Market Outlook : एक जाने-माने विदेशी ब्रोकरेज फर्म बर्नस्टीन ने अपने ताज़ा नोट में कहा है कि भले ही कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल से नीचे आ जाएं, फिर भी उसके पूरे साल ऊंचे स्तर पर बने रहने की संभावना है। इससे भारत के मैक्रोइकोनॉमिक आउटलुक के लिए जोखिम पैदा हो सकता है। इन स्थितियों को ध्यान में रखते हुए,ब्रोकरेज ने साल 2026 के आखिर के लिए अपने निफ्टी टारगेट को घटाकर 26000 कर दिया है।
ब्रोकरेज ने कहा कि उसे इस बात की काफी संभावना दिख रही है कि गर्मियों में महंगाई दर 6 प्रतिशत के पार जा सकती है,जिससे ब्याज दरों में कटौती में कम से कम दो तिमाहियों की देरी हो सकती है और GDP ग्रोथ की रफ्तार धीमी पड़ सकती है। बर्नस्टीन ने कहा कि हालांकि उसे उम्मीद है कि पश्चिम एशिया का संघर्ष आखिरकार शांत हो जाएगा,लेकिन इसके चलते पहले ही काफी ढांचागत बदलाव आ चुका है।
लड़ाई के अप्रैल से आगे खिंचने की आशंका नहीं
उसने आगे कहा कि घरेलू स्तर पर सपोर्ट की कमी,अमेरिका को हुए नुकसान,कच्चे तेल की बढ़ी हुई कीमतें और अमेरिका में होने वाले मध्यावधि चुनाव इस लड़ाई को खत्म करा सकते हैं। इस बात की संभावना कम ही है कि यह लड़ाई अप्रैल के बाद भी जारी रहेगी।
लड़ाई थमने पर भी ऊंची रह सकती हैं तेल की कीमतें
ब्रोकरेज का कहना है कि पश्चिम एशिया में लड़ाई के चलते तेल और गैस के इंफ्रास्ट्रक्चर को हुए नुकसान का मतलब है कि अब यह मुद्दा सिर्फ़ होर्मुज़ जलडमरूमध्य तक ही सीमित नहीं रह गया है। इन तेल और गैस प्लांट्स के ठीक होने और फिर से काम शुरू करने में काफी लंबा समय लग सकता है। इससे एनर्जी सप्लाई की दिक्कत लंबे समय तक खिंच सकती है। इसके अलावा स्थिति समान्य होने पर तमाम देश अपना पेट्रोलियम भंडार बढ़ाएंगे। इसके चलते कच्चे तेल की कीमतें ऊंची बनी रह सकती हैं।
GDP ग्रोथ का घटकर 2–3 प्रतिशत रह जाने का डर
बर्नस्टीन का कहना है कि अगर मिडिल ईस्ट की लड़ाई लंबी खिंचती है तो भारत के लिए इसके गंभीर नतीजे होंगे। ऐसा होने पर सप्लाई में बाधा,दोहरे अंकों की महंगाई, GDP ग्रोथ का घटकर 2–3 प्रतिशत रह जाना,रुपये का 110 से भी ज़्यादा कमज़ोर होना और निफ्टी का 20,000 से काफी नीचे गिर जाना जैसे खतरे देखने को मिल सकते हैं। ऐसी स्थिति में,ऊंची ब्याज दरें कई तिमाहियों तक क्रेडिट ग्रोथ के लिए बड़ी बाधा बन सकती हैं।
तेल की कीमतों से काफी गहराई से जड़ी है भारत की ग्रोथ
ब्रोकरेज ने इस बात पर जोर दिया कि हाल के वर्षों में भारत का मज़बूत आर्थिक प्रदर्शन,काफी हद तक कच्चे तेल की कीमतों में नरमी से जुड़ा रहा है। यह भारत की ग्लोबल फैक्टर्स के प्रति संवेदनशीलता को दिखाता है। 2014 से 2021 के बीच,कच्चे तेल की कीमतें ज़्यादातर 80 डॉलर प्रति बैरल से नीचे ही रहीं हैं। इसमें सिर्फ़ कुछ समय के लिए ही तेज़ी देखने को मिली। यहां तक कि रूस-यूक्रेन संघर्ष के दौरान भी,कच्चे तेल की कीमतें सिर्फ़ कुछ ही समय के लिए 100 डॉलर से ऊपर रहीं,जिसके बाद उनमें गिरावट आ गई।
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