Budget 2026: क्या LTCG टैक्स में होगा बड़ा बदलाव? जानें शेयर बाजार में क्यों है डर का माहौल

Budget 2026: बजट की तारीख नजदीक आने के साथ शेयर बाजार में भी बेचैनी बढ़ती जा रही है। निवेशक को आशंका है कि सरकार एक बार फिर कैपिटल गेन्स टैक्स के ढांचे में बदलाव कर सकती है। खासकर ऐसे समय में जब शेयर बाजार पहले से ही कमजोर स्थिति में है। हालांकि अभी तक टैक्स बढ़ाने को लेकर कोई आधिकारिक प्रस्ताव नहीं आया है, लेकिन बाजार का मौजूदा माहौल निवेशकों को परेशान कर रहा है

अपडेटेड Jan 28, 2026 पर 10:09 AM
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Budget 2026: जुलाई 2024 में LTCG टैक्स को 10 प्रतिशत से बढ़ाकर 12.5 प्रतिशत किया गया

Budget 2026: बजट की तारीख नजदीक आने के साथ शेयर बाजार में भी बेचैनी बढ़ती जा रही है। निवेशक को आशंका है कि सरकार एक बार फिर कैपिटल गेन्स टैक्स के ढांचे में बदलाव कर सकती है। खासकर ऐसे समय में जब शेयर बाजार पहले से ही कमजोर स्थिति में है। हालांकि अभी तक टैक्स बढ़ाने को लेकर कोई आधिकारिक प्रस्ताव नहीं आया है, लेकिन बाजार का मौजूदा माहौल निवेशकों को परेशान कर रहा है। शेयर मार्केट में उतार-चढ़ाव बना हुआ है, विदेशी निवेशक लगातार बिकवाली कर रहे हैं और 2024 में हुए टैक्स बढ़ोतरी की याद अब भी बाजार के भरोसे को कमजोर कर रही है।

बाजार से जुड़े लोगों का कहना है कि अगर सिर्फ यह सेंटीमेंट भी बनता है कि शेयरों से हुई कमाई पर लगने वाले टैक्स को आम इनकम टैक्स के बराबर किया जा सकता है, तो इससे निवेशकों की घबराहट और जोखिम की भावना और बढ़ सकती है।

यह डर किसी बड़े टैक्स ऐलान से ज्यादा धीरे-धीरे होने वाले ढांचागत बदलावों को लेकर है, जो निवेशकों के व्यवहार को चुपचाप बदल सकते हैं। इनमें शेयरों से होने वाले मुनाफे को इनकम टैक्स स्लैब से जोड़ना, होल्डिंग पीरियड के नियमों में बार-बार बदलाव करना, या सिक्योरिटीज ट्रांजैक्शन टैक्स (STT) की समीक्षा किए बिना शॉर्ट-टर्म ट्रेडिंग पर टैक्स बोझ बढ़ाना शामिल हो सकता है।


यह बहस ऐसे समय में हो रही है जब निवेशकों पर पहले से ही कई स्तरों पर टैक्स दबाव झेल रहे हैं। एक तरफ कैपिटल गेन टैक्स, दूसरी तरफ STT, और साथ ही करेंसी में कमजोरी। ये तीनों पहलू मिलकर निवेशकों के पोस्ट-टैक्स रिटर्न को प्रभावित कर रहे हैं।

2024 के बदलावों की परछाईं अब भी कायम

बजट 2024 में सरकार ने लॉन्ग-टर्म कैपिटल गेन्स टैक्स को बढ़ाकर 12.5 प्रतिशत कर दिया था। साथ ही नए निवेशों पर इंडेक्सेशन के लाभ को खत्म कर दिया और शॉर्ट-टर्म कैपिटल गेन्स टैक्स 20 प्रतिशत किया गया। शुरुआती दौर में मजबूत रैली के चलते बाजार ने इन बदलावों को पचा लिया, लेकिन बाद में आई गिरावट ने सेंटीमेंट को कमजोर कर दिया और 2025 के दौरान निफ्टी ज्यादातर एक सीमित दायरे में ही कारोबार करता रहा

PwC के टैक्स पार्टनर तुषार सचदे के मुताबिक, “जुलाई 2024 में जब LTCG को 10 प्रतिशत से बढ़ाकर 12.5 प्रतिशत किया गया, तब विदेशी निवेशक खुश नहीं थे। सवाल यह है कि क्या सरकार एक साल के भीतर फिर से दरें बदलेगी? आम राय यही है कि इसकी संभावना कम है।”

हालांकि, 2026 की शुरुआत बाजार में उतार-चढ़ाव के साथ हुई है और विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक (FPI) लगातार बिकवाली कर रहे हैं। ऐसे में निवेशक यह सोचने पर मजबूर हैं कि बढ़ा हुआ टैक्स बोझ कहीं गलत समय पर असर तो नहीं डाल रहा। सचदे ने कहा, “विदेशी निवेशक टैक्स कटने के बाद मिलने वाले रिटर्न को देखते हैं। जब टैक्स भी ज्यादा हो और रुपया भी कमजोर होकर 92 के करीब पहुंच जाए, तो उन्हें दोहरी मार झेलनी पड़ती है।”

आगे टैक्स बढ़ा तो बिकवाली का खतरा

Fyers के को-फाउंडर और मैनेजिंग डायरेक्टर तेजस खोड़े का कहना है कि मौजूदा टैक्स सिस्टम पहले ही निवेशकों पर दबाव डाल चुका है। उन्होंने कहा, “एक्टिव ट्रेडर्स के लिए सिस्टम जरूरत से ज्यादा सख्त हो चुका है। अगर अब टैक्स और बढ़ाया गया, तो बाजार में तेज बिकवाली देखने को मिल सकती है। इससे इक्विटी निवेशकों का भरोसा टूटेगा, खासकर तब जब बाजार से फिलहाल अच्छे रिटर्न नहीं मिल रहे हैं।”

बाजार से जुड़े लोगों का कहना है कि मुद्दा यह नहीं है कि शेयरों पर टैक्स लगाया जाए या नहीं। क्योंकि शेयरों पर पहले से ही टैक्स लगता है। असली चिंता इस बात को लेकर है कि सरकार की दिशा क्या है। निवेशक यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि क्या सरकार मौजूदा टैक्स सिस्टम को अंतिम व्यवस्था मानती है, या फिर यह कैपिटल गेन को नियमित आय की तरह टैक्स करने की दिशा में कदम बढ़ाए जा रहे हैं।

तेजस खोड़े ने कहा, “बार-बार नियमों में बदलाव से बाजार में अस्थिरता आती है। शेयर बाजार को सबसे ज्यादा जरूरत लंबे समय तक साफ और स्थिर नियमों की होती है।”

कई तरह के टैक्स मिलकर बढ़ा रहे हैं दबाव

Generational Capital के सतविक जैन ने बताया कि अलग-अलग टैक्स मिलकर निवेशकों पर अतिरिक्त बोझ डाल रहे हैं। उन्होंने कहा, “STT को पहले लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन टैक्स के विकल्प के तौर पर लाया गया था, लेकिन अब दोनों ही लागू हैं। इसके साथ अगर रुपये की कमजोरी को भी जोड़ दें, तो टैक्स कटने के बाद मिलने वाला रिटर्न और कम हो जाता है। अगर सरकार STT कम करने जैसा कोई संकेत भी देती है, तो बाजार इसे बहुत सकारात्मक रूप से लेगा।”

बाजार से जुड़े लोगों का मानना है कि एक के ऊपर एक टैक्स और कमजोर होती करेंसी मिलकर निवेशकों की जोखिम लेने की क्षमता को नुकसान पहुंचा रहे हैं, खासकर विदेशी निवेशकों और एक्टिव घरेलू ट्रेडर्स के लिए।

सरकार की फिस्कल सीमाएं

सरकार की नजर से देखें तो कैपिटल गेन टैक्स उसकी आय का एक अहम स्रोत है। अधिकतर ज्यादा इनकम वाले निवेशक ही शेयरों से बड़ा मुनाफा कमाते हैं। इसलिए यह तर्क दिया जाता है कि पैसिव इनकम को सैलरी की तुलना में बहुत ज्यादा टैक्स छूट नहीं मिलनी चाहिए। इसके साथ ही, सरकार पर कल्याणकारी योजनाओं और इंफ्रास्ट्रक्चर खर्च की बड़ी जिम्मेदारियां भी हैं, जिससे टैक्स में बड़ी राहत देने की गुंजाइश सीमित हो जाती है।

PwC के तुषार सचदे ने कहा, “सरकार के पास फिस्कल स्पेस कम है। किसी भी तरह की टैक्स राहत देने से पहले रेवेन्यू पर पड़ने वाले असर को देखना जरूरी है।” हालांकि, एक्सपर्ट्स का यह भी मानना है कि बहुत ज्यादा सख्त टैक्स नीति इस समय नुकसानदेह साबित हो सकती है। क्योंकि आज शेयर बाजार घरेलू निवेश को बढ़ावा देने, IPO के लिए फंड जुटाने और सरकार की डिसइन्वेस्टमेंट योजनाओं में अहम भूमिका निभा रहा है।

बड़े बदलाव नहीं, छोटे कदमों की उम्मीद

अधिकतर मार्केट एक्सपर्ट्स का मानना है कि सरकार किसी बड़े सुधार के बजाय छोटे और सीमित बदलाव कर सकती है। इनमें STT की समीक्षा, शॉर्ट टर्म और लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन टैक्स के बीच संतुलन, या फिर टैक्स ढांचे को सरल बनाना शामिल हो सकता है। वह भी टैक्स की दरें बढ़ाए बिना।

तेजस खोड़े ने कहा, “STT पूरी दुनिया में लगभग सिर्फ भारत में ही है। यह मुनाफे पर नहीं, बल्कि ट्रेडिंग करने पर टैक्स लगाता है। अगर आप ज्यादा लोगों को बाजार से जोड़ना चाहते हैं, तो STT कम करनी होगी और कैपिटल गेन टैक्स को और बढ़ाने से बचना होगा।”

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