सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) की पांच जजों की बेंच ने स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) के चेयरमैन को 18 मार्च को एक आदेश दिया। इसमें उन्हें एक शपथपत्र देना होगा, जिसमें यह बताना होगा कि बैंक ने इलेक्टोरल बॉन्ड्स से जुड़ी सभी जानकारियां चुनाव आयोग (ECI) को सौंप दिया है। एक हफ्ते के अंदर यह सुप्रीम कोर्ट का इलेक्टोरल बॉन्ड्स मामले में दूसरा आदेश है। देश की सबसे बड़ी अदालत ने 15 फरवरी को इलेक्टोरल बॉन्ड्स मामले में अपने आदेश का सही मतलब नहीं समझने के लिए दूसरी बार एसबीआई चेयरमैन को फटकार लगाई है। मनीकंट्रोल आपको इस मामले में कोर्ट के निर्देश का मतलब और उन स्थितियों के बारे में बता रहा है, जिसमें सुप्रीम कोर्ट को एक हफ्ते में दो बार एसबीआई चेयरमैन को हलफनामा देने का आदेश देना पड़ा।
सुप्रीम कोर्ट ने इस साल फरवरी में इलेक्टोरल बॉन्ड्स स्कीम को असंवैधानिक ठहराया था। उसने कहा था कि राजनीतिक दलों को दिए गए चंदे की जानकारी उजागर नहीं करना नागरिकों के सूचना के अधिकार का उल्लंघन है। कोर्ट ने SBI को इलेक्टोरल बॉन्ड्स से जुड़ी सभी जानकारियां 6 मार्च तक चुनाव आयोग को सौंपने को कहा था। चुनाव आयोग को इन जानकारियों को 13 मार्च तक सार्वजनिक करने को कहा गया था।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा था, "एसबीआई को राजनीतिक दलों की तरफ भुनाए गए हर बॉन्ड की जानकारी देनी होगी। इसमें बॉन्ड भुनाने की तारीख और बॉन्ड की वैल्यू भी शामिल होगी।" लेकिन, एसबीआई ने 4 मार्च को सुप्रीम कोर्ट में एक अप्लिकेशन दिया, जिसमें इलेक्टोरल बॉन्ड्स से जुड़ी जानकारियां देने के लिए 30 जून तक का समय देने की गुजारिश की गई थी। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने एसबीआई पर नाराजगी जताई। उसका कहना था कि एसबीआई ने यह याचिका क्यों दाखिल की जब मामले की सुनवाई के लिए पहले से 11 मार्च की तारीख तय थी।
सुप्रीम कोर्ट ने न सिर्फ एसबीआई की याचिका खारिज कर दी बल्कि एसबीआई चेयरमैन को चुनाव आयोग को सभी जानकारियां सौंप देने के बाद एक हलफनामा भी पेश करने को कहा। एसबीआई ने कहा था कि उसे चंदा देने वाले की डिटेल राजनीतिक पार्टी से मैच कराने के लिए अतिरिक्त समय की जरूरत पड़ेगी। लेकिन, सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि उसे इस तरह की किसी मैचिंग की जरूरत नहीं है। उसे सिर्फ ऐसी सभी जानकारियां सौंपनी हैं, जो उसके पास मौजूद हैं।
सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद एसबीआई ने 12 मार्च को सभी जानकारियां चुनाव आयोग को सौंप दी। चुनाव आयोग ने इन्हें 14 मार्च को प्रकाशित कर दिया। उसके बाद एसबीआई चेयरमैन ने एक हलफनामा पेश कर दिया कि बैंक ने सभी जानकारियां चुनाव आयोग को सौंप दी है।
चुनाव आयोग ने सभी जानकारियां 14 मार्च को पब्लिश कर दी। लेकिन, सुप्रीम कोर्ट का एक दूसरा निर्देश था, जिसका पालन चुनाव आयोग को करना था। इसलिए उसने सुप्रीम कोर्ट के आदेश में बदलाव के लिए एक याचिका दाखिल की। सुप्रीम कोर्ट ने नवंबर 2023 में चुनाव आयोग को एक सीलबंद लिफाफे में राजनीतिक दलों की तरफ से इलेक्टोरल बॉन्ड्स से मिले चंदे और उसका हलफनामा सौंपने को कहा था। फरवरी में अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को सीलबंद लिफाफे में सौंपी गई जानकारियां पब्लिश करने को कहा था।
चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट से वह सभी डॉक्युमेंट्स लौटाने की गुजारिश की जो उसने नवंबर 2023 में सौंपा था। उसका कहना था कि उसके पास उन डॉक्युमेंट्स की कॉपी नहीं है। चूंकि, कोर्ट ने उसे ये डॉक्युमेंट्स पब्लिश करने को कहा था, इसलिए उसे इसकी कॉपी चाहिए।
15 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि वह इन डॉक्युमेंट्स को डिजिटल रूप देगा फिर उसे 16 मार्च की शाम को चुनाव आयोग को वापस कर देगा। उसके बाद चुनाव आयोग सभी डॉक्युमेंट्स अपनी वेबासाइट पर पब्लिश कर सकता है। इस दौरान सुप्रीम कोर्ट ने यह पाया कि एसबीआई ने बॉन्ड के अल्फान्यूमेरिक बॉन्ड नंबर की जानकारी नहीं दी है। इस पर उसने एसबीआई को नोटिस जारी कर पूछा कि उसने आदेश के बाद भी इन नंबर की जानकारी क्यों नहीं दी है। सुप्रीम कोर्ट ने अगली सुनवाई के लिए 18 मार्च की तारीख तय की थी।
सुप्रीम कोर्ट ने बॉन्ड नंबर की डिटेल नहीं देने के लिए एसबीआई को फटकार लगाई। एसबीआई का पक्ष रखने वाले वकील हरीश साल्वे ने कहा कि एसबीआई ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश का मतलब यह निकाला था कि इलेक्टोरल बॉन्ड्स की कुछ जानकारियां देने की जरूरत नहीं है। साल्वे ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पढ़कर यह बताने की कोशिश की कि इसमें बॉन्ड नंबर की जानकारी देने का निर्देश शामिल नहीं है।
इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा, "इस बात में कोई संदेह नहीं है कि एसबीआई को ऐसी सभी जानकारियां देनी है, जो उसके पास है। हम यह स्पष्ट करना चाहते हैं कि इसमें खरीदे गए बॉन्ड्स का अल्फान्यूमेरिक नंबर और सीरियल नंबर शामिल होंगे। भविष्य में किसी तरह के विवाद से बचने के लिए एसबीआई चेयरमैन को 21 मार्च तक शाम 5 बजे तक एक हलफनामा पेश करना होगा जिसमें यह बताया जाएगा कि उसके पास जो भी जानकारियां थी, उसने सौंप दी है और अब उसके पास कोई जानकारी नहीं बची है। "
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