Brokerage Report : अंतरराष्ट्रीय ब्रोकरेज फर्म बर्नस्टीन ने कच्चे तेल की ऊंची कीमतों,बढ़ती महंगाई और ब्याज दरों में कटौती में देरी को देखते हुए,कैलेंडर वर्ष 2026 के लिए अपने निफ्टी 50 के टारगेट को घटाकर 26,000 कर दिया है। ब्रोकरेज का कहना कि उसे इस गर्मी में महंगाई के 6% का आंकड़ा पार करने,ब्याज दरों में कटौती कम से कम दो तिमाहियों के लिए टलने और GDP ग्रोथ में नरमी आने की संभावनाएं नज़र आ रही हैं।
गौरतलब है कि इस साल निफ्टी अब तक करीब 12% गिर चुका है। ब्रोकरेज का कहना कि बाजार के लिए आगे का रास्ता काफी हद तक इस बात पर निर्भर करेगा कि मौजूदा भू-राजनीतिक तनाव और उसके चलते कच्चे तेल की कीमतों में आई तेज़ी कितने समय तक बनी रहती है। बर्नस्टीन ने कहा "हम अपना न्यूट्रल रुख बनाए हुए हैं और हमारा मानना है कि इस साल अलग-अलग समय पर रुपये पर दबाव बना रहेगा। इसका मतलब है कि 2026 में कुल मिलाकर बाज़ार सपाट या थोड़ा निगेटिव रह सकते हैं।"
बाजार में गिरावट सिर्फ सेंटीमेंटल नहीं
ब्रोकरेज के मुताबिक अभी तक,रिस्क-रिवॉर्ड न्यूट्रल ज़ोन में ही दिखा रहा है। युद्ध खत्म होने पर बाज़ार में फिर से तेजी आने की संभावना है। लेकिन कोई नहीं जानता कि युद्ध कब खत्म होगा। यह एक 'बाइनरी कॉल' है। मैक्रो-इकोनॉमिक हालात तथा कंपनियों की अर्निंग पर पड़ने वाले असर को देखते हुए,बाज़ार में आई इस गिरावट को सिर्फ़ सेंटीमेंट की वजह से हुई गिरावट नहीं माना जाना चाहिए।
वेट एंड वॉच ही सबसे अच्छी रणनीति
ऐसे हालात में साफ़ संकेतों का इंतज़ार करना अक्सर सबसे अच्छी रणनीति होती है। ब्रोकरेज का सुझाव है कि जब तक पश्चिम एशिया को लेकर स्थिति साफ न हो छोटे-मझोले शेयरों से दूर रहें। हो सकता है कि हमें जल्द ही इस फ्रंट से कुछ अच्छी खबर सुनने को मिले।
बेयर-केस' सिनेरियो में 19000 तक फिसल सकता है निफ्टी
बर्नस्टीन ने एक 'बेयर-केस'(मंदी के) सिनेरियो की ओर भी इशारा किया है,जो एक असली खतरा बना हुआ है। ब्रोकरेज का कहना कि अगर यह संघर्ष लंबा खिंचता है और कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंची बनी रहती हैं,तो निफ्टी में और भी बड़ी गिरावट देखने को मिल सकती है। इसके स्तर 20,000 से नीचे खिसक सकते हैं और 19,000 के स्तर को भी छू सकते हैं। इसके साथ ही,व्यापक आर्थिक मंदी,लिक्विडिटी में कमी और वैल्यूएशन पर दबाव भी देखने को मिल सकता है।
कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें सबसे बड़ा सरदर्द
इस सोच के पीछे की मुख्य वजह तेल है। कच्चे तेल की बढ़ी हुई कीमतों से महंगाई बढ़ने की उम्मीद है और यह रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया के 'कम्फ़र्ट ज़ोन' से ऊपर जा सकती है। इससे ब्याज दरों में कटौती में देरी होगी और ब्याज दरें लंबे समय तक ऊंची बनी रहेंगी। इसका असर खपत और कॉर्पोरेट अर्निंग दोनों पर पड़ेगा। साथ ही, कमज़ोर रुपया और विदेशी निवेशकों का लगातार बाज़ार से पैसा निकालना,बाज़ार में होने वाले उतार-चढ़ाव को और बढ़ा सकता है।
लंबे समय तक चल सकती है एनर्जी सप्लाई की दिक्कत
ब्रोकरेज का कहना है कि पश्चिम एशिया में लड़ाई के चलते तेल और गैस के इंफ्रास्ट्रक्चर को हुए नुकसान का मतलब है कि अब यह मुद्दा सिर्फ़ होर्मुज़ जलडमरूमध्य तक ही सीमित नहीं रह गया है। इन तेल और गैस प्लांट्स के ठीक होने और फिर से काम शुरू करने में काफी लंबा समय लग सकता है। इससे एनर्जी सप्लाई की दिक्कत लंबे समय तक खिंच सकती है।
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