क्लोजिंग ऑक्शन सेशन यानी CAS को लेकर क्या आप भी कनफ्यूज्ड हैं? यहां आसान शब्दों में समझें इसका पूरा मतलब

सेबी ने क्लोज़िंग प्राइस निर्धारित करने के लिए एक नया तरीका लागू किया है, जिसका नाम है कैस, यानी क्लोज़िंग ऑक्शन सेशन। कैस एक नया विचार नहीं है और सेबी 2024 से कैस के बारे में विचार कर रहा था। कैस के अंतर्गत आने वाले शेयरों में नियमित ट्रेडिंग अब 3:15 बजे बंद हो जाती है

अपडेटेड Aug 27, 2026 पर 4:39 PM
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3 अगस्त से पहले शेयर का क्लोजिंग प्राइस वॉल्यूम वेटेड एवरेज प्राइस सिस्टम से तय होता था।

किसी कंपनी का शेयर बाज़ार बंद होने के समय किस भाव पर था, इससे आमतौर पर लोगों का ज़्यादा सरोकार नहीं होता। आम लोग तो अपने शेयर को खरीदने और बेचने के भाव पर ध्यान देते हैं। मगर बाज़ार बंद होने के समय का भाव (क्लोज़िंग प्राइस) कुछ तबकों के लिए बहुत महत्वपूर्ण होता है, जैसे म्यूचुअल फ़ंड, बड़े संस्थागत निवेशक और वायदा एवं विकल्प बाज़ार के प्रतिभागी।

कैस से पहले कैसे निर्धारित होती थी क्लोज़िंग प्राइस?

3 अगस्त 2026 से पहले क्लोज़िंग प्राइस एक फ़ॉर्मूले के तहत निर्धारित होती थी। इस फ़ॉर्मूले का सिद्धांत यह है कि अगर 10 लोगों ने किसी कंपनी का एक शेयर 100 रुपये में खरीदा और 1,000 लोगों ने उसी कंपनी का एक शेयर 110 रुपये में खरीदा, तो साधारण औसत भाव 105 रुपये होगा। मगर 105 रुपये का साधारण औसत बाज़ार का सही चित्रण नहीं करता, क्योंकि अधिकांश लोगों ने 110 रुपये का भाव चुकाया।


इस फ़ॉर्मूले, जिसका नाम है वॉल्यूम वेटेड एवरेज प्राइस (जिसे लोग बोलचाल में विवैप कहते हैं), के तहत साधारण औसत निकालने के बजाय, बाज़ार बंद होने से पहले के अंतिम 30 मिनट में किसी कंपनी के कितने शेयर किस भाव पर बिके, दोनों को ध्यान में रखते हुए एक भारित औसत निकाला जाता है। उपरोक्त उदाहरण में विवैप लगभग 110 रुपये होगा।

विवैप का उद्देश्य अधिक यथार्थवादी क्लोज़िंग प्राइस निर्धारित करना है, फिर भी ज़ाहिर है, यदि इन 30 मिनटों के दौरान बहुत बड़ी मात्रा में प्रचलित बाज़ार भाव से अलग भाव पर शेयर ख़रीदे और बेचे जाएँ, तो क्लोज़िंग प्राइस प्रभावित हो सकती है। सेबी ने हाल ही में एक विदेशी ट्रेडिग समूह पर जो आरोप लगाए थे, उनमें क्लोज़िंग प्राइस को प्रभावित करने से जुड़े आरोप भी थे। हालाँकि, संबंधित समूह सेबी के आरोपों और चित्रण से सहमत नहीं है और इस मामले में अंतिम निर्णय अभी होना बाकी है।

कैस से क्या बदला है?

इन्हीं चिंताओं के बीच सेबी ने क्लोज़िंग प्राइस निर्धारित करने के लिए एक नया तरीका लागू किया है, जिसका नाम है कैस, यानी क्लोज़िंग ऑक्शन सेशन। कैस एक नया विचार नहीं है और सेबी 2024 से कैस के बारे में विचार कर रहा था। कैस के अंतर्गत आने वाले शेयरों में नियमित ट्रेडिंग अब 3:15 बजे बंद हो जाती है। पहले इन शेयरों में नियमित ट्रेडिंग 3:30 बजे तक होती थी। जो शेयर फिलहाल कैस के अंतर्गत नहीं आते हैं, उनकी ट्रेडिंग अभी भी 3:30 बजे तक चलती है और उनकी क्लोज़िंग प्राइस का निर्धारण विवैप के द्वारा होता है।

कैस के तहत नियमित कारोबार समाप्त होने के बाद के 20 मिनट में चार चरणों में प्रक्रिया चलती है। इन चार चरणों को समझने का आसान तरीका यह है कि भाव निकालने के लिए दो चीज़ों की ज़रूरत है। एक शुरुआती भाव और दूसरा यह कि इस शुरुआती भाव से लोग कितने ऊपर या नीचे बोली लगाएंगे।

• शुरुआती भाव, जिसे रेफ़रेंस प्राइस कहते हैं, 3:00 और 3:15 बजे के बीच के विवैप से निर्धारित होता है। अगर इस दौरान कोई शेयर नहीं बिका, तो पूरे दिन में जो भी उस शेयर की अंतिम खरीद का भाव होगा, उसी को शुरुआती भाव मान लिया जाता है। अगर पूरे दिन कोई शेयर नहीं बिका, तो यह पिछले दिन का क्लोज़िंग प्राइस होता है।

• एक बार रेफ़रेंस प्राइस तय हो जाने के बाद, लोग खरीदने और बेचने के लिए ऑर्डर डाल सकते हैं। कैस में रेफ़रेंस प्राइस के 3 प्रतिशत ऊपर-नीचे का दायरा लागू होता है।

• चरणबद्ध तरीके से स्टॉक एक्सचेंज खरीदने और बेचने के ऑर्डर एकत्रित करता है। इसके बाद इन ऑर्डरों का विश्लेषण करके यह निर्धारित किया जाता है कि किस भाव पर सबसे अधिक शेयरों का लेन-देन संभव है। अंतिम चरण में ऑर्डरों का मिलान किया जाता है। यही भाव क्लोज़िंग प्राइस कहलाता है।

• उदाहरणतः अगर किसी शेयर के लिए लोगों ने निम्नलिखित ऑर्डर डाले हैं: (1) ख़रीदने के ऑर्डर: 103 रुपये के 15 शेयर; 102 रुपये के 25 शेयर; 100 रुपये के 40 शेयर और 98 रुपये के 30 शेयर; और (2) बेचने के ऑर्डर: 97 रुपये के 10 शेयर; 100 रुपये के 50 शेयर; 101 रुपये के 30 शेयर और 104 रुपये के 20 शेयर, तो आमतौर पर कैस के अनुसार 100 रुपये के भाव पर सबसे ज़्यादा शेयरों का लेन-देन संभव है। 100 रुपये क्लोज़िंग प्राइस होगा।

सेबी का विचार ऐसा प्रतीत होता है कि विवैप के विपरीत, कैस में क्लोज़िंग प्राइस से छेड़छाड़ करने की संभावना अपेक्षाकृत कम होती है।

कैस के पहले भी वीवैप से क्लोज़िंग प्राइस तो निकलता था, लेकिन वीवैप एक औसत भाव होने की वजह से साधारणतः उस भाव पर कोई सौदा नहीं होता था। मतलब, क्लोज़िंग प्राइस एक कागज़ी संख्या थी। कैस में जो भाव निकलता है, सौदा उसी भाव पर होता है। इसलिए कैस का भाव कागज़ी भाव नहीं है, बल्कि सही मायने में उस समय का क्लोज़िंग प्राइस है। इसके काफ़ी फायदे हैं, जैसे कि, अमुमन एक पैसिव इंडेक्स फण्ड के लिए वीवैप वाली क्लोजिंग प्राइस की ट्रैकिंग से कैस वाली क्लोजिंग प्राइस की ट्रैकिंग ज़्यादा सटीक होगी।

नया नहीं है कैस

कैस जैसी व्यवस्था विदेशी स्टॉक एक्सचेंजों में काफ़ी प्रचलित है। इसके लागू होने पर कुछ लोगों ने कहा कि भारत भी अब विदेशी एक्सचेंजों की प्रणाली अपना रहा है। लेकिन यह बात पूरी तरह सही नहीं है। भारत वर्षों से कैस जैसी प्रणाली का उपयोग बाज़ार खुलने के समय का भाव (ओपनिंग प्राइस) निर्धारित करने के लिए करता आया है। वैसे भी भारतीय बाज़ार नई तकनीकों को अपनाने में हमेशा आगे रहा है।

सेबी ने फिलहाल कैस को उन शेयरों पर लागू किया है, जिन पर डेरिवेटिव कॉन्ट्रैक्ट उपलब्ध हैं। आगे चलकर इसे अन्य शेयरों तक विस्तारित किए जाने की संभावना है।

कैसा रहा कैस का क्रियान्वयन?

शुरुआती दिनों में कैस का क्रियान्वयन पूरी तरह निर्बाध नहीं रहा। उदाहरणतः, निफ़्टी इंडेक्स के साप्ताहिक कॉन्ट्रैक्ट साधारणतः मंगलवार को एक्सपायर होते हैं। अगर मंगलवार को निफ़्टी में शामिल शेयरों में 3:15 तक के बाज़ार भाव और कैस के दौरान बनने वाले क्लोज़िंग प्राइस में महत्वपूर्ण अंतर हो, तो निफ़्टी के क्लोज़िंग स्तर में तेज़ बदलाव संभव है। ऐसी स्थिति में कैश मार्केट और डेरिवेटिव्स के भावों में अस्थायी असंगति पैदा होने पर आर्बिट्रेज की गुंजाइश भी बन सकती है।

सेबी बाज़ार पर कड़ी नज़र रखती है और सेबी ने 19 अगस्त को एक ऑर्डर निकाला है, जिसमें दो संस्थाओं के ऊपर सेबी ने यह आरोप लगाया है कि उन्होंने कैस के भाव को प्रभावित किया है। यह एक अंतरिम आदेश है, जो इन संस्थाओं का पक्ष सुने बिना जारी किया गया है; इसलिए इसे अंतिम निष्कर्ष या दोषसिद्धि नहीं माना जा सकता। लेकिन इससे दो निष्कर्ष निकलते हैं: एक, कि कैस में लिक्विडिटी बहुत महत्वपूर्ण है; और दूसरा, कि कैस पर सेबी की पैनी नज़र है।

इन ऑर्डरों में आरोप यह है कि कैस में बड़े खरीद और बिक्री के ऑर्डर ऑर्डर रेफ़रेंस प्राइस से लगभग 3% ऊपर और नीचे डाले गए, जो कि बाज़ार के रुख़ के विपरीत था, और बाद में ये ऑर्डर कैंसिल कर दिए गए। सेबी का आरोप है कि इससे इंडेक्स प्रभावित हुआ और संबंधित संस्थाओं को वायदा एवं विकल्प बाज़ार में फायदा हुआ।

किसी भी नई व्यवस्था से परिचित होने और उसमें पारंगत होने में समय लगता है। आशा है कि आने वाले दिनों में कैस में अधिक से अधिक ऑर्डर्स डाले जाएँगे और खरीदने-बेचने वालों की संख्या बढ़ेगी, जिससे खरीदने और बेचने के लिए पर्याप्त ऑर्डर उपलब्ध होंगे और क्लोज़िंग प्राइस निर्धारित करने की प्रक्रिया अधिक सुचारु रूप से चल सकेगी। क्या इससे क्लोज़िंग प्राइस वास्तव में अधिक यथार्थवादी होगी और उसे प्रभावित करने की संभावना कम होगी, यह तो समय ही बताएगा।

(यह लेख अम्बरीष ने लिखा है, जो शार्दुल अमरचंद मंगलदास एंड कंपनी में पार्टनर हैं)

डिसक्लेमर-यहां व्यक्त विचार लेखक के अपने विचार हैं। इसे इस पब्लिकेशन का विचार नहीं माना जाना चाहिए।

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