चीन में सरकार ने इकोनॉमी को सहारा देने के लिए कई बड़े फैसले लिए हैं। इससे चीन के स्टॉक मार्केट्स में जबर्दस्त तेजी आई। कुछ एनालिस्ट्स का कहना है कि अब विदेशी निवेशक चीन के स्टॉक्स मार्केट्स में निवेश में ज्यादा दिलचस्पी दिखा सकते हैं। इसका असर इंडियन मार्केट्स में विदेशी निवेश पर पड़ सकता है। लेकिन, गोल्डमैन सैक्स के सुनील कौल की राय अलग है। उनका मानना है कि चीन में सरकार के बड़े ऐलान का मतलब यह नहीं है कि विदेशी निवेश अब चीन की तरफ जाएगा।
चीन की इकोनॉमी के रास्ते में अब भी कई कांटे
उन्होंने कहा कि अभी कुछ डेटा आने वाले हैं, जिनसे यह संकेत मिलेगा कि सरकार ने जिन उपायों के ऐलान किए हैं, उनसे चीन के स्टॉक मार्केट्स में बुलरन आएगा या नहीं। दरअसल, चीन में सरकार और पीपल्स बैंक ऑफ चाइना ने इकोनॉमी में जान फूंकने के लिए कई बड़े कदम उठाए हैं। कौल ने कहा कि इन उपायों से चीन के स्टॉक मार्केट में विदेशी निवेशकों की दिलचस्पी बढ़ी है। लेकिन, चीन की इकोनॉमी की ग्रोथ के रास्ते में अब भी कई चुनौतियां हैं।
पिछले हफ्ते चीन के मार्केट्स में दिखी जबर्दस्त तेजी
उन्होंने कहा कि पिछले हफ्ते चीन के स्टॉक मार्केट्स में आई तेजी को 'स्ट्रक्चरल बुलरन' का संकेत नहीं माना जा सकता। चूंकि चीन के मार्केट में काफी बिकवाली हुई है, जिससे मार्केट में सरकार के उपायों से तुरंत तेजी दिखी है। लेकिन, क्या ये उपाय पर्याप्त हैं, यह जानने के लिए हमें कुछ डेटा के आने का इंतजार करना होगा। चीन में सरकार और केंद्रीय बैंक के इकोनॉमी की ग्रोथ बढ़ाने के लिए नए कदम उठाने के बाद पिछले हफ्ते वहां स्टॉक मार्केट में बड़ी तेजी दिखी। इससे शेयरों में तेजी के लिहाज से सितंबर का महीना एक दशक में सबसे शानदार महीना बन गया।
चीन और इंडियन मार्केट्स के बीच सीधा संबंध नहीं
कौल ने कहा कि हाल में ऐसे दो मामले हुए जब चीन के स्टॉक मार्केट्स में तेजी के बाद ऐसा लगा कि विदेशी निवेशक इंडिया की जगह चीन में निवेश करेंगे। लेकिन, ऐसा नहीं हुआ। इस साल जनवरी से मार्च के दौरान चीन के स्टॉक मार्केट्स में 30 फीसदी की तेजी आई। लेकिन, इंडियन मार्केट्स में विदेशी निवेशकों की बिकवाली 1 अरब डॉलर से कम रही। इस दौरान निफ्टी में 10 फीसदी तक की तेजी भी देखने को मिली। 2022 में भी ऐसा देखा जा चुका है।
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इंडियन मार्केट्स में विदेशी निवेशकों की हिस्सेदारी 11 साल के निचले स्तर पर
उन्होंने कहा कि इंडियन स्टॉक मार्केट्स में विदेशी निवेशकों की हिस्सेदारी अभी 11 साल के निचले स्तर पर है या उसके करीब है। हालांकि, पिछले कुछ महीनों में MSCI EM सूचकांकों में इंडिया की हिस्सेदारी धीरे-धीरे बढ़कर 20 फीसदी तक पहुंच गया है। इसके अलावा कई एशियाई म्यूचुअल फंड्स अभी इंडिया में पर थोड़ा अंडरवेट हैं। उधर, चीन में पिछले कुछ सालों में इकोनॉमी की रफ्तार बहुत सुस्त पड़ी है।