संत सियाराम बाबा का निधन हो गया। बाबा ने बुधवार मोक्षदा एकादशी पर बुधवार सुबह 6:10 बजे अंतिम सांस ली। देश भर में उनके अनुयायियों में शोक की लहर है। उनकी उम्र 100 साल से अधिक बताई जा रही है। बाबा पिछले 10 दिनों से निमोनिया से पीड़ित थे। मेडिकल टीम की निगरानी में स्वास्थ्य की निगरानी हो रही थी। इंदौर के डॉक्टरों ने उनका इलाज किया था। शाम 4 नर्मदा नदी किनारे भटयान आश्रम क्षेत्र में अंत्येष्टि होगी। इसमें मध्य प्रदेश के सीएम मोहन यादव भी शामिल होंगे। बाबा मूल रूप से गुजरात के रहने वाले हैं। यहां कई सालों से नर्मदा भक्ति कर रहे थे।
उनके निधन की खबर के बाद देशभर में उनके अनुयायियों में शौक की लहर फैल गई। बड़ी संख्या में भक्त आश्रम पहुंच रहे हैँ। बाबा का आश्रम मध्य प्रदेश खरगोन जिले से करीह 65 किमी दूर भट्यान गांव में नर्मदा के किनारे हैं। गांव के लोग बाबा से जुड़ी चमत्कारिक घटनाएं बताते हैं। मूलतः गुजरात के बाबा यहां कई सालों से नर्मदा भक्ति कर रहे थे। बाबा का जन्म 1933 में गुजरात के भावनगर में हुआ था। 17 साल की उम्र में उन्होंने आध्यात्मिक मार्ग पर चलने का फैसला किया था।
शाम को नर्मदा किनारे होगी अंत्येष्टी
सियाराम बाबा की अंत्येष्टी आज (11 दिसंबर 2024) शाम को आश्रम के नजदीक नर्मदा नदी किनारे की जाएगी। सीएम मोहन यादव की बाबा के अंतिम दर्शन के लिए आएंगे। बता दें कि बाबा को निमोनिया हो गया था, लेकिन वे अस्पताल में रहने के बजाए आश्रम में रहकर अपने भक्तों से मिलना चाहते थे। इस कारण डॉक्टरों ने उन्हें अस्पताल से डिस्चार्ज कर दिया था। बाबा ने नर्मदा नदी के किनारे एक पेड़ के नीचे तपस्या की थी। 12 सालों तक मौन रहकर अपनी साधना पूरी की थी। मौन व्रत तोड़ने के बाद उन्होंने पहला शब्द सियाराम बाबा कहा तो भक्त उन्हें उसी नाम से पुकारने लगे। हर महीने हजारों भक्त उनके आश्रम में आते हैं। बाबा ने कई सालों तक गुरु के साथ पढ़ाई की और तीर्थ भ्रमण किया। वे 1962 में भट्याण आए थे।
श्रद्धालुओं को अपने हाथ से बनाकर देते थे चाय
बाबा रोजाना रामायण पाठ का करते थे। आश्रम पर आने वाले श्रद्धालुओं को खुद अपने हाथों से चाय बनाकर प्रसाद के रूप में देते थे। बाबा के लिए गांव से पांच छह घरों से भोजन का टिफिन आता था। जिसे बाबा एक पात्र में मिलाकर लेते थे। खुद की जरूरत के अनुसार भोजन निकाल कर बचा भोजन पशु-पक्षियों में बांट देते थे।
सिर्फ 10 रुपये लेते थे दान और करोड़ों रुपये कर दिए दान
बाबा भक्तों से सिर्फ 10 रुपये ही दान के रूप में लेते थे। अगर कोई ज्यादा देते तो लेने से इनकार कर देते थे। बाबा 2.58 करोड़ रुपए मशहूर तीर्थ स्थान नागलवाड़ी मंदिर में दान कर चुके हैं। वही लगभग 20 लाख रुपये और चांदी का छत्र जाम घाट स्थित पार्वती माता मंदिर में दान कर चुके हैं।