ईरान युद्ध से पाकिस्तान को सबसे ज्यादा नुकसान! हिंसक प्रदर्शन, सऊदी समझौता और तेल के झटकों से पिस रहा पड़ोसी देश
ईरान युद्ध का असर पाकिस्तान पर गहरा पड़ता दिख रहा है। देश में हिंसक प्रदर्शन, सऊदी अरब के साथ रक्षा समझौते की दुविधा, बढ़ती तेल कीमतें और कमजोर अर्थव्यवस्था ने पाकिस्तान को कई मोर्चों पर संकट में डाल दिया है। जानिए पाकिस्तान ने खुद कैसे अपने लिए खड़ी कर ली हैं मुश्किलें।
ईरान युद्ध ने पाकिस्तान की राजनीतिक और आर्थिक व्यवस्था की कई कमजोरियों को उजागर कर दिया है।
ईरान, अमेरिका और इजरायल के बीच जारी संघर्ष का असर अब पूरे पश्चिम एशिया में फैल रहा है और पाकिस्तान भी इसकी चपेट में आ गया है। यह युद्ध सीधे तौर पर अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच है। लेकिन, इसका असर पाकिस्तान पर उन कई देशों से ज्यादा दिखाई दे रहे हैं, जो सीधे लड़ाई में शामिल हैं।
पाकिस्तान इस समय एक साथ कई संकटों से जूझ रहा है। सड़कों पर हिंसक विरोध प्रदर्शन, बढ़ता ईंधन संकट, कमजोर अर्थव्यवस्था और अफगानिस्तान के साथ सीमा तनाव ने सरकार की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। इससे पाकिस्तान की विदेश नीति के विरोधाभास भी सामने आ गए हैं और नेतृत्व पर दबाव बढ़ गया है।
कुछ ही महीने पहले पाकिस्तान ने सऊदी अरब के साथ रक्षा समझौता किया था और खुद को मुस्लिम दुनिया में अहम भूमिका निभाने वाला देश बताने की कोशिश की थी। लेकिन अब उसे खाड़ी देशों, ईरान और अमेरिका के बीच संतुलन बनाने की मुश्किल स्थिति का सामना करना पड़ रहा है। इसका असर देश के भीतर बढ़ते तनाव और आर्थिक दबाव के रूप में दिखाई दे रहा है।
पाकिस्तान में हिंसक विरोध प्रदर्शन
ईरान युद्ध का सबसे बड़ा असर पाकिस्तान के भीतर देखने को मिला है। पिछले हफ्ते कई शहरों में ईरान के समर्थन में हुए प्रदर्शन हिंसक हो गए।
ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के मुताबिक, पाकिस्तान में कम से कम 24 लोगों की मौत हुई जब ईरान समर्थक प्रदर्शनकारियों ने अमेरिकी हितों और सरकारी इमारतों को निशाना बनाया। कुछ स्थानीय रिपोर्टों में मृतकों की संख्या 35 से ज्यादा बताई गई है। यह उन देशों में सबसे ज्यादा मौतों का आंकड़ा है जो सीधे इस युद्ध में शामिल नहीं हैं।
इन प्रदर्शनों से यह भी साफ हुआ कि ईरान संकट को लेकर पाकिस्तान के भीतर राजनीतिक और सामाजिक विभाजन कितना गहरा हो चुका है। सड़कों पर गुस्सा सिर्फ अमेरिका के खिलाफ नहीं बल्कि पाकिस्तान के नेतृत्व के खिलाफ भी दिखाई दिया।
सऊदी अरब से रक्षा समझौते ने बढ़ाई मुश्किल
पाकिस्तान की मौजूदा स्थिति उसकी अपनी रणनीतिक नीतियों का भी नतीजा मानी जा रही है। ईरान युद्ध शुरू होने से कुछ महीने पहले पाकिस्तान ने सऊदी अरब के साथ रक्षा सहयोग समझौते को मजबूत किया था। यह समझौता ऐसे समय में हुआ, जब खाड़ी क्षेत्र में पहले से ही तनाव बढ़ रहा था।
जब ईरान युद्ध शुरू हुआ तो यह समझौता सिर्फ कागज पर मौजूद कूटनीतिक वादा नहीं रहा, बल्कि इसके वास्तविक राजनीतिक और सैन्य असर सामने आने लगे।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, इससे पाकिस्तान की सैन्य और राजनीतिक नेतृत्व मुश्किल में आ गई है। अगर पाकिस्तान सऊदी अरब का समर्थन करता है तो ईरान नाराज हो सकता है, जिसके साथ उसकी लंबी और संवेदनशील सीमा है। वहीं तटस्थ रहने से खाड़ी देशों और अमेरिका को नाराज करने का खतरा है।
मुस्लिम दुनिया की राजनीति और अमेरिका के बीच संतुलन
पाकिस्तान लंबे समय से खुद को दुनिया भर में मुस्लिम मुद्दों का समर्थक बताता रहा है। लेकिन उसकी अमेरिका और खाड़ी देशों के साथ मजबूत सुरक्षा साझेदारी इस दावे को जटिल बना देती है। ईरान युद्ध ने पाकिस्तान को इन दो विरोधी दबावों के बीच खड़ा कर दिया है।
एक तरफ खाड़ी देशों की उम्मीद है कि पाकिस्तान ईरान के खिलाफ उनका समर्थन करेगा। दूसरी तरफ पाकिस्तान के भीतर बड़ी संख्या में लोग ईरान के प्रति सहानुभूति रखते हैं। इसके साथ ही अमेरिका भी क्षेत्रीय सुरक्षा मामलों में पाकिस्तान से सहयोग की उम्मीद करता है। इन सभी अपेक्षाओं के बीच संतुलन बनाना पाकिस्तान के नेतृत्व के लिए लगातार कठिन होता जा रहा है।
अफगानिस्तान के साथ तनाव और आर्थिक दबाव
ईरान युद्ध ऐसे समय में सामने आया है जब पाकिस्तान पहले से ही अफगानिस्तान के साथ बढ़ते तनाव का सामना कर रहा है। दोनों देशों की सीमा पर हाल के हफ्तों में झड़पें बढ़ी हैं। इससे पाकिस्तान की पहले से कमजोर आर्थिक स्थिति पर और दबाव बढ़ गया है।
यह स्थिति इसलिए भी संवेदनशील है क्योंकि पाकिस्तान इस समय अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) से वित्तीय सहायता के लिए बातचीत कर रहा है। आर्थिक जानकारों का कहना है कि लगातार अस्थिरता से यह कार्यक्रम भी खतरे में पड़ सकता है।
तेल महंगा होने से गहराया ईंधन संकट
ईरान युद्ध का असर पाकिस्तान के ऊर्जा क्षेत्र पर भी पड़ा है। तेल की कीमतों में तेजी से पाकिस्तान का आयात बिल बढ़ गया है। मनीकंट्रोल की रिपोर्ट के मुताबिक, पाकिस्तान के वित्त मंत्री ने चेतावनी दी है कि अगर संकट जारी रहा तो देश का मासिक तेल आयात बिल 600 मिलियन डॉलर तक पहुंच सकता है।
विदेशी मुद्रा भंडार पहले से कम होने के कारण यह पाकिस्तान के लिए बड़ी समस्या बन सकता है। देश में पेट्रोल और डीजल की कीमतें भी तेजी से बढ़ी हैं। रिपोर्ट के अनुसार पेट्रोल की कीमत PKR 321.17 प्रति लीटर और डीजल की कीमत PKR 335.86 प्रति लीटर तक पहुंच गई है।
ईंधन बचाने के लिए शहबाज सरकार की अपील
बढ़ती कीमतों और संभावित कमी को देखते हुए प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने कई आपात कदम उठाए हैं। सरकार ने स्कूल और विश्वविद्यालय बंद करने का आदेश दिया है। सरकारी दफ्तरों के लिए चार दिन का वर्किंग वीक लागू किया गया है। कर्मचारियों को घर से काम करने के लिए कहा गया है, ताकि ईंधन की खपत कम हो सके।
सरकार ने नागरिकों से गैरजरूरी यात्रा कम करने और बिजली बचाने की अपील भी की है। ये कदम दिखाते हैं कि पाकिस्तान की ऊर्जा व्यवस्था वैश्विक कीमतों में अचानक बढ़ोतरी के प्रति कितनी संवेदनशील है।
कई संकटों के बीच फंसा पाकिस्तान
ईरान युद्ध ने पाकिस्तान की राजनीतिक और आर्थिक व्यवस्था की कई कमजोरियों को उजागर कर दिया है। क्षेत्रीय राजनीति में खुद को अहम खिलाड़ी बताने वाला पाकिस्तान अब कई मोर्चों पर संकट से जूझ रहा है।
घरेलू विरोध, अफगान सीमा पर तनाव, बढ़ती ईंधन कीमतें और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय सहायता पर निर्भरता जैसे कई जोखिम एक साथ सामने आ गए हैं। इस स्थिति में पाकिस्तान उन देशों में शामिल हो गया है जिसे उस युद्ध का सबसे ज्यादा अप्रत्यक्ष नुकसान हो रहा है जिसमें वह सीधे शामिल भी नहीं है।
अब पाकिस्तान के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह ईरान युद्ध के असर को संभालने के साथ साथ देश के भीतर बढ़ते राजनीतिक और आर्थिक संकट को भी नियंत्रण में रख सके।