मध्यपूर्व की लड़ाई का असर रुपये पर काफी ज्यादा पड़ा है। भारत काफी ज्यादा क्रूड ऑयल का इपोर्ट करता है। क्रूड की कीमतों में उछाल से भारत का इंपोर्ट बिल बढ़ा है। इससे करेंट अकाउंट डेफिसिट भी बढ़ा है। ऐसे में आरबीआई के लिए रुपये को गिरने से बचाना मुश्किल हो रहा है। केंद्रीय बैंक ने रुपये को सहारा देने के लिए कदम उठाए हैं, लेकिन इसका ज्यादा असर नहीं पड़ा है।
आरबीआई के उपायों का नहीं हुआ फायदा
RBI ने पिछले हफ्ते रुपये को गिरने से बचाने के लिए बड़ा कदम उठाया। डॉलर के मुकाबले रुपये के गिरकर रिकॉर्ड लो लेवल पर आ जाने के बाद केंद्रीय बैंक ने यह कदम उठाया। उसने बैकों के लिए डॉलर रखने की सीमा तय कर दी। लेकिन, इस कदम का 30 मार्च को रुपये पर ज्यादा असर नहीं दिखा। शुरुआत में रुपये में मजबूती दिखी, लेकिन यह टिक नहीं सकी। दोबारा रुपया दबाव में आ गया।
क्रूड ऑयल के आयात पर निर्भरता बड़ी वजह
इकोनॉमिस्ट्स का कहना है कि इसकी बड़ी वजह क्रूड ऑयल के आयात पर भारत की निर्भरता है। भारत क्रूड ऑयल के सबसे ज्यादा आयात के मामले में दुनिया में तीसरे नंबर पर है। इसके अलावा गल्फ देशों में रहने वाले भारतीय जो पैसा अपने परिवारों को भेजते हैं, उसमें भी कमी आने की आशंका है। खाड़ी देशों में करीब एक करोड़ भारतीय रहते हैं, जो हर महीने भारत में अपने परिवारों को पैसे भेजते हैं। मध्यपूर्व की लड़ाई की वजह से उनके भारत पैसे भेजने पर असर पड़ सकता है।
डॉलर की ज्यादा डिमांड से रुपये पर दबाव
आरबीसी कैपिटल मार्केट्स में एशिया मैक्रो स्ट्रेटेजी डायरेक्टर अब्बास केशवानी ने कहा, "रुपये से साथ दिक्कत यह है कि सिर्फ स्पेकुलेटर्स की तरफ से इस पर दबाव नहीं बन रहा है बल्कि इकोनॉमी में डॉलर की रियल डिमांड से भी इस पर दबाव बन रहा है।" उन्होंने कहा कि मध्यपूर्व की लड़ाई शुरू होने के पहले भारत का ट्रेड डिफिसिट काफी ज्यादा था और यह घाटा और बढ़ने जा रहा है।
बैलेंस ऑफ पेमेंट डेफिसिट बढ़ सकता है
ब्लूमबर्ग इकोनॉमिक्स के अभिषेक गुप्ता का कहना है कि अगर मध्यपूर्व में लड़ाई जारी रहती है और होर्मुज लंबे समय के लिए बंद रहता है तो अगले वित्त वर्ष में क्रूड की औसत कीमत 125 डॉलर प्रति बैरल रह सकती है। इससे इंडिया का बैलेंस ऑफ पेमेंट्स डेफिसिट 130 अरब डॉलर से ज्यादा हो जाएगा। मध्यपूर्व की लड़ाई से पहले गुप्ता ने 10 अरब डॉलर सरप्लस बैलेंस ऑफ पेमेंट का अनुमान लगाया था।
लगातार दूसरे साल बैलेंस ऑफ पेमेंट डेफिसिट में रहेगा
आरबीआई के डेटा के मुताबिक, FY24 में बैलेंस ऑफ पेमेंट 63.7 अरब डॉलर सरप्लस था। FY25 में 5 अरब डॉलर का डेफिसिट था। स्टैंडर्ड चार्टर्ड में इंडिया इकोनॉमिस्ट अनुभूति सहाय ने कहा, "इस वित्त वर्ष में लगातार दूसरे साल इंडिया का बैलेंस ऑफ पेमेंट डेफिसिट में रहेगा। ऐसा पहले कभी नहीं हुआ। तीसरे साल बैलेंस ऑफ पेमेंट डेफिसिट में रहने का रिस्क बढ़ गया है।" नया वित्त वर्ष 1 अप्रैल से शुरू हो रहा है।
गोल्डमैन सैक्स घटा चुका है ग्रोथ का अनुमान
क्रूड ऑयल की कीमतों में उछाल की वजह से शांतनु सेनगुप्ता की अगुवाई वाले गोल्डमैन सैक्स ग्रुप इकनॉमिस्ट्स गुप ने 2026 में इंडिया की ग्रोथ के अनुमान को पिछले हफ्ते घटाकर 5.9 फीसदी कर दिया। इससे दो हफ्ते पहले उसने इसे 7 फीसदी से घटाकर 6.5 फीसदी किया था।