष स्टेटस यानि यथास्थिति बनाए रखे। यानी मस्जिद में नमाज होती रहे और बाबरी मस्जिद से लगे चबूतरे पर राम लला की पूजा हो।"
कर्नल एफ ई ए शेमियर, जिला जज फैजाबाद वर्ष 1886 ई इस टिप्पणी के साथ जिला जज ने महंत रघुवर दास कि उस मुकदमे को खारिज कर दिया जिसमें उन्होंने मस्जिद के बगल में चबूतरे में मंदिर बनाने की अनुमति मांगी थी और यह दावा किया था कि राम जन्मभूमि तोड़कर मस्जिद का निर्माण किया गया है। जिला जज ने स्वयं उसे क्षेत्र का निरीक्षण किया और जांच में पाया कि राम मंदिर को तोड़कर मस्जिद का निर्माण किया गया। जिला जज की यह टिप्पणी बहुत महत्वपूर्ण थी।
आखिर कब राम चबूतरे पर मूर्तियां स्थापित की गईं?
इस संवाददाता ने अयोध्या कवरेज के दौरान यह जानने की उत्सुकता हमेशा रही कि बाबरी ढांचे से जुड़े हुए राम चबूतरे पर मूर्तियां कब स्थापित की गई थी और वहां अनवरत कीर्तन कब से चल रहा था। जो आंखोंसे देखा वह यही था कि अयोध्या के तमाम साधु संत उस चबूतरे के बाहर बैठकर राम नाम संकीर्तन किया करते थे । जबकि बड़ी संख्या में श्रद्धालू वहां पहुंच कर बाहर से ही राम लगा के दर्शन करते थे और और साधु सेवा भी करते थे।
जब-जब इस संवाददाता ने साधु संतों से जानने का प्रयास किया की यह संकीर्तन कब से चल रहा है तो यही बताया कि जब से राम जन्मभूमि मंदिर को तोड़ा गया तभी से भक्तों ने संकीर्तन चालू किया। क्योंकि वह मानते रहे कि एक न एक दिन राम लला अपने मूल जन्मभूमि स्थान पर विराजमान होंगे। जांच पड़ताल के बाद यह तो पता चल गया की तमाम विवादो और टकराव के बीच अकबर के समय में मस्जिद के बगल में एक चबूतरे का निर्माण हुआ और वह राम चबूतरा कहलाया।
संत और बैरागी उस भूमि पर अपना दावा छोड़ने को तैयार नहीं थे। तमाम संतों की बातों पर गौर करें तो पता चलता है की गुप्तार घाट से मूर्तियों को हाथी में रख कर अयोध्या के रामकोट स्थित बाबरी मस्जिद से सटे इस परिसर में बनाए गए राम चबूतरे मे स्थापित किया गया था। दिनभर वहां पर पूजा अर्चना होती थी और सुरक्षा को देखते हुए वहां पर बैरागी और साथ में श्रद्धालु डटे रहते थे। उस चबूतरे के बाहर हारमोनियम की धुन के साथ सीता राम सीता राम का कीर्तन भी चलता रहता था।
वास्तव में बाबरी मस्जिद निर्माण के बाद यह मामला कभी शांत नहीं हुआ और आग किसी न किसी तरह सुलगती ही रही। 1885 में निर्मोही अखाड़े के महंत बाबा रघुवर दास ने इस मामले पर पहली बार कानूनी लड़ाई लड़ी। यही नहीं उन्होंने बाबरी मस्जिद से सटाकर एक भव्य मंदिर बनाने के लिए निर्माण शुरू भी कराया लेकिन अदालती आदेश के बाद उसे रुकवा दिया गया।
राम मंदिर गिराने के बाद पहला दंगा कब हुआ था?
राम मंदिर के गिराए जाने के बाद इस बात के को लेकर कई बार प्रयास हुए कि वहां पर हिंदुओं को पूजा करने दी जाए। 1852 में इस मामले को लेकर फिर दंगा हुआ और बाबरी मस्जिद पर कब्जे का प्रयास हुआ। लेकिन अंग्रेजों ने वहां पर शांति व्यवस्था कायम कराई और आदेश दिया की मस्जिद के अंदर नमाज होगी और बाहर राम चबूतरे पर पूजा होगी। अयोध्या में बगल में राम चबूतरे में पूजा अर्चना करने और एक छोटा सा मंदिर बनाने की अनुमति की मांग वाजिद अली शाह से भी की गई थी और वाजिद अली शाह ने इसकी अनुमति दे दी।
मुस्लिम समाज के कुछ लोगो ने इसका विरोध किया और उनसे शिकायत की । इसके उत्तर में वाजिद अली शाह की जुबान से आसफुद्दौला की यह लाइन निकली कि "हम इश्क के बंदे हैं मजहब से नहीं वाकिफ। काबा हुआ तो क्या बुतखाना हुआ तो क्या।" लेकिन राम चबूतरे पर पूजा की अनुमति तो मिली लेकिन मंदिर बनाने की नहीं। गदर के बाद कई क्षेत्रों में इस तरह धार्मिक स्थलों को लेकर विवाद उभरे थे और अंग्रेज इससे सतर्क थे इसीलिए उन परिसरों की घेरा बंदी की गई यहां पर विवाद थे।
अदालत की लड़ाई में महंत रघुवर दास सफल नहीं हुए और उन्हें वहां मंदिर बनाने की अनुमति नहीं दी गई लेकिन यह विवाद धीरे-धीरे और तूल पकड़ता चला गया। 1912 और 1934 में बाबरी मस्जिद पर हमला किया गया और उस पर तोड़फोड़ की गई। ढांचे को क्षति पहुंची और अंग्रेजों ने स्थिति को संभालने के लिए उसे ढांचे की मरम्मत कराई और इसका काम एक मुस्लिम ठेकेदार को सौपा गया । इस परिसर को लेकर कुछ तथ्य चौकते है।
वास्तव में यह मस्जिद वक्फ की जमीन पर नहीं बनी और कागजों में यह मस्जिद जन्मभूमि के नाम से जानी जाती रही। साफ है की मस्जिद तो बन गई लेकिन कागजों में जन्मभूमि मस्जिद के नाम से ही पुकारा जाता रहा और दर्ज भी रही। 1861 में राजस्व के रिकॉर्ड में कुछ हेरा फेरी हुई और अलग से जामा मस्जिद और मस्जिद शब्द जोड़ा गया । बाद में उत्तर प्रदेश सरकार की जांच में यह हेरा फेरी साबित भी हुई।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)