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रतन टाटा पारसी समुदाय से थे, फिर टाटा सरनेम कैसे पड़ा? टाटा का क्या है मतलब, यहां जानिए पूरी डिटेल

राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग के उपाध्यक्ष केरसी कैखुशरू देबू ने Moneycontrol के पॉडकास्ट 'संवाद' में बताया कि जमेशदजी टाटा के पूर्वज दस्तूर परिवार से आते थे। नेटवर्क18 के ग्रुप एडिटर कन्वर्जेंस ब्रजेश कुमार सिंह के साथ बातचीत में उन्होंने दस्तूर से 'टाटा' सरनेम पड़ने के पीछे की दिलचस्प कहानी सुनाई

MoneyControl Newsअपडेटेड Oct 13, 2024 पर 12:38 AM
रतन टाटा पारसी समुदाय से थे, फिर टाटा सरनेम कैसे पड़ा? टाटा का क्या है मतलब, यहां जानिए पूरी डिटेल
Tata's family tree: एक अहम सवाल ये है कि रतन टाटा जब पारसी थे, तो फिर उनका सरनेम ‘टाटा’ कैसे पड़ा?

देश के जाने-माने उद्योगपति, समाजसेवी और टाटा ग्रुप के मानद चेयरमैन रतन नवल टाटा अब हमारे बीच नहीं है। वह अपने पीछे एक बड़ी विरासत छोड़ गए हैं। रतन टाटा पारसी समुदाय से आते थे। हालांकि पारसी समुदाय में टाटा कोई सरनेम नहीं है। ऐसे में कई लोगों के लिए यह जानना दिलचस्प हो सकता है कि आखिर उनका सरनेम ‘टाटा’ कैसे पड़ा? इसका जवाब जानने के लिए सबसे पहले रतन टाटा की वंशावली के बारे में जानना जरूरी है।

रतन टाटा के वंश की शुरुआत नुसरवानजी टाटा से मानी जाती है। इन्हें ‘टाटा’ परिवार का कुलपति कहा जाता है। टाटा के वंश की शुरुआत यहीं से होती है। वो एक पारसी पुजारी थे। उन्हें दस्तूर कहा जाता है। जैसे हिंदुओं में पूजा पाठ कराने वालों को ब्राह्मण कहा जाता है। वैसे ही पारसी में पूजा पाठ कराने वालों को दस्तूर कहा जाता है।

दस्तूर पारसी से टाटा कैसे बन गए?

राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग के उपाध्यक्ष केरसी कैखुशरू देबू ने Moneycontrol के पॉडकास्ट 'संवाद' में बताया कि जमेशदजी टाटा के पूर्वज दस्तूर परिवार से आते थे। ये पारसियों में पुजारी वर्ग होता है। नेटवर्क18 के ग्रुप एडिटर कन्वर्जेंस ब्रजेश कुमार सिंह के साथ बातचीत में उन्होंने कहा कि नुसरवानजी टाटा के बेटे जमशेदजी अपने पिता के मुकाबले कुछ बड़ा बिजनेस करना चाहते थे। इसके लिए उन्होंने मुंबई का रूख किया। उस दौरान जमशेद जी के पिता ने उन्हें करीब 21,000 रुपये कारोबार करने के लिए दिए थे।

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