Sebi ने जिन पर की कार्रवाई, उन्हीं 3 अधिकारियों को Kotak Group ने दिया प्रमोशन, छिड़ गई नई बहस

कॉर्पोरेट लॉ के एक्सपर्ट्स का मानना है कि ऐसे कार्यों से कंपनी के कॉर्पोरेट गवर्नेंस के स्टैंडर्ड्स को लेकर संदेह और सवाल खड़े हो सकते हैं

अपडेटेड Sep 29, 2022 पर 4:13 PM
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Kotak Group ने 23 सितंबर को अपनी एसेट मैनेजमेंट टीम में व्यापक बदलाव का ऐलान किया था
     
     
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    Kotak Group ने 23 सितंबर को अपनी एसेट मैनेजमेंट टीम में व्यापक बदलाव का ऐलान किया था। लक्ष्मी अय्यर को कोटक इनवेस्टमेंट एडवाइजर्स लिमिटेड (KIAL) के सीईओ के रूप में प्रमोट कर दिया गया। दीपक अग्रवाल को कोटक महिंद्रा एसेट मैनेजमेंट कंपनी में चीफ इनवेस्टमेंट ऑफिसर (फिक्स्ड इनकम) के पद पर प्रमोशन दिया गया, वहीं अभिषेक बिसेन को फिक्स्ड इनकम का हेड बना दिया गया। ये बदलाव 1 नवंबर, 2022 से प्रभावी हो जाएंगे।

    सामान्य परिस्थितियों में इसे संगठन में नियमित बदलाव माना जाता। लेकिन इस बार ऐसा नहीं था।

    तीन महीने पहले सेबी ने की थी कार्रवाई


    तीन महीने पहले ये तीनों उन अधिकारियों में शामिल थे, जिन पर म्यूचुअल फंड्स से जुड़े नियमों के उल्लंघन पर मार्केट रेगुलेटर सेबी ने कार्रवाई की थी और पेनाल्टी लगाई थी। कोटक ने Securities Appellate Tribunal (SAT) में सेबी के आदेश को चुनौती दी और 24 अगस्त को स्टे हासिल कर लिया था। इस केस में अब नवंबर में सुनवाई होनी है।

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    क्या है मामला?

    यह मामला छह फिक्स्ड मैच्योरिटी प्लान (FMP) स्कीम्स से जुड़ा है, जो अप्रैल और मई 2019 में मैच्योर हुई थीं। उन्होंने एस्सेल ग्रुप से संबंधित एडिसंस यूटिलिटी वर्क्स, कोंति इन्फ्रापावर एंड मल्टीवेंचर्स द्वारा जारी डेट सिक्योरिटीज में निवेश किया था। ये डेट सिक्योरिटीज ज़ी एंटरटेनमेंट एंटरप्राइजेस लि. की प्रमोटर साइकेटर मीडिया सर्विसेज द्वारा गिरवी रखे गए उसके इक्विटी शेयरों से सुरक्षित थी। कंपनी ने दलील दी थी कि छह फिक्स्ड मैच्योरिटी प्लांस की पेमेंट की डेडलाइन निवेशकों के हित को ध्यान में रखते हुए बढ़ाई थी।

    मनीकंट्रोल के संपर्क करने पर कोटक ने इस पर टिप्पणी करने से इनकार कर दिया। कोटक ने कहा कि मामला अभी कोर्ट में विचाराधीन है।

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    क्या कोटक ने सही किया?

    अब इन अधिकारियों के प्रमोशन से एक बहस छिड़ गई है। कॉर्पोरेट गवर्नेंस के तहत, क्या उन अधिकारियों को रिवार्ड दिया जाना सही है जिन पर कुछ समय पहले ही रेगुलेटर ने कार्रवाई की थी?

    सिक्योरिटीज लॉ एक्सपर्ट जयंत ठाकुर ने कहा, जब एक रेगुलेटर किसी बड़े अधिकारी के खिलाफ कोई आदेश देता है तो गुड कॉर्पोरेट गवर्नेंस के तहत ऐसी स्थिति में उसे हटा देना चाहिए या सस्पेंशन में रखना चाहिए या छुट्टी पर भेजा जाना चाहिए। अगर कंपनी फैक्ट्स के आधार पर रेगुलेटर से सहमत नहीं है तो वह ऐसा करने से इनकार भी कर सकती है। ठाकुर ने कहा, कंपनी फैक्ट्स के आधार पर लीगल व्यू भी ले सकती है।

    क्या कोटक ने दिए ये संकेत?

    माना जा रहा है कि प्रमोशन देकर कोटक ने साफ संकेत दे दिया है कि वह रेगुलेटरी एक्शन का पुरजोर विरोध करता है। वास्तव में, प्रमोशन किसी कानून की खिलाफत नहीं है। लेकिन इससे कॉर्पोरेट गवर्नेंस के स्टैंडर्ड्स पर जरूर सवाल खड़े होते हैं।

    हालांकि, कॉर्पोरेट लॉ के एक्सपर्ट्स का मानना है कि ऐसे कार्यों से कंपनी के कॉर्पोरेट गवर्नेंस के स्टैंडर्ड्स को लेकर संदेह और सवाल खड़े हो सकते हैं।

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