Investment Mantra : पिछले कुछ समय से भारतीय बाजार ने ग्लोबल मार्केट को अंडरपरफॉर्म किया है। यही वजह है कि इन दिनों ग्लोबल इंवेस्टिंग का ट्रेंड बढ़ रहा है। अब सवाल है कि ग्लोबल इन्वेस्टिंग करना कैसे है। इसके क्या-क्या विकल्प मौजूद हैं। किन फंड्स के जरिए हम ग्लोबल मार्केट का एक्सपोजर ले सकते हैं। ग्लोबल इंवेस्टिंग के मौके और चुनौतियों पर खास चर्चा के लिए हमारे साथ हैं Moneyfront के को-फाउंडर & CEO मोहित गांग।
पिछले 2 साल भारतीय बाजार का प्रदर्शन अच्छा नहीं रहा है। 2 साल से US, यूरोप,एशियाई बाजारों ने अच्छा प्रदर्शन किया। रुपए में गिरावट का भी असर इन्वेंस्ट पर पड़ रहा है। करेंसी हेजिंग मुश्किल होगी। रुपए में गिरावट से ग्लोबल इंवेस्टिंग में ज्यादा रिटर्न मिलता है। रुपया मजबूत होने पर विदेशी निवेश पर कम रिटर्न मिलता है। ऐसे में हमें 10-15 या फिर 25-30 फीसदी ग्लोबल एक्सपोजर रखना चाहिए
ग्लोबल इन्वेस्टिंग क्यों जरूरी और कैसे करें?
भारत का ग्लोबल मार्केट कैप में हिस्सा 3–4% है। सिर्फ घरेलू मार्केट में निवेश करने पर ज्यादा निर्भरता का रिस्क बढ़ता है। भारत में बिग टेक, AI और सेमीकंडक्टर में कम विकल्प हैं। इससे ग्लोबल लीडर कंपनियों की ग्रोथ स्टोरी में निवेश का मौका मिलता है। ग्लोबल इन्वेस्टिंग से इन सेक्टरों में तेजी का फायदा मिल सकता है। लंबी अवधि में रुपया हर साल 2–4% कमजोर होता है। ग्लोबल इन्वेस्टिंग से FX रिटर्न का फायदा मिलता है। इससे साइकिल डायवर्सिफिकेशन का भी फायदा मिलता है। US, चीन और यूरोप के बाजार भारत से अलग हैं। इससे पोर्टफोलियो में गिरावट कम होती है।
भारत में ग्लोबल इन्वेस्टिंग के विकल्प
हम इंटरनेशनल म्यूचुअल फंड्स और फीडर फंड्स के जरिए ग्लोबल इन्वेस्टिंग कर सकते हैं। US फंड्स (Nasdaq, S&P 500) में भी निवेश किया जा सकता है। इंटरनेशनल ETFs में निवेश किया जा सकता है। इंडियन एक्सचेंज के जरिए Nasdaq 100 ETF और S&P 500 ETF में निवेश किया जा सकता है। IBKR, Vested, Viewtrade, Stockal जैसे ब्रोकर्स के जरिए डायरेक्ट ग्लोबल इन्वेस्टिंग भी हो सकती है। LRS के तहत $250,000/साल लिमिट तय है। मल्टी-एसेट फंड्स के जरिए भी ग्लोबल इन्वेस्टिंग हो सकती है। कुछ फंड्स में इंटरनेशनल इक्विटी का भी एक्सपोजर होता है। गिफ्ट सिटी के जरिए भी निवेश कर सकते हैं। AIFs और ऑफशोर फंड्स India में रजिस्टर्ड होते हैं। दिक्कत सिर्फ यह है कि RBI की लिमिट्स के चलते निवेश का फ्लो काफी सीमित है।
ग्लोबल इन्वेस्टिंग के फायदे
इससे बेहतर टैक्स एफिशिएंसी मिलती है। इंडियन कैपिटल गेन नहीं लगता। डॉलर में निवेश की सुविधा मिलती है। इससे ग्लोबल स्ट्रैटेजीज तक पहुंच मिलती है। गिफ्ट सिटी से नए फंड लॉन्च हो रहे हैं। HNIs/UHNIs क्लाइंट्स के लिए ग्लोबल इन्वेस्टिंग का गेटवे बन सकता है
ग्लोबल इन्वेस्टिंग अब सिर्फ़ डाइवर्सिफ़िकेशन (अलग-अलग जगहों पर निवेश) नहीं, बल्कि जरूरत बन गई है। ओवरसीज़ मार्केट में अलग-अलग थीम्स में निवेश करने के लिए 'गिफ़्ट सिटी' का रास्ता सबसे अच्छा और टैक्स के लिहाज से फायदेमंद है। ब्रोकिंग ऐप्स के ज़रिए सीधे निवेश करने में कई दिक्कतें आ सकती हैं, जैसे कि US में एस्टेट टैक्स और डिविडेंड पर विदहोल्डिंग टैक्स। इसलिए निवेशकों को इस रास्ते को चुनने में ज्यादा सावधानी बरतनी चाहिए।
भले ही रिडेम्पशन (निवेश भुनाने) पर आपको 0% टैक्स देना पड़े, फिर भी आपको इन ट्रांजैक्शन्स की जानकारी अपने भारतीय इनकम टैक्स रिटर्न (ITR) में देनी होगी। क्योंकि यह निवेश RBI की 'लिबरलाइज़्ड रेमिटेंस स्कीम' (LRS) के तहत विदेशी मुद्रा (USD) में किया जाता है, इसलिए कानूनी तौर पर आपको 'शेड्यूल FA' (विदेशी संपत्ति) के तहत इन यूनिट्स की जानकारी देनी होगी और रिडेम्पशन को 'एग्ज़म्प्ट इनकम' (टैक्स-मुक्त आय) के तौर पर दिखाना होगा।
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