Market trend : पिछले 20 सालों में 15 बार अप्रैल ने दिया पॉजिटिव रिटर्न, क्या इस बार जारी रह पाएगा तेजी का ट्रेंड?
Market trend : पिछले आंकड़ों पर नजर डालें तो पिछले 20 ,सालों में से 15 सालों में सेंसेक्स और निफ्टी ने अप्रैल महीने में पॉजिटिव रिटर्न दिया है। पिछले एक दशक में,अप्रैल में केवल दो बार, 2021 और 2022 में निगेटिव रिटर्न मिला है, जबकि बाकी सभी वर्षों में बढ़त देखने को मिली है
Market Trend : नोमुरा का कहना कि होर्मुज स्ट्रेट के माध्यम से होने वाले एनर्जी सप्लाई में लंबे समय तक व्यवधान से तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंची रह सकती हैं
Market trend : अप्रैल महीने के दौरान बढ़त के मजबूत पिछले इतिहास के बावजूद भारतीय शेयर बाजार इस महीने की शुरुआत सतर्क रुख के साथ करते दिख रहे हैं। अमेरिका,ईरान और इजराइल के बीच तनाव कम होने के कोई संकेत नहीं दिख रहे हैं। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की हालिया चेतावनियों ने बाजार के सेंटीमेंट को और खराब किया है। इस चेतावनी में ईरान को शांति समझौते पर सहमत होने के लिए 48 घंटे की समय सीमा भी शामिल है। पिछले आंकड़ों पर नजर डालें तो पता चलता है कि पिछले 20,सालों में से 15 सालों में सेंसेक्स और निफ्टी ने अप्रैल महीने में पॉजिटिव रिटर्न दिया है। पिछले एक दशक में,अप्रैल में केवल दो बार, 2021 और 2022 में निगेटिव रिटर्न मिला है,जबकि बाकी सभी वर्षों में बढ़त देखने को मिली है।
2026 में अब तक,भारतीय बाजारों में तेज करेक्शन देखने को मिला है, बेंचमार्क सेंसेक्स और निफ्टी में 14 प्रतिशत से अधिक की गिरावट आई है। जबकि, बीएसई मिडकैप 150 इंडेक्स और बीएसई स्मॉलकैप 250 इंडेक्स जैसे इंडेक्सों में लगभग 12 प्रतिशत की गिरावट आई है।
मैक्रो इंडीकेटर कमजोर
कमजोर रुपये और विदेशी निवेशकों की तरफ से हो रही लगातार निकासी जैसे मैक्रो इंडीकेटर अप्रैल 2026 में जारी निगेटिवि ट्रेड की ओर इशारा कर रहे हैं। इसके अलावा कुछ एनालिस्ट्स का कहना है कि हालिया करेक्शन बाजारों में फैली निराशा का संकेत है। इससे और गिरावट देखने को मिल सकती हैं। वैल्यूशन भी कम हो गया है,निफ्टी लगभग 17.7 गुना अर्निंग्स पर कारोबार कर रहा है। यहा लंबी अवधि के औसत से लगभग 15 प्रतिशत कम है। उभरते बाजारों में भारत का प्रीमियम ऐतिहासिक औसत 73 प्रतिशत से घटकर लगभग 27 प्रतिशत हो गया है।
भू-राजनीतिक तनाव खराब कर रहा सेंटीमेंट
भू-राजनीतिक तनाव बाजार के सेंटीमेंटम को खराब कर रहा है। ईरान द्वारा अमेरिकी एफ-15ई लड़ाकू विमान को मार गिराने और खाड़ी में एक अन्य अमेरिकी विमान के दुर्घटनाग्रस्त होने की रिपोर्टों ने तनाव में नए सिरे से बढ़त के संकेत दिया है। ईरान ने शांति के लिए अमेरिकी मांगों को स्वीकार करने के बहुत कम संकेत दिए हैं। इसके बजाय उसने अपनी शर्तों रखी हैं। जिनमें से अधिकांश शर्तें अमेरिका और इज़राइल के लिए अस्वीकार्य हैं।
ग्लोबल ब्रोकरेज भारतीय इक्विटी मार्केट को लेकर सतर्क
इन घटनाओं को ध्यान में रखते हुए कई ग्लोबल ब्रोकरेज कंपनियां भारतीय इक्विटी मार्केट को लेकर सतर्क हो गई हैं। नोमुरा ने तेल की ऊंची कीमतों (जो दो सप्ताह से अधिक समय तक 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बनी हुई है), घरेलू निवेश में संभावित मंदी और एआई में भारत की स्थिति से जुड़ी चिंताओं का हवाला देते हुए भारतीय बाजारों की रेटिंग ओवर वेट से घटाकर न्यूट्रल कर दी है।
नोमुरा का कहना कि होर्मुज स्ट्रेट के माध्यम से होने वाले एनर्जी सप्लाई में लंबे समय तक व्यवधान से तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंची रह सकती हैं,जिससे भारत की अर्थव्यवस्था और कॉर्पोरेट अर्निंग्स के लिए जोखिम पैदा हो सकता है। इसकी रिपोर्ट में कहा गया है कि आयात पर निर्भरता के कारण भारत एशिया में लगातार बनी हाई एनर्जी प्राइस के कारण सबसे कमजोर अर्थव्यवस्थाओं में से एक बना हुआ है।
8 अप्रैल को आने वाली आरबीआई की पॉलिसी पर नजर
अब सभी का फोकस 8 अप्रैल को आने वाली आरबीआई की पॉलिसी पर है। आमतौर पर केंद्रीय बैंक द्वारा दरों में कोई बदलाव न करने की उम्मीद की जा रही है। पश्चिम एशिया संघर्ष के तेज होने से ग्लोबल जोखिम भावना और कमोडिटी बाजारों पर असर पड़ने से मैक्रो इकोनॉमिक स्थिति ज्यादा जटिल हो गई है।
सप्लाई में बाधा के चलते कच्चे तेल की कीमतें तेजी से बढ़ी हैं। ब्रेंट क्रूड लगभग 48 प्रतिशत बढ़ गया है,जबकि रुपया कमजोर हो गया है। भारत की तेल और गैस के आयात पर बहुत ज्यादा निर्भरता से महंगाई बढ़ने और भारत का चालू खाता घाटा बढ़ने का डर बढ़ गया है।
चौथी तिमही के नतीजों पर नजर
इस बीच,मार्च तिमाही के नतीजों का मौसम अप्रैल के मध्य से शुरू होने वाला है। टीसीएस 9 अप्रैल को,विप्रो 16 अप्रैल को और इंफोसिस 23 अप्रैल अपने नतीजे जारी करेगी। ब्रोकरेज फर्मों को उम्मीद है कि मार्च तिमाही की नतीजों पर ईरान-अमेरिका-इज़राइल संघर्ष का तत्काल प्रभाव अधिकांश सेक्टरों में सीमित रहेगा। कंपनियों को इन्वेंट्री बफर और निकट अवधि की मांग से सपोर्ट मिलेगा। हालांकि,कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों और चल रहे भू-राजनीतिक तनाव के प्रभाव के आकलन के लिए कंपनियों के मैनेजमेंट की टिप्पणियों पर बारीकी से नजर रहेगी।
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