भुवन भास्कर
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कई बार अपने भाषणों में गर्व से यह बता चुके हैं कि किस तरह उनकी सरकार ने अंग्रेजों के जमाने के रद्दी हो चुके सैकड़ों कानूनों को हटाया है। इसी कड़ी में सरकार एक और कानून को जोड़ने जा रही है। यह कानून है रक्षा सेनाओं के स्वामित्व में मौजूद लाखों एकड़ रियल एस्टेट को सेना और रक्षा मंत्रालय के अभेद्य कवच से बाहर लाना।
मोदी सरकार चाहती है कि सेना के अधिकार में मौजूद जमीनों को सार्वजनिक महत्व की परियोजनाओं के लिए अधिग्रहित किया जाए। ऐसा पिछले लगभग 250 वर्षों से नहीं हुआ है। तब से जब कोलकाता के निकट 1765 में पहली बार अंग्रेजों ने बैरकपुर छावनी बनाई थी।
बाद में अप्रैल 1801 में अंग्रेज सरकार ने बाकायदा यह नियम बना दिया कि कोई भी व्यक्ति जो सेना में शामिल नहीं है, वह छावनी इलाके में न तो कोई संपत्ति खरीद सकता है न रख सकता है। तब से छावनी का इलाका नागरिक प्रशासन के लिए एक ऐसा क्षेत्र रहा है, जिसकी ओर आंख उठा कर भी नहीं देखा जा सकता। यह स्थिति आजादी के 75 साल बाद तक भी बनी हुई है।
लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि नागरिक प्रशासन, जिसकी लगाम आमतौर पर राजनेताओं के हाथ में होती है, की नजर छावनी इलाकों पर थी नहीं। दरअसल अंग्रेजों के समय भले ही ये छावनियां शहर से बाहर बनती हों, लेकिन पिछले कुछ दशकों में हुए शहरीकरण ने इन इलाकों को ज्यादातर शहरों के बीचोंबीच ला दिया है।
जाहिर है कि सरकारों की नजर हमेशा से इन इलाकों पर रही। 1991 में तत्कालीन रक्षा मंत्री शरद पवार ने छावनियों को औपनिवेशिक इतिहास के अवशेष बताते हुए उन्हें खत्म करने का विचार छेड़ा तो था, लेकिन उस पर इतनी तीखी प्रतिक्रिया देश भर में हुई कि फिर न तो पवार ने और न ही किसी और सरकार ने इस विचार को आगे बढ़ाने पर काम किया।
लेकिन बात केवल छावनियों की ही नहीं है। रक्षा संपत्ति महानिदेशालय के मुताबिक रक्षा मंत्रालय के अधिकार में कुल 17.95 लाख एकड़ जमीन है, जिसमें से 16.35 लाख एकड़ जमीन देश भर में फैली 62 छावनियों से बाहर है। इनमें लाखों एकड़ जमीन ऐसी है, जो बेकार पड़ी है।
मोदी सरकार अब ऐसी ही जमीन का उपयोग सार्वजनिक हित की परियोजनाओं के लिए करना चाहती है। नए नियम के मुताबिक यदि कोई भी सशस्त्र सेनाओं से जमीन लेता है, तो उसे उसी मूल्य का इंफ्रास्ट्रक्चर (EVI) सेना के लिए विकसित करना होगा।
EVI के लिए सरकार ने 8 क्षेत्र तय किये हैं, जिनमें यूनिट और सड़कों का निर्माण भी शामिल है। सेना के अधिकार वाली जमीन की कीमत तय करने के लिए उसे दो हिस्सों में बांटा गया है। एक, छावनी इलाके की जमीन और दूसरी, अन्य इलाकों में मौजूद जमीन। छावनी इलाके में जो जमीन होगी, उसकी कीमत का निर्धारण एक समिति करेगी, जिसकी अगुवाई स्थानीय सैनिक अधिकारी करेंगे। वहीं छावनी से बाहर की जमीन का मूल्य निर्धारण जिलाधिकारी करेंगे।
इसमें कोई दो राय नहीं हो सकती कि रक्षा सेनाओं की बेकार पड़ी अनुपयोगी जमीन को सड़क, रेल, फ्लाईओवर, मेट्रो जैसी जनहितकारी परियोजनाओं के लिए इस्तेमाल में लाना एक अच्छा आइडिया है। लेकिन जो असली सवाल है, वह ये कि लाखों एकड़ जमीन की बिक्री से रक्षा मंत्रालय को जो हजारों करोड़ रुपये हासिल होंगे, उसका इस्तेमाल क्या होगा?
अभी हालांकि यह साफ नहीं है, लेकिन इसे वित्त मंत्रालय के प्रस्तावित आधुनिकीकरण फंड (मॉडर्नाइजेशन फंड) से जोड़ा जा रहा है, जिसकी कोई मियाद नहीं होगी।
माना जा रहा है कि वित्त मंत्रालय ने इस फंड के लिए रकम जुटाने को रक्षा सेनाओं की जमीन बेचने को ही एकमात्र विकल्प माना है। आधुनिकीकरण फंड का इतिहास लगभग दो दशक पुराना है।
अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के समय 2003-04 के अंतरिम बजट में तत्कालीन वित्त मंत्री जसवंत सिंह 25,000 करोड़ रुपये के एक ऐसे फंड का प्रस्ताव किया था, जो रक्षा मंत्रालय को उपलब्ध कराया जाएगा। लेकिन उसके बाद के वर्षों में वित्त मंत्रालय ने लगातार इस फंड के गठन का विरोध किया, चाहे वित्त मंत्री जो भी हो।
अब 15वें वित्त आयोग ने 1 फरवरी को सार्वजनिक की गई अपनी रिपोर्ट में एक बार फिर इस फंड की सिफारिश की है। इसके कुछ ही समय बाद वित्त मंत्री निर्मला सीतारमन ने इस पर सैद्धांतिक सहमित भी जता दी।
ऐसे में इस बात की पूरी संभावना है कि छावनी अधिनियम 2020 के जरिए बेची जाने वाली रक्षा सेनाओं की जमीन से मिलने वाली रकम को आधुनिकीकरण फंड में ही डाला जाएगा।
यह फंड खर्च करने के लिए रक्षा मंत्रालय को मिलेगा। जाहिर है कि रक्षा मंत्रालय इस फंड को दो तरह से इस्तेमाल कर सकता है- पहला, वेतन, पेंशन और मंत्रालय के कामकाजी खर्च में और दूसरा देश की रक्षा क्षमता को बढ़ाने के लिए पूंजीगत खर्च में।
देखने की बात होगी कि जिस तरह EVI के तहत 8 परियोजनाएं तय की गई हैं, जिनमें रक्षा सेनाओं की जमीन खरीदने वाले को विकास करना होगा, उसी तरह अधिनियम में इन जमीनों को बेचने से मिलने वाली रकम के खर्च की रूपरेखा भी तय करनी चाहिए।
यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि इस फंड का इस्तेमाल सशस्त्र सेनाओं के आधुनिकीकरण में ही हो, जिसका हिस्सा अत्याधुनिक तकनीक और उपकरण हो सकते हैं। तभी 250 साल बाद रक्षा सेनाओं की जमीन से जुड़ी नीति बदलने का सही लाभ हो
