How to read Company Result: मुनाफा बढ़ना रिजल्ट अच्छा होने की गारंटी नहीं, शेयर खरीदने से पहले ये बातें भी करें चेक
How to read Company Result: कंपनियों या बैंकों के अर्निंग सीजन में उनके शेयरों की चाल पर रिजल्ट का असर दिखता है। रिजल्ट खराब रहे तो शेयरों पर दबाव दिखता है और अच्छे रहे तो शेयरों की चमक बढ़ जाती है। अब मुख्य सवाल ये है उठता है कि डिविडेंड के ऐलान के अलावा आम निवेशकों को रिजल्ट में क्या देखना चाहिए, यहां इसके बारे में बताया जा रहा है
कई बार ऐसा होता है कि कंपनी का मुनाफा रॉकेट की स्पीड से बढ़ा लेकिन शेयर फुस्स तो दूसरी तरफ कंपनी घाटे में रहती है लेकिन शेयर तूफानी स्पीड से ऊपर चढ़ते हैं। इससे समझ सकते हैं कि शेयरों की चाल सिर्फ मुनाफे से नहीं तय होती बल्कि कई और बातों का भी इसमें रो ल होता है।
How to read Company Result: किसी कंपनी या बैंक के शेयरों की चाल पर कई बातों का फर्क पड़ता है जैसे कि उनके प्रोडक्ट की डिमांड कैसी है, वैश्विक मार्केट का हाल कैसा है, कच्चे तेल की धार कितनी तेज है या मौद्रिक नीतियां कैसी हैं इत्यादि। इसके अलावा वैल्यूएशन कैसा है, क्योंकि अच्छी कंपनी भी बहुत महंगे भाव पर खराब निवेश बन सकती है। इन सबके अलावा एक और अहम बात कंपनी के तिमाही रिजल्ट का ऐलान है। कंपनी जब कारोबारी नतीजे पेश करती है तो इसके शेयरों पर इसका पॉजिटिव या निगेटिव असर दिखता है।
कई बार ऐसा होता है कि कंपनी का मुनाफा रॉकेट की स्पीड से बढ़ा लेकिन शेयर फुस्स तो दूसरी तरफ कंपनी घाटे में रहती है लेकिन शेयर तूफानी स्पीड से ऊपर चढ़ते हैं। इससे समझ सकते हैं कि शेयरों की चाल सिर्फ मुनाफे से नहीं तय होती बल्कि कई और बातों का भी इसमें रोल होता है। यहां कंपनियों और बैंकों के रिजल्ट में क्या देखें, इसके बारे में बताया जा रहा है।
कंपनी के रिजल्ट में क्या देखें
कंपनी की सेल्स/रेवेन्यू कितनी बढ़ी या घटी। इसे सिर्फ सालाना नहीं बल्कि तिमाही आधार पर भी देखना चाहिए। हालांकि ध्यान दें कि बिक्री बढ़ रही है लेकिन मुनाफा नहीं तो इसकी वजह क्या है, इसे समझना जरूरी है।
मुनाफे की बात करें तो टैक्स काटकर यानी शुद्ध मुनाफा तिमाही और सालाना आधार पर कितना बढ़ा या घटा। मुनाफा लगातार बढ़ रहा है या सिर्फ एक तिमाही। इन सब बातों पर गौर करें। अगर कंपनी के मुनाफे में रेवेन्यू के हिसाब से बहुत अधिक उछाल है तो इसमें एक्सेप्श्नल गेन या टैक्स बेनेफिट की कितनी भूमिका है, यह देखना जरूरी है। अगर कंपनी घाटे में है तो इसकी वजह क्या है, कहीं एक्सेप्शनल लॉस तो नहीं। ये सब चेक करना जरूरी है।
ऑपरेटिंग लेवल पर ईबीआईटीडीए और मार्जिन की क्या स्थिति है, यह बहुत अहम है क्योंकि यह बताता है कि कंपनी अपने मुख्य कारोबार से कितना अच्छा कमा रही है।
कैश फ्लो भी चेक करना चाहिए। मान लीजिए कि कंपनी ने ₹100 करोड़ मुनाफा कमाया, लेकिन कारोबार से सिर्फ ₹30 करोड़ नकद आया तो सवाल उठता है कि बाकी मुनाफा वास्तव में नकदी में क्यों नहीं बदला।
कंपनी का कर्ज कितना घटा या बढ़ा, इसे चेक कर लें और इस पर ब्याज का खर्च कितना है। कर्ज लगातार बढ़ रहा हो और कैश फ्लो कमजोर हो रहा हो तो इसे अलर्ट सिग्नल समझें।
एक और अहम फैक्टर RoCE (रिटर्न ऑन कैपिटल एंप्लॉयड) और RoE (रिटर्न ऑन इक्विटी) देखना है जिससे पता चलता है कि कंपनी अपने लगाए हुए पैसे से कितना अच्छा रिटर्न कमा रही है। सिर्फ कंपनी का मुनाफा देखना पर्याप्त नहीं है।
इन सबके अलावा मैनेजमेंट कमेंटरी को ध्यान से पढ़ें क्योंकि आगे बिक्री, मार्जिन, डिमांड की स्थिति, नए निवेश या कैपिटल एक्सपेंडिचर और बडे़ रिस्क का संकेत मिलता है।
बैंक के नतीजे पढ़ने का तरीका
कंपनी के विपरीत बैंक के रिजल्ट में रेवेन्यू और ईबीआईटीडीए की भूमिका नहीं होती है। इसकी बजाय लोन ग्रोथ देखें कि बैंक ने कितना नया कर्ज दिया और सिर्फ यही नहीं, इसकी क्वालिटी भी देखनी होगी।
बैंक के पास जमा पैसा कितनी तेजी से बढ़ रहा है, यह भी अहम है। डिपॉजिट की ग्रोथ और लोन की ग्रोथ में तुलना करनी होगी। इसमें सीएएसए (करंट अकाउंट सेविंग्स अकाउंट) भी देखना होता है क्योंकि ये बैंक के लिए कम लागत में लोन के लिए पैसों का इंतजाम हैं।
नेट इंटेरेस्ट मार्जिन (NIM) से यह पता चलता है कि बैंक अपने दिए हुए कर्ज और जुटाए हुए पैसे के बीच कितना ब्याज मार्जिन कमा रहा है। इसका बढ़ना आमतौर पर अच्छा माना जाता है और लगातार गिरना चिंता की विषय है।
बैंक के नतीजे में एक अहम बात है एसेट क्वालिटी चेक करना। इसके तहत ग्रास एनपीए, नेट एनपीए, नए खराब लोन यानी स्लिपेज, क्रेडिट कॉस्ट और प्रोविजनिंग को देखना है। अगर एनपीए कम हो रहा है और नए खराब लोन भी नियंत्रण में हैं, तो बैंक की एसेट क्वालिटी अच्छी मानी जाती है।
बैंक के प्रोविजनिंग की क्या स्थिति है यानी खराब कर्ज के लिए बैंक को कितना पैसा अलग रखना पड़ रहा है और इसकी ग्रोथ क्या है।
RoA (रिटर्न ऑन एसेट्स) और RoE (रिटर्न ऑन इक्विटी) यानी बैंक अपने एसेट्स और शेयरहोल्डर्स के पैसे पर कितना रिटर्न कमा रहा है।
एक और अहम प्वाइंट कैपिटल एडेकेसी/सीईटी1 है जिससे पता चलता है कि बैंक के पास भविष्य में बढ़ने और नुकसान झेलने के लिए पर्याप्त पूंजी है या नहीं।
डिस्क्लेमर: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।