Daily Voice : मध्य पूर्व में गहराता संकट और इसके चलते बना जियोपोलिटिकल तनाव दुनिया भर के बाजारों के लिए परेशानी का कारण बना हुआ है। इस संकट के चलते कच्चे तेल की कीमतें बढ़ रही हैं। इससे निवेशकों की भावनाएं बुरी तरह से प्रभावित हो रही हैं। ये बातें जूलियस बेयर इंडिया (Julius Baer India) के कार्यकारी निदेशक मिलिंद मुछाला (Milind Muchhala) ने मनीकंट्रोल के साथ हुई एक बातचीत में कही हैं। इस बातचीत में उन्होंने आगे कहा कि फिलहाल इस समय बाजार का फोकस दुनिया के बड़े केंद्रीय बैंकों, खासकर अमेरिकी फेडरल रिजर्व की तरफ से उठाए गए कदमों पर है क्योंकि महंगाई का दबाव लगातार बढ़ रहा है।
उन्होंने आगे कहा कि जूलियस बेयर का मानना है कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था 'सॉफ्ट लैंडिंग' हासिल कर लेगी। लेकिन अमेरिका में लॉन्ग टर्म ब्याज दरें लंबे समय तक 5.5 फीसदी से ऊपर बनी रह सकती हैं। भारतीय इकोनॉमी और बाजार पर बात करते हुए मिलिंद मुछाला ने कहा कि वित्त वर्ष 2024 की सितंबर तिमाही में इंडस्ट्रियल और इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर का प्रदर्शन काफी अच्छा रह सकता है।
इक्विटी और वेल्थ मैनेजमेंट का 20 सालों का अनुभव रखने वाले मिलिंद ने कहा कि जूलियस बेयर के ग्लोबल डेस्क का मानना है कि आने वाले महीनों में महंगाई में नरमी आने और वेतन बढ़ोतरी कम होने के साथ श्रम बाजार की नरमी फेड को आगामी नीति बैठकों में दरों में और बढ़ोतरी करने से रोक सकती है। हालांकि, सख्ती का दौर थमने के बावजूद, केंद्रीय बैंक लंबे समय तक अपनी ब्याज दरों को उच्च स्तरों पर बनाए रख सकते हैं।
सितंबर तिमाही के अब तक आए नतीजों पर बात करते हुए मिलिंद ने कहा कि अब तक आए वित्त वर्ष 2024 के दूसरी तिमाही के नतीजे काफी हद तक अनुमान के मुताबिक ही रहे हैं। इनमें कोई बड़ा आश्चर्य या झटका नहीं लगा है। हालांकि अभी भी कई सेक्टरों के कई हैवीवेट नतीजे आने बाकी हैं। अब तक फाइनेंशियल, आईटी और उपभोग से जुड़े कई दिग्गजों के नतीजे आए हैं। हमें अगले कुछ हफ़्तों में नतीजों की स्पष्ट तस्वीर मिल जाएगी।
अब तक आए नतीजों की बात करें तो अधिकांश बैंकों/एनबीएफसी ने अच्छे आंकड़े दिए हैं। हालांकि इनके एनआईएम (नेट इंटरेस्ट मार्जिन) पर तिमाही आधार पर दबाव देखने को मिला है। आगे भी हमें इनके नेट इंटरेस्ट मार्जिन पर दबाव कायम रहने की उम्मीद है। आईटी सेक्टर के नतीजे कुछ हद तक मिलेजुले रहे हैं। मिडकैप आईटी ने लार्जकैप की तुलना में बेहतर प्रदर्शन किया है। हालांकि इस सेक्टर की डील विन/पाइपलाइन काफी अच्छी बनी हुई है। लेकिन खराब ग्लोबल मैक्रो स्थितियों और प्रोजेक्ट रैंप-अप में देरी के कारण इनके रेवेन्यू गाइडेंस में गिरावट देखने को मिली है।
खपत वाले शेयर साफतौर पर बहुत ज्यादा दबाव में दिखे हैं। प्राइसिंग और ग्रामीण बाजारों से आने वाली मांग में नरमी के चलते इन पर दबाव बढ़ता दिखा है। हालांकि इनपुट लागत में गिरावट इनके लिए एक अच्छी बात है। इससे इनके मार्जिन में सुधार में सहायता मिली है।
मिलिंद मुछाला ने आगे कहा कि वित्त वर्ष 2024 की सितंबर तिमाही में इंडस्ट्रियल और इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर का प्रदर्शन काफी अच्छा रह सकता है। इनको कैपेक्स साइकिल में तेजी लौटने, रियल एस्टेट में सेल्स बढ़ने और सरकार की तरफ से इंफ्रा पर बढ़ते खर्च का फायदा मिल सकता है।
वित्त वर्ष 2024 की दूसरी छमाही की संभावनाओं पर बात करते हुए मिलिंद ने कहा कि वित्त वर्ष 2024 की दूसरी छमाही काफी हद तक पहली छमाही के समान ही रहने की उम्मीद है। हालांकि मांग में सुधार (खासकर ग्रामीण बाजारों की) के चलते खपत से जुड़े कुछ सेक्टरों के लिए स्थितियां बेहतर होती दिख सकती हैं।
इसके अलावा, जैसे-जैसे चुनाव करीब आते जा रहे हैं सरकार थोड़ा और लोकलुभावन रुख अपनाती नजर आ सकती है। ऐसे में हमें आगे खपत वाले शेयरों में तेजी आने की उम्मीद है। हमें पहली छमाही में सरकार की तरफ से पूंजीगत व्यय में काफी फ्रंट लोडिंग देखने को मिली थी। ऐसे में अब इसमें कुछ कमी देखने को मिल सकती है। ऐसे में इंडस्ट्रियल सेक्टर की कुछ कंपनियों पर निगेटिव असर पड़ सकता है। वहीं, इस अवधि में ग्लोबल बाजार पर निर्भर कंपनियों का प्रदर्शन मिला-जुला रह सकता है। इन पर ग्लोबल मार्केट की अनिश्चितता का निगेटिव असर आ सकता है।
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