Lok Sabha Elections 2024: प्रियंका गांधी क्या कांग्रेस के गढ़ रायबरेली को बचा पाएंगी, या BJP के हाथ में चली जाएगी ये भी सीट

Lok Sabha Elections 2024: अमेठी का किला ढहने के बाद कांग्रेस किसी भी कीमत पर उत्तर प्रदेश के अपने दूसरे किले को बचाना चाहती है। इसके साथ ही उसकी यह भी कोशिश है कि प्रियंका गांधी चुनाव में मैदान में उतरे जरूर, लेकिन कोई खतरा न होने पाए। वरना पूरे देश में यही संदेश जाएगा की अमेठी से राहुल हारे और रायबरेली सीट पर भी कांग्रेस को खतरा है

अपडेटेड Mar 10, 2024 पर 6:15 AM
Lok Sabha Elections 2024: प्रियंका गांधी क्या कांग्रेस के गढ़ रायबरेली को बचा पाएंगी

Lok Sabha Elections 2024: साल 1977 का लोकसभा का आम चुनाव। आकाश वाणी में चुनाव परिणाम के विशेष समाचार आ रहे थे। देश चुनाव परिणाम जानने के लिए जग रहा था। समाचारों के बाद गीत भी आने लगते थे। रात लगभग दो बजे आकाशवाणी में एक गीत आ रहा था कि "सवेरे वाली गाड़ी से चले जाएंगे।" लोग बेताब थे कि रायबरेली (Raebareli) में क्या हो रहा है। क्योंकि उस चुनाव में उत्तर भारत में कांग्रेस (Congress) का सफाया हो रहा था। रायबरेली से इंदिरा गांधी (Indira Gandhi) चुनाव मैदान में थी, लेकिन आकाशवाणी परिणाम की जानकारी देने के बजाय चुप्पी साधे बैठा था।

रायबरेली के बारे में यह भी नहीं बताया जा रहा था कि उस सीट पर कौन आगे चल रहा है और कौन पीछे। लोगों की धड़कनें बढ़ती जा रही थीं। सुबह लगभग 4 बजे आकाशवाणी ने पहला समाचार यही दिया की इंदिरा गांधी अपने रायबरेली निर्वाचन क्षेत्र से जनता पार्टी के प्रत्याशी राज नारायण से चुनाव हार गई हैं।

रायबरेली गांधी परिवार का मजबूत गढ़


पूरे देश में पहले से ही सत्ता परिवर्तन की लहर चल रही थी, लेकिन इस खबर पर लोगों को भरोसा ही नहीं हो रहा था कि गांधी रायबरेली से भी चुनाव हार भी सकती हैं। गांधी का चुनाव हारना बहुत बड़ी राजनीतिक घटना थी। यह अलग बात है कि रायबरेली के लोगों को उनसे बहुत उम्मीदें थी।

रायबरेली के लोगों को गांधी से बहुत लगाव भी था और उनके प्रति समर्पण भी। रायबरेली हमेशा गांधी परिवार का मजबूत गढ़ रहा है। यह वो जिला है, जहां राणा बेनी माधव ने 1857 के गदर में अंग्रेजों के खिलाफ बगावत की थी और उन्हें अपना किला छोड़ना पड़ा था। बाद में अंग्रेजों ने उनके किले को उड़ा दिया।

यह जिला तमाम ऐतिहासिक घटनाओं को अपने में समेटे है। संकटा देवी का मंदिर यहीं पर है। प्रसिद्ध साहित्यकार महावीर प्रसाद द्विवेदी जी की यही जन्म और कर्मभूमि है, लेकिन इस समय बस एक ही चर्चा है की कांग्रेस का कौन सा प्रत्याशी मैदान में उतरेगा।

कांग्रेस के नेता कहते हैं कि चुनाव लड़ेगी तो सिर्फ प्रियंका गांधी, प्रियंका गांधी और प्रियंका गांधी। उनको मनाने के लिए लगभग 40 से 50 कांग्रेसी दिल्ली गए थे और यह गुहार लगाते रहे कि प्रियंका गांधी चुनाव मैदान में उतरें। लेकिन यह सवाल अभी भी है कि कौन उतरेगा रायबरेली से चुनाव मैदान में।

रायबरेली में बदले राजनीतिक समीकरणों

वास्तव में पिछले एक महीने में रायबरेली के राजनीतिक समीकरणों में काफी फेरबदल हुआ है। समाजवादी पार्टी के दिग्गज नेता मनोज पांडे पार्टी के इस्तीफा देकर बीजेपी में शामिल हो गए। अब बीजेपी में भी यही चर्चा हो रही है कि क्या मनोज पांडे रायबरेली से चुनाव लड़ेंगे। अब दोनों ही दलों में कौन लड़ेगा-कौन लड़ेगा का शोर हो रहा है।

यह वो जिला है, जहां पर यह माना जाता रहा है कि इंदिरा गांधी परिवार का कोई भी चुनाव लड़ जाए वह जीतेगा ही। सोनिया गांधी इस लोकसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करती रही हैं, लेकिन इस बार वह राजस्थान से राज्यसभा पहुंच चुकी हैं और इसके बाद उन्होंने अपने परिवार के प्रति प्रेम और सदभावना बनाए रखने और परिवार को संभालने की भावुक अपील भी की थी।

उनकी अपील से यह लगता है कि सोनिया गांधी के बाद उनकी बेट प्रियंका गांधी चुनाव मैदान में उतर सकती हैं। लेकिन प्रियंका गांधी इस मुद्दे पर कुछ बोलने को तैयार नहीं है। रायबरेली से दिल्ली गए कांग्रेस नेताओं से भी प्रियंका गांधी ने कुछ नहीं कहा और न ही आश्वासन दिया कि वह चुनाव रायबरेली से लड़ेगी।

कांग्रेस के सामने कई चुनौतियां

वास्तव में कांग्रेस के सामने रायबरेली सीट को लेकर काफी चुनौतियां हैं। कांग्रेस के एक नेता कहते हैं कि यह निर्णय लेना आसान नहीं है कि प्रियंका गांधी चुनाव मैदान में उतरे। इसका एक बड़ा कारण भी है। पिछले 5 सालों से बीजेपी रायबरेली जैसे कांग्रेसी किले को भेदने के प्रयास में लगी है। इसके लिए वह लगातार अभियान चलाती रही है।

बीजेपी यही लक्ष्य बनाकर काम करती रही है। अब रायबरेली के सामने दिक्कत यह है कि अगर इस सीट पर प्रियंका गांधी चुनाव नहीं लड़ी, तो यह आसानी से बीजेपी के कब्जे में आ जाएगी। इसलिए यहां पर अपने किले को बचाने के लिए कांग्रेस को मजबूत प्रत्याशी देना ही होगा, लेकिन सवाल यह भी है कि क्या प्रियंका गांधी इस सीट को बचा ले जाएगी।

अमेठी का किला ढहने के बाद कांग्रेस किसी भी कीमत पर उत्तर प्रदेश के अपने दूसरे किले को बचाना चाहती है। इसके साथ ही उसकी यह भी कोशिश है कि प्रियंका गांधी चुनाव में मैदान में उतरे जरूर, लेकिन कोई खतरा न होने पाए। वरना पूरे देश में यही संदेश जाएगा की अमेठी से राहुल हारे और रायबरेली सीट पर भी कांग्रेस को खतरा है।

प्रियंका लडे़ंगे तो क्या होगा?

अब यह आकलन हो रहा है की प्रियंका चुनाव लड़ेगी तो क्या होगा। बीजेपी के व्यूह रचना को कैसे वह भेद पाएगी। वैसे तो जब सोनिया गांधी चुनाव लड़ती थीं, तो उनका चुनाव संचालन प्रियंका गांधी ही करती थी और हर मतदाता जानता था कि सोनिया गांधी सामने है, लेकिन पीछे से प्रियंका गांधी काम करती हैं। वही सबके दुख दर्द सुनती थीं। इसलिए कांग्रेसी प्रियंका गांधी को ही रायबरेली से चुनाव लड़वाने की मांग कर रहे हैं। 2

BJP भी अपनी व्यूह रचना बड़ी मजबूती से कर रही है। उसकी कोशिश है की प्रियंका गांधी मैदान में उतर जाए और फिर उन्हें किसी तरह घेर लिए जाए । इसके लिए वह एक-एक नेता को जोड़ रही है। जहां तक चुनावी समीकरणों की बात है कांग्रेस के लिए यह सीट अब उतनी आसान नहीं है। विशेष रूप से बीजेपी की चक्रव्यूह को भेद पाना थोड़ा कठिन है। इसीलिए कांग्रेस के रणनीतिकार इस सीट पर प्रियंका को लडाने के लिए अभी तक न ही हां कह रहे हैं और न ही ना।

कांग्रेस नेता इस बात के लिए पुख्ता हो जाना चाहते हैं, जब प्रियंका गांधी मैदान में आए, तो सम्मानजनक वोटो से जीत सके। वैसे यह सीट कांग्रेस की पुश्तैनी सीट है 1952 में सबसे पहले प्रियंका गांधी के नाना फिरोज गांधी यहां से चुनाव लड़े थे और वह जीते भी। यही नहीं 1957 में भी फिरोज गांधी चुनाव जीते।

रायबरेली सीट का चुनावी इतिहास

बाद में इंदिरा गांधी 1967 में इसी सीट से चुनाव लड़ी और फिर 1971 में भी वह रायबरेली से ही जीती। 1977 में गांधी अमेठी के चुनाव हार गई। यह बड़ी घटना थी। 1980 में गांधी ने रायबरेली के साथ दक्षिण की चिकमगलूर सीट से भी चुनाव लड़ा और वह दोनों जगह से चुनाव जीती। बाद में उन्होंने रायबरेली सीट छोड़ दी।

गांधी के रायबरेली छोड़ने के बाद उन्हीं के परिवार के अरुण नेहरू चुनाव लड़े और जीते भी। अरुण नेहरू 1984 में भी रायबरेली से ही चुनाव लड़े और जीते। लेकिन 1987 में अरुण नेहरू ने तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी, जो एक ही परिवार से थे बगावत कर दी और वीपी सिंह से जा मिले। तब गांधी परिवार की ही शीला कौल 1989 में रायबरेली से मैदान में उतरी और चुनाव जीत गई।

1991 में भी शीला कौल रायबरेली से चुनाव जीतीं, लेकिन 1996 और 98 में इस सीट पर BJP ने कब्जा कर लिया। 1999 में गांधी परिवार के अति निकट रहे सतीश शर्मा चुनाव लड़े और जीते। लेकिन इसी समय श्रीमती सोनिया गांधी राजनीति में आ गई और वह पहले अमेठी से चुनाव लड़ी और जीती। लेकिन बाद में उन्होंने अमेठी सीट राहुल गांधी के लिए छोड़ दी और खुद रायबरेली आ गई।

सोनिया गांधी 2004 ,2009 ,2014 और फिर 1919 में भी चुनाव जीती । अब इस सीट से कौन चुनाव लड़ेगा इसको लेकर चर्चाएं तेज हैं। लेकिन रायबरेली का यह चुनाव बहुत रोचक होगा । एक तरफ कांग्रेस अपना गढ़ बचाने के लिए चुनाव लड़ेगी और बीजेपी इस किले को छीन लेने के लिए।

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