इंटरेस्ट रेट घटने वाला है, अभी बैंकिंग और NBFC में से किसमें निवेश करने में ज्यादा फायदा?

अमेरिका में इंटरेस्ट रेट पिछले हफ्ते 50 बेसिस प्वाइंट्स घटने के बाद नजरें अब आरबीआई पर लगी हैं। RBI के इंटरेस्ट रेट घटाने का असर बैंकों और NBFC पर पड़ेगा। इससे दोनों के लिए फंड की कॉस्ट कम हो जाएगी। लेकिन, बैंकों और एनबीएफसी के मुनाफे पर इसका अलग-अलग तरह से असर पड़ेगा

अपडेटेड Sep 25, 2024 पर 2:17 PM
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इस फाइनेंशियल ईयर की दूसरी छमाही में आरबीआई इंटरेस्ट रेट में कमी का सिलसिला शुरू कर सकता है। वह इंटरेस्ट रेट में 25-25 बेसिस प्वाइंट्स की कमी दो बार कर सकता है।

अमेरिका में पिछले हफ्ते फेडरल रिजर्व के इंटरेस्ट रेट घटाने के बाद अब नजरें आरबीआई पर लगी हैं। आरबीआई की मॉनेटरी पॉलिसी कमेटी (एमपीसी) की मीटिंग अगले महीने होने वाली है। आरबीआई यह कह चुका है कि उसका फोकस इनफ्लेशन को नियंत्रण में लाने पर बना रहेगा। इसलिए अक्टूबर में एमपीसी की बैठक में इंटरेस्ट रेट में कमी की उम्मीद नहीं दिख रही। इस फाइनेंशियल ईयर की दूसरी छमाही में आरबीआई इंटरेस्ट रेट में कमी का सिलसिला शुरू कर सकता है। वह इंटरेस्ट रेट में 25-25 बेसिस प्वाइंट्स की कमी दो बार कर सकता है।

इंटरेस्ट रेट घटने से फंड की कॉस्ट में कमी आएगी

RBI के इंटरेस्ट रेट घटाने का असर बैंकों और NBFC पर पड़ेगा। इससे दोनों के लिए फंड की कॉस्ट कम हो जाएगी। लेकिन, बैंकों और एनबीएफसी के मुनाफे पर इसका अलग-अलग तरह से असर पड़ेगा। बैंकों के मुनाफे में अच्छी ग्रोथ देखने को मिली है। FY20-FY24 के बीच रिटर्न ऑन एसेट्स (RoA) जिस तरह से बढ़ा है, उससे इसकी पुष्टी हुई है। बैकों को क्रेडिट की अच्छी मांग, हाई नेट इंटरेस्ट मार्जिन (NIM) और क्रेडिट की कम कॉस्ट का फायदा मिला है। FY24 में शिड्यूल्ड कमर्शियल बैंकों (SCB) का RoA 1.3 फीसदी और RoE (रिटर्न ऑन इक्विटी) 13.8 फीसदी रहा। बड़े प्राइवेट बैंकों का आरओई करीब 2 फीसदी रहा।


बैंकों के NIM पर दिख रहा दबाव

इससे बैंकों का प्रॉफिट रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंच गया। लेकिन, पिछली दो तिमाहियों से NIM पर दबाव दिख रहा है। मई 2022 से अब तक रेपो रेट 250 बेसिस प्वाइंट्स बढ़कर 6.5 फीसदी पहुंच गया है। अप्रैल 2022 से जुलाई 2024 के बीच लेंडिग रेट बढ़कर 9.40 फीसदी हो गया है, जबकि डिपॉजिट रेट 6.48 फीसदी पर आ गया है। पिछले कुछ समय से बैंकिंग सेक्टर में प्रतियोगिता बढ़ी है, जिससे बैंकों की यील्ड में गिरावट आई है। आरबीआई ने ज्यादा यील्ड वाले अनसेक्योर्ड लोन पर सख्ती बढ़ाई है। इसका असर भी बैंकों पर पड़ा है। इससे आगे बैंकों के लेंडिंग रेट पर दबाब बना रह सकता है।

बैंकों के मुकाबले एनबीएफसी को रेट कट का ज्यादा फायदा

बैंकों के मुकाबले कई बातें NBFC के पक्ष में दिख रही हैं। एनबीएफसी की बैलेंसशीट स्ट्रॉन्ग है। लेवरेज रेशियो 4.5 गुना के पीक से घटकर 3.1 गुना पर आ गया है। एसेट क्वालिटी में भी इम्प्रूवमेंट है। नेट नॉन-परफॉर्मिंग एसेट (NNPA) रेशियो 1.1 फीसदी के ऑल-टाइम लो पर है। एनबीएफसी की क्रेडिट कॉस्ट में भी इसी तरह का ट्रेंड दिखा है। लेकिन, मीडियम टर्म में उनकी क्रेडिट कॉस्ट बढ़ने का अनुमान है। बीते सात सालों में एनबीएफसी को बैंकों से मिलने वाला लोन बढ़कर चार गुना हो गया है।

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आपको क्या करना चाहिए?

एनबीएफसी की बैलेंसशीट को देखकर ऐसा लगता है कि लेंडिंग रेट घटने से पहले उनकी फंडिंग कॉस्ट में कमी आएगी। इससे बैंकों की तरह उन्हें NIM पर दबाव का सामना नहीं करना पड़ेगा। इसके बजाय आरबीआई के इंटरेस्ट रेट घटाने से एनबीएफसी के लिए फंड जुटाना ज्यादा आसान हो जाएगा। वैल्यूएशन के लिहाज से कुछ एनबीएफसी अट्रैक्टिव दिख रही हैं। इसका मतलब है कि इंटरेस्ट रेट घटने से उनकी वैल्यूएशन मल्टीपल में इजाफा हो सकता है। ऐसे में जो निवेशक इंटरेस्ट रेट में कमी का फायदा उठाना चाहते हैं वो बैंकों की जगह एनबीएफसी के स्टॉक्स में निवेश कर सकते हैं।

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