Dollar Vs INR : रिकॉर्ड निचले स्तर के करीब रुपया, एक्सपर्ट्स से जानें आगे कैसी रह सकती है इसकी चाल
Dollar Vs Rupee: कच्चे तेल की कीमतों में उछाल,कम इनफ्लो और डॉलर की बढ़ती मांग के दबाव के कारण रुपया रिकॉर्ड निचले स्तर के करीब दिख रहा है। 20 मई को रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 96.83 के रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गया था। वहीं, आज शुक्रवार को यह 96.30 के आसपास कारोबार कर रहा है
Dollar vs Rupee : द वेल्थ कंपनी के मैनेजिंग पार्टनर और मार्केट स्ट्रैटेजी हेड,अक्षय चिंचालकर ने कहा कि रुपये के अपने अब तक के सबसे निचले स्तर 96.96 से सुधरकर 94.14 पर आने से बाजार की घबराहट तो कम हुई है,लेकिन इससे मेन ट्रेंड में कोई बदलाव नहीं आया है
Dollar Vs Rupee : अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया अपने अब तक के सबसे निचले स्तर के करीब पहुंच गया है। जानकारों का मानना है कि इस गिरावट की वजह कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें,विदेशी निवेश में कमी,डॉलर की मजबूत मांग और अर्थव्यवस्था में स्ट्रक्चरल असंतुलन जैसे कई कारण हैं। 20 मई को रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 96.83 के रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गया था। वहीं, आज शुक्रवार को यह 96.30 के आसपास कारोबार कर रहा है। डॉलर के मुकाबले रुपया अब तक के सबसे निचले स्तर से सिर्फ 0.55 प्रतिशत दूर दिख रहा है।
रुपए की हालिया गिरावट ने 5 जून के बाद हुई करेंसी की रिकवरी को खत्म कर दिया है,जिससे रुपया इस महीने एशिया की सबसे कमजोर प्रदर्शन करने वाली करेंसी में शामिल हो गया है।
तेल की कीमतों में उछाल से अर्थव्यवस्था की स्ट्रक्चरल कमजोरियां सामने आईं
इंडिया रेटिंग्स एंड रिसर्च के कोर एनालिटिकल ग्रुप के डायरेक्टर सौम्यजीत नियोगी का कहना है कि कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों ने रुपये के कमजोर होने में एक ट्रिगर का काम किया है,लेकिन यह इसकी मुख्य वजह नहीं है। नियोगी के मुताबिक,मज़बूत अमेरिकी डॉलर,टैरिफ की वजह से एक्सपोर्ट में आ रही मुश्किलें, चीन की आक्रामक डंपिंग और कमजोर ग्लोबल आउटलुक, इन सभी का असर रुपये पर पड़ा है। उन्होंने आगे कहा कि करीब एक दशक तक भारत को कच्चे तेल की कम कीमतों का फायदा मिला,जिससे इन दबावों को झेलने में मदद मिली। लेकिन,हाल ही में तेल की कीमतों में हुई बढ़ोतरी ने यह सहारा छीन लिया और अर्थव्यवस्था को कई मौजूदा ढ़ाचागत कमजेरियां उभर कर सामने आ गईं।
बंधन AMC के सीनियर इकोनॉमिस्ट श्रीजीत बालासुब्रमण्यन का कहना है कि रुपए में हाल में आई गिरावट को भारत के स्ट्रक्चरल करंट अकाउंट डेफिसिट के नजरिए से भी देखा जाना चाहिए। असल में भारत करंट अकाउंट डेफिसिट वाला देश है। हम एक्सपोर्ट से होने वाली कमाई कि तुलना में इंपोर्ट पर ज्यादा खर्च करते हैं,और जब हमें बैलेंस ऑफ पेमेंट्स में सरप्लस मिलता भी है,तो ऐसा इसलिए होता है क्योंकि कैपिटल इनफ्लो करंट अकाउंट डेफिसिट से ज़्यादा होता है। उन्होंने आगे कहा कि ढ़ाचागत रूप से,पिछले 10-15 सालों में रुपये की कीमत में सालाना लगभग 3-4 प्रतिशत की गिरावट आई है।
डॉलर की आवक में कमजोरी, इसकी निकासी की भरपाई करने में रही नाकाम
RBI के 5 जून के उपायों ने (जिनमें फॉरेन करेंसी नॉन-रेसिडेंट बैंक (FCNR-B) डिपॉजिट के लिए इंसेंटिव भी शामिल थे) शुरुआत में बाजार का मूड बेहतर किया था। हालांकि,डॉलर की आवक उम्मीद के मुताबिक नहीं रही। यह उम्मीद से कम ही रही।
आरित्या ब्रोकिंग प्राइवेट लिमिटेड में रिसर्च हेड गौरव अरोड़ा ने बताया कि इस साल विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों ने भारतीय बाजार से 36 अरब डॉलर से ज्यादा की रकम निकाली है,जो पिछले साल की निकासी से ज्यादा है। उन्होंने कहा कि ग्लोबल कैपिटल तेजी से AI और सेमीकंडक्टर-आधारित बाज़ारों,जैसे कि अमेरिका,ताइवान और दक्षिण कोरिया की ओर शिफ्ट हो रहा है।
गौरव अरोड़ा ने जून में भारत के 30.43 अरब डॉलर के व्यापार घाटे की ओर भी इशारा किया। यह घाटा मुख्य रूप से कच्चे तेल,इलेक्ट्रॉनिक्स और सोने के आयात के कारण हुआ। साथ ही इसमें अमेरिकी डॉलर की मजबूती और फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दरों में कटौती को लेकर कोई खास जल्दबाजी न दिखाने का भी असर रहा।
बार्कलेज की हालिया रिपोर्ट के मुताबिक अब तक FCNR(B) के तहत केवल 5-6 अरब डॉलर का ही विदेशी निवेश आया है,जो शुरुआती अनुमानों से काफी कम है। इससे रुपये को मिलने वाला शॉर्ट टर्म सपोर्ट कम हो गया है।
डॉलर की बढ़ती मांग ने बनाया दबाव
फिनरेक्स ट्रेजरी एडवाइजर्स LLP में ट्रेजरी हेड और एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर अनिल कुमार भंसाली ने कहा कि कई ऐसे कारण हैं जिनकी वजह से रुपये पर दबाव बना हुआ है। उन्होंने कहा कि डॉलर की मांग बढ़ने के मुख्य कारणों में कच्चे तेल की ऊंची कीमतों के अलावा,रूसी कच्चा तेल खरीदने वाले देशों पर अमेरिका द्वारा टैरिफ लगाने को लेकर बनी नई चिंताएं,विदेशी पोर्टफोलियो से पैसे की निकासी,रक्षा भुगतान,सरकारी कर्ज की अदायगी और विदेशों में कंपनियों के अधिग्रहण भी शामिल हैं।
भंसाली ने आगे कहा कि करेंसी में डॉलर का इनफ्लो बहुत कम है,जबकि एक्सपोर्टर अपनी डॉलर की कमाई को रोककर रख रहे हैं और इंपोर्टर तत्काल पेमेंट के लिए डॉलर खरीद रहे हैं और रुपया मजबूत होने पर फ़ॉरवर्ड कॉन्ट्रैक्ट बुक कर रहे हैं। इससे रुपए पर दबाव बना हुआ है। इसके अलावा भारत में महंगाई बढ़ने लगी है,जबकि अमेरिका में महंगाई कम हुई है। इससे रुपये को पहले जो वैल्यूएशन का फायदा मिल रहा था,वह अब खत्म हो गया है।
उधर बालासुब्रमण्यन ने कहा कि मार्केट की स्थिति ने इस दबाव को और बढ़ा दिया है। उन्होंने कहा कि जब मार्केट को उम्मीद होती है कि रुपया कमजोर होगा तो एक्सपोर्टर कम हेजिंग करते हैं क्योंकि कमजोर करेंसी से उन्हें फायदा होता है। जबकि दूसरी तरफ इम्पोर्टर ज्यादा आक्रामक तरीके से हेजिंग करते हैं। इससे डॉलर की मांग बढ़ती है और एक ऐसा चक्र बन जाता है जो रुपये पर और दबाव डालता है।
आगे का आउटलुक
जानकारों का मानना है कि नियर टर्म दबाव के बावजूद आने वाले महीनों में FCNR(B) के तहत आने वाले फंड में बढ़ोतरी से रुपये को सहारा मिलेगा। बालासुब्रमण्यन को उम्मीद है कि ज्यादातर फंड अगस्त और सितंबर के दौरान आएगा,जिससे भारत को सितंबर तिमाही में बैलेंस ऑफ़ पेमेंट्स में सरप्लस हासिल करने में मदद मिलेगी।
नियोगी ने कहा कि अगर जियोपॉलिटिकल तनाव कम होते हैं तो FCNR(B) और दूसरे कैपिटल फ्लो की वजह से रुपये में मजबूती आ सकती है और यह साल के बाकी समय में औसतन 95 रुपये प्रति डॉलर के स्तर से नीचे आ सकता है।
द वेल्थ कंपनी के मैनेजिंग पार्टनर और मार्केट स्ट्रैटेजी हेड,अक्षय चिंचालकर ने कहा कि रुपये के अपने अब तक के सबसे निचले स्तर 96.96 से सुधरकर 94.14 पर आने से बाजार की घबराहट तो कम हुई है,लेकिन इससे मेन ट्रेंड में कोई बदलाव नहीं आया है। डेली,वीकली और मंथली चार्ट पर टेक्निकल सेटअप मजबूती से डॉलर के पक्ष में बना हुआ है और एक साल तक एक ही दायरे में रहने के बाद डॉलर इंडेक्स का ऊपर की ओर बढ़ना (अपसाइड ब्रेकआउट) एक बहुत बड़ा सपोर्ट साबित हो रहा है।
चिंचालकर के मुताबिक डॉलर के मुकाबले रुपया 97 के आस-पास अपने पिछले रिकॉर्ड निचले स्तर को फिर से छू सकता है। गिरावट का यह ट्रेंड तभी खत्म होगा जब रुपया 94.96 के स्तर से ऊपर मजबूत होगा। उन्होंने कहा कि अगर रुपया 97 के आसपास कोई सपोर्ट नहीं बना पाता है तो इसका अगला टारगेट 98 के आसपास हो सकता है। अगर रुपया अपने रिकॉर्ड निचले स्तर से नीचे गिरता है तो यह 98.70 के स्तर तक जा सकता है।
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