इंडियन स्टॉक मार्केट्स के लिए अगले कुछ दिन काफी अहम होंगे। मार्केट्स पर कई बातों का असर पड़ेगा। इनमें मध्यपूर्व में बढ़ता तनाव, एफएंडओ से जुड़े सेबी के नए नियम और चीन के स्टॉक मार्केट्स में तेजी शामिल हैं। अच्छी बात यह है कि इनमें से कोई चीज अचानक नहीं आई है। इनके बारे में पहले से चर्चा चल रही थी। लेकिन, इनका खासकर पश्चिम एशिया में बिगड़ते हालात का सीधा असर इकोनॉमी पर पड़ेगा। सवाल है कि ऐसे माहौल में निवेशकों को क्या करना चाहिए? खासकर तब जब इंडियन मार्केट की वैल्यूएशन पहले से काफी ज्यादा है, निवेशकों की स्ट्रेटेजी क्या होनी चाहिए?
लड़ाई में ईरान के शामिल होने का इंडिया पर कितना असर?
इजराइल (Israel) और हमास (Hamas) की लड़ाई में अब लेबनान, ईरान और यमन शामिल हो गए हैं। ईरान ने 1 अक्टूबर की रात इजराइल पर मिसाइलें दागी हैं। ईरान समर्थित इरानी लड़ाका समूहों ने इराक में अमेरिकी ठिकानों को निशाना बनाने की धमकी दी है। अगर मध्यपूर्व में लड़ाई का दायरा बढ़ता है तो इसका असर लाल सागर के रास्ते गुजरने वाले जहाजों पर पड़ेगा। हालांकि, इसका बहुत ज्यादा असर नहीं पड़ेगा क्योंकि इस रास्ते का इस्तेमाल करने वाले ज्यादातर व्यवसायिक जहाज पिछले कई महीनों से केप ऑफ गुड होप (Cape of good hope) रूट का इस्तेमाल कर रहे हैं। इंडियन एक्सपोर्टर्स गुड्स के ट्रांसपोर्टेशन में लगने वाले ज्यादा समय के साथ तालमेल बैठा चुके हैं।
अगर पश्चिमी देश ईरान पर नए प्रतिबंध लगाते हैं तो उसका इंडिया के एक्सपोर्ट-इंपोर्ट पर ज्यादा असर नहीं पड़ेगा। इसकी वजह यह है कि पहले लगाग गए प्रतिबंधों की वजह से पिछले कुछ सालों में इंडिया के ट्रेड में ईरान की हिस्सेदारी काफी कम रह गई है। लेकिन, यह ध्यान में रखना होगा कि इंडिया के क्रूड ऑयल के इंपोर्ट में यूएई, सऊदी अरब, इराक और कुवैत की 43 फीसदी हिस्सेदारी है। बीते कुछ सालों में रूस से क्रूड ऑयल का इंपोर्ट बढ़ा है। कुल इंपोर्ट में इसकी हिस्सेदारी 38 फीसदी पहुंच गई है। इससे अगर पश्चिम एशियाई देशों से क्रूड के इंपोर्ट में बाधा आती है या कीमतें बढ़ती हैं तो इंडिया के पास रूस का विकल्प है।
इंडियन इकोनॉमी के लिए कितना खतरा पैदा हो सकता है?
अमेरिकी कंपनियों की प्रॉफिट ग्रोथ, हाल में आए जीडीपी डेटा और FOMC के अनुमान को देख ऐसा लगता है कि अमेरिकी इकोनॉमी मुश्किल से बाहर आ रही है। उधर, चीन में सरकार और केंद्रीय बैंक ने इकोनॉमी को सहारा देने के लिए कई कदम उठाए हैं। इससे चीन में डिमांड बढ़ने की उम्मीद है। अगर ऐसा होता है तो दुनिया के बाजारों में चीन के सस्ते एक्सपोर्ट में कमी आएगी। इधर, इंडियन इकोनॉमी की सेहत अच्ची है। IMF ने इस साल इंडियन इकोनॉमी की ग्रोथ 7 फीसदी रहने का अनुमान जताया है।
क्या इंडियन मार्केट में इनवेस्टमेंट पर ब्रेक लग सकता है?
इंडियन मार्केट्स में पिछले कुछ सालों में निवेश की रफ्तार काफी अच्छी रही है। इसमें घरेलू निवेश का हाथ है। 2021 की शुरुआत से इंडियन मार्केट में 175 अरब डॉलर का निवेश आया है। इसमें घरेलू निवेशकों की 90 फीसदी से ज्यादा हिस्सेदारी है। घरेलू निवेशकों में छोटे-बड़े सभी निवेशक (DII, HNI और रिटेल इनवेस्टर्स) शामिल हैं। सितंबर में विदेशी निवेशकों (FII) ने इंडियन मार्केट्स में 6.9 अरब डॉलर निवेश किए। इसका मतलब है कि इंडियन मार्केट्स में लिक्विडिटी आगे भी स्ट्रॉन्ग बनी रहेगी। SEBI के F&O के नए नियमों की वजह से कैश मार्केट में लिक्विडिटी बढ़ सकती है।
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अभी इंडियन मार्केट के लिए सबसे बड़ी चिंता क्या है?
इंडियन मार्केट्स के लिए सबसे बड़ी चिंता हाई वैल्यूएशन है। इसलिए आने वाले हफ्तों में बाजार में थोड़ी गिरावट दिख सकती है। अगर इतिहास को देखा जाए तो युद्ध जैसी स्थितियों का उन देशों के स्टॉक मार्केट्स पर ज्यादा असर नहीं पड़ता है, जो दूर स्थित हैं। लेकिन, अभी यह तय नहीं है कि मध्यपूर्व की लड़ाई आगे किस तरह का रूप लेगी। अमेरिका में नवंबर में राष्ट्रपति चुनाव हैं, जिसके नतीजों पर करीबी नजरें होंगी। अमेरिका के नए राष्ट्रपति की पॉलिसी का असर ग्लोबल ट्रेड पर पड़ेगा। ऐसे में इंडियन मार्केट्स की वैल्यूएशन के लिए दूसरी तिमाही में कंपनियों की प्रॉफिट ग्रोथ सबसे अहम है। नतीजों का सीजन जल्द शुरू होने जा रहा है।