AI से भारत को ज्यादा नुकसान या फिर अमीर देशों को? रिपोर्ट में चौंकाने वाला दावा

AI को लेकर माना जाता है कि भारत जैसे देशों की नौकरियां सबसे ज्यादा खतरे में हैं। लेकिन एक नई रिपोर्ट बिल्कुल उल्टा दावा करती है। आखिर क्यों विकसित देशों को ज्यादा नुकसान हो सकता है और भारत को कम? जानिए चौंकाने वाला एनालिसिस।

अपडेटेड Jun 11, 2026 पर 4:57 PM
Bernstein की सबसे दिलचस्प दलील यह है कि AI कमाई के अंतर को कम करने का काम कर सकता है।

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) को लेकर आम धारणा है कि इसका सबसे ज्यादा नुकसान भारत, इंडोनेशिया और मेक्सिको जैसे देशों को होगा। इसकी वजह यह है कि इन देशों की अर्थव्यवस्था काफी हद तक कम लागत वाले श्रम पर आधारित है।

यह भी माना जाता है कि AI सबसे पहले एंट्री लेवल और नॉलेज वाली नौकरियों को प्रभावित करेगा। हालांकि, Bernstein Research की नई रिपोर्ट इससे अलग तस्वीर पेश करती है। रिपोर्ट का दावा है कि AI का असर विकसित देशों पर उम्मीद से ज्यादा और भारत जैसे देशों पर उम्मीद से कम हो सकता है।

भारत जैसे देशों को कम खतरा क्यों?


Bernstein का कहना है कि ज्यादातर लोग यह मानकर चल रहे हैं कि AI का सबसे बड़ा असर नॉलेज और इंफॉर्मेशन सेक्टर पर पड़ेगा। लेकिन हकीकत यह है कि मिडिल इनकम देशों में ऐसे सेक्टर कुल रोजगार का सिर्फ 1% से 4% हिस्सा हैं। वहीं विकसित देशों में यह हिस्सा 6% से 10% तक है।

इसी तरह सर्विस सेक्टर भी मिडिल इनकम देशों की अर्थव्यवस्था का लगभग 50% से 60% हिस्सा है। विकसित देशों में यह 70% से ज्यादा है। ऐसे में AI का असर विकसित अर्थव्यवस्थाओं पर ज्यादा पड़ सकता है।

सैलरी का हिसाब क्या कहता है?

रिपोर्ट के मुताबिक, AI के प्रभाव को समझने के लिए सैलरी सबसे अहम फैक्टर है। भारत में एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर की औसत सालाना सैलरी करीब 10,000 डॉलर है। वहीं अमेरिका में यही आंकड़ा लगभग 1.3 लाख डॉलर और ब्रिटेन में करीब 80,000 डॉलर है।

Bernstein का कहना है कि 10,000 डॉलर कमाने वाले कर्मचारी की जगह AI लगाने से कंपनियों को बहुत बड़ी बचत नहीं होती। लेकिन अगर 1 लाख डॉलर या उससे ज्यादा वेतन पाने वाले कर्मचारी की जगह AI इस्तेमाल किया जाए, तो लागत में भारी कमी आ सकती है। यही वजह है कि विकसित देशों की नौकरियां ज्यादा जोखिम में हो सकती हैं।

फिर भारतीय बाजार पर दबाव क्यों?

रिपोर्ट के मुताबिक, शेयर बाजार अक्सर लंबी अवधि की बजाय अगले कुछ महीनों या तिमाहियों पर ज्यादा ध्यान देते हैं। भारत के प्रमुख शेयर सूचकांकों में IT सर्विस कंपनियों का हिस्सा करीब 10% है। AI को लेकर बढ़ती चिंता का असर सबसे पहले इन्हीं कंपनियों पर दिखा।

इसके अलावा उभरते बाजारों में AI से सीधे फायदा उठाने वाली बड़ी कंपनियों की संख्या भी कम है। इसी वजह से AI की कहानी सामने आने के बाद भारतीय और इंडोनेशियाई बाजारों में ज्यादा दबाव देखने को मिला।

AI बनेगा 'ग्रेट लेवलर'?

Bernstein की सबसे दिलचस्प दलील यह है कि AI कमाई के अंतर को कम करने का काम कर सकता है। रिपोर्ट का अनुमान है कि AI की वजह से मिडिल इनकम देशों की राष्ट्रीय आय पर औसतन 10% असर पड़ सकता है। विकसित देशों में यह असर करीब 22% तक हो सकता है।

रिपोर्ट के अनुसार, सबसे ज्यादा दबाव शीर्ष 1% अमीर लोगों के ठीक नीचे वाले उच्च आय वर्ग पर पड़ सकता है। ऐसे में विकसित और विकासशील देशों के बीच आय का अंतर कुछ हद तक कम हो सकता है।

AI का इस्तेमाल लगातार बढ़ता रहा तो?

Bernstein का मानना है कि शुरुआत में कंपनियां AI अपनाकर अपनी प्रोडक्टिविटी बढ़ाएंगी और लागत घटाएंगी। लेकिन अगर AI का इस्तेमाल बिना किसी सीमा के बढ़ता रहा, तो एक समय ऐसा आ सकता है जब खत्म होने वाली नौकरियां नई नौकरियों से ज्यादा हो जाएं।

ऐसी स्थिति में लोगों की कमाई घट सकती है, मांग कमजोर पड़ सकती है। इसका असर पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था पर दिख सकता है। रिपोर्ट इसे अर्थव्यवस्था के लिए एक गंभीर जोखिम मानती है।

AI पिछली तकनीकों से अलग क्यों है?

रिपोर्ट के मुताबिक, AI की तुलना औद्योगिक क्रांति या कंप्यूटर युग से नहीं की जा सकती। उन तकनीकों ने इंसानों की प्रोडक्टिविटी बढ़ाई थी। वहीं, AI का मकसद कई मामलों में इंसानी दिमाग से जुड़े कामों को सीधे बदलना है।

Bernstein का कहना है कि AI नई इंडस्ट्री बनाने से ज्यादा मौजूदा उद्योगों को बदलने पर केंद्रित है। इसलिए यह जरूरी नहीं कि जितनी नौकरियां खत्म हों, उतनी नई नौकरियां भी पैदा हों।

भारत के IT सेक्टर पर क्या असर पड़ेगा?

रिपोर्ट मानती है कि शॉर्ट टर्म में भारत की IT सर्विस कंपनियों पर दबाव रह सकता है। हालांकि Bernstein का मानना है कि बाजार ने इस जोखिम को शायद जरूरत से ज्यादा अहमियत दे दी है।

कंपनियों को AI अपनाने, सिस्टम बदलने और नई तकनीक लागू करने के लिए अभी भी IT सर्विस कंपनियों की जरूरत पड़ेगी। इससे भारतीय IT कंपनियों को कुछ हद तक सहारा मिल सकता है।

आगे क्या हो सकता है?

Bernstein को उम्मीद है कि आने वाले समय में AI पर सख्त नियम लागू हो सकते हैं। सरकारें न्यूनतम रोजगार नियम, AI के इस्तेमाल पर कुछ सीमाएं, यूनिवर्सल बेसिक इनकम (UBI) या AI पर टैक्स जैसे कदमों पर विचार कर सकती हैं।

रिपोर्ट का मानना है कि लंबे समय में AI आय के अंतर को बढ़ाने के बजाय कम भी कर सकता है। हालांकि यह बदलाव समाज और अर्थव्यवस्था के लिए कितना अच्छा या बुरा साबित होगा, इसका जवाब अभी भविष्य के गर्भ में है।

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