अमेरिका के टैरिफ बढ़ाने का असर कई देशों खासकर खासकर एशिआई देशों की इकोनॉमीज पर पड़ा है। इससे उनकी करेंसी में कमजोरी आई है। सबसे ज्यादा असर इंडिया और इंडोनेशिया की करेंसी पर पड़ा है। इंडिया में रुपये पर दबाव बढ़ानें में घरेलू कारणों का भी हाथ रहा है। इससे यह सबसे ज्यादा कमजोर होने वाली करेंसी बन गई है।
अमेरिका ने इंडिया और चीन दोनों पर लगाया टैरिफ
अमेरिका ने इंडिया और चीन दोनों पर ज्यादा टैरिफ लगाया है, लेकिन दोनों की करेंसी पर इसका असर अलग-अलग तरह से पड़ा है। रुपया एशिया में खराब प्रदर्शन वाली करेंसी बन गया है, वही चीन के युआन में अपेक्षाकृत स्थिरिता देखने को मिली है। इसमें बड़ा हाथ चीन के केंद्रीय बैंक पीपल्स बैंक ऑफ चाइना का है। उसने युआन को ज्यादा गिरावट से बचाने के लिए हस्तक्षेप किए हैं।
एशिया में भी इंडनोशिया की करेंसी में गिरावट
इंडिया की करेंसी और इंडोनेशिया के रुपिया में बड़ी कमजोरी आई है। लेकिन, रुपया जहां इस साल अब तक 3.35 फीसदी गिरा है, वही इंडोनेशिया के रुपिया में 3.98 फीसदी गिरावट आई है। इकोनॉमिस्ट्स का कहना है कि विदेशी कारणों का असर इंडिया और इंडोनेशिया दोनों की करेंसी पर पड़ा है। लेकिन, इंडिया में घरेलू कारणों ने भी रुपया पर दबाव बढ़ाया है। इसमें देश में कैपिटल की कमजोर आवक (Inflow) शामिल है।
रुपये के 91 के पार जाने पर आरबीआई को हस्तक्षेप करना पड़ा
हाल में रुपया के 91 के लेवल को पार कर जाने के बाद आरबीआई को हस्तक्षेप करना पड़ा। हालांकि, ऐसे उपायों से कुछ समय के लिए गिरावट थम सकती है, लेकिन वैश्विक मुश्किलों और घरेलू असंतुलन का असर करेंसी (रुपये) पर बना रहेगा। आईडीआई फर्स्ट बैंक की इकोनॉमिस्ट गौरा सेनगुप्ता के मुताबिक, रुपये में तेज गिरावट की बड़ी वजह कैपिटल इनफ्लो में सुस्ती है।
रुपये में कमजोरी की बड़ी वजह सुस्ती एफपीआई फ्लो
उन्होंने कहा कि इस वित्त वर्ष (FY26) में नवंबर तक उभरते बाजारों में कुल फॉरेन पोर्टफोलियो इनवेस्टमेंट (FPI) 219 अरब डॉलर रहा। FY25 की समान अवधि में यह 175 अरब डॉलर था। लेकिन, इंडिया में FY26 में नवंबर तक नेट एफपीआई फ्लो घटकर सिर्फ 0.4 अरब डॉलर रहा। एक साल पहले की समान अवधि में यह 7.7 अरब डॉलर था। उन्होंने कहा कि इसकी वजह इंडिया में निवेश पर घटता रिटर्न है। नॉमिनल जीडीपी ग्रोथ में सुस्ती से इसका संकेत मिला है।
कई एशियाई करेंसीज में गिरावट के बाद रिकवरी
यह इंडोनेशिया से बिल्कुल उलट स्थिति है। वह इकोनॉमी से जुड़ी चुनौतियों की वजह से आउटफ्लो करेंसी में गिरावट की बड़ी वजह है। इसके अलावा कई दूसरी एशियाई करेंसीज में भी डॉलर के मुकाबले कमजोरी आई है। लेकिन, टेंशन घटने और दूसरे विकल्प उपलब्ध होने पर कुछ करेंसीज में रिकवरी दिखी है। भारत में अमेरिका से डील को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है। इसका असर सेंटिमेंट पर पड़ रहा है।
अमेरिका से ट्रेड डील में देरी का भी पड़ रहा असर
बैंक ऑफ बड़ौदा की इकोनॉमिस्ट अदिती गुप्ता का कहना है कि इंडोनेशिया अमेरिका के साथ डील करने में कामयाब रहा है, जबकि इंडिया के मामले में डील में लगातार देरी हो रही है। इससे इनवेस्टर्स निवेश के लिए इंतजार करना चाहते हैं। इंडिया का अमेरिकी मार्केट पर काफी ज्यादा निर्भरता रही है। इंडिया के एक्सपोर्ट्स में अमेरिका की हिस्सेदारी 20 फीसदी है। इसके मुकाबले इंडोनेशिया के एक्सपोर्ट में अमेरिकी की हिस्सेदारी कम है।