पॉवेल बूस्टर लगने से Nifty-Sensex ने हिट किया नया हाई, क्या इस रैली अभी भी बाकी है दम!

यूएस फेड के नरम रुख से भारतीय इक्विटी मार्केट में विदेशी निवेश में तेजी आने की उम्मीद है। फेड का ये फैसला भारतीय बाजारों के नजरिए से बहुत सही समय पर आया है। बड़ी संख्या में आए आईपीओ और प्रमोटरों की तरफ शेयर बिक्री के कारण बाजार को नकदी की कमी का सामना करना पड़ रहा है। ऐसे में विदेशी निवेशकों की तरफ से आने वाले निवेश से बाजार को अच्छा सपोर्ट मिलेगा

अपडेटेड Dec 14, 2023 पर 6:12 PM
उम्मीद है कि यूएस फेड मार्च 2024 की शुरुआत में दरों में कटौती शुरू कर देगा। बाजार जानकारों का कहना है कि भारतीय रिजर्व बैंक भी जल्द ही यूएस फेड के नक्शे कदम पर चलता दिखेगा

14 दिसंबर को अमेरिकी फेडरल रिजर्व ने एक चौंकाने वाला कदम उठाते हुए संकेत दिया कि वह उम्मीद से पहले ब्याज दरों में कटौती करेगा। इसके बाद तो आज तेजड़िये कुछ ज्यादा ही जोश में आ गए। आईटी शेयरों में तेज बढ़त के चलते इंट्राडे में सेंसेक्स और निफ्टी 21,210 और 70,602 की रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंच गए। कारोबारी सत्र के अंत में सेंसेक्स 1.36 फीसदी की बढ़त के साथ 70,528 पर बंद हुआ, जो अब तक की सबसे अच्छी क्लोजिंग है। वहीं, निफ्टी 1.26 फीसदी बढ़कर 21,190 पर बंद हुआ जो इस 50-पैक इंडेक्स के लिए एक और रिकॉर्ड हाई है।

उम्मीद है कि यूएस फेड मार्च 2024 की शुरुआत में दरों में कटौती शुरू कर देगा। बाजार जानकारों का कहना है कि भारतीय रिजर्व बैंक भी जल्द ही यूएस फेड के नक्शे कदम पर चलता दिखेगा।

फेड के नरम रुख से भारतीय इक्विटी मार्केट में विदेशी निवेश में तेजी आने की उम्मीद है। फेड का ये फैसला भारतीय बाजारों के नजरिए से बहुत सही समय पर आया है। बड़ी संख्या में आए आईपीओ और प्रमोटरों की तरफ शेयर बिक्री के कारण बाजार को नकदी की कमी का सामना करना पड़ रहा है। ऐसे में विदेशी निवेशकों की तरफ से आने वाले निवेश से बाजार को अच्छा सपोर्ट मिलेगा।


हाल के राज्य चुनावों में भाजपा के मजबूत प्रदर्शन से उत्साहित होकर दिसंबर में अब तक विदेशी फंडों ने शुद्ध रूप से 16,923 करोड़ रुपये के शेयर खरीदे हैं। ब्याज दरों में गिरावट की संभावनाएं भारत की स्थिति को और मजबूत करती हैं, जो अपने मजबूत फंडामेंटल्स के कारण पहले से ही ग्लोबल निवेशकों के लिए सबसे पसंदीदा निवेश डेस्टिनेशन रहा है।

मार्सेलस के संस्थापक सौरभ मुखर्जी ने मनीकंट्रोल से हुए बातचीत में कहा कि उन्हें नहीं लगता कि विदेशी निवेशक दरें कम होने का इंतजार करेंगे। अब फेड ने अपना संकेत दे दिया है, भारत में मजबूत आर्थिक विकास हो रहा है और राजनीतिक स्पष्टता भी है। ऐसे में भारत में जोरदार विदेशी निवेश आता दिखेगा। उनका मानना है कि अब लार्जकैप शेयर बेहतर प्रदर्शन करेंगे और स्मॉल और मिडकैप में मध्यम रिटर्न मिलेगा।

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IT शेयरों में जोश

14 दिसंबर को आईटी शेयरों का प्रदर्शन शानदार रहा। निफ्टी आईटी इंडेक्स इस उम्मीद में 3.5 फीसदी उछल गया कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था मंदी से बचने में कामयाब रही है और ऑफशोरिंग ऑर्डर फिर से शुरू हो सकते हैं।

बाजार जानकारों की सलाह कि बाजार काफी भाग चुका है ऐसे में निवेशकों को अब उन आईटी शेयरों पर फोकस करना चाहिए जिनका वैल्यूएशन अच्छा नजर आ रहा है। ऐसा लगाता कि आईटी सेक्टर तेजी पकड़ सकता क्योंकि अधिकांश फंड मैनेजर अभी भी इस सेक्टर पर अंडरवेट हैं। लेकिन हर कोई को ऐसा नहीं लगता। जियोस्फीयर के अरविंद सेंगर का कहना है कि उनको आईटी में किसी बड़ी रैली की उम्मीद नहीं नजर आ रही है।

तमाम फंड मैनेजर बैंकिंग शेयरों को लेकर बुलिश

कैपेक्स में बढ़ोतरी के कारण तमाम फंड मैनेजर बैंकिंग शेयरों को लेकर बुलिश दिख रहे हैं। उनका मनना है कि कैपेक्स में बढ़ोतरी से बैंकों के कॉर्पोरेट लोनबुक में मजबूती आएगी।

लेकिन बाजार में कुछ जोखिम भी हैं जिन्हें नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। मोतीलाल ओसवाल फाइनेंशियल सर्विसेज के रामदेव अग्रवाल ने CNBCTV18 से हुई बातचीत में कहा "हम एक बुल मार्केट में हैं जिसका अंत आमतौर पर बुरा ही होता है।"

कई बाजार जानकारों का कहना है कि म्यूचुअल फंड स्कीमों द्वारा स्मॉल और मिडकैप में अंधाधुंध निवेश के कारण छोटे-मझोले शेयर में झाग बन गया है। यह बुलबुला कभी भी फूट सकता है।

ये ट्रेंड स्मॉलकैप तक ही सीमित नहीं है। कोटक सिक्योरिटीज की एक हालिया रिपोर्ट में बताया गया है कि विस्तार योजनाओं के कारण नकदी प्रवाह में कमी को ध्यान में न रखकर बाजार केमिकल और कंस्ट्रक्शन जैसे कुछ सेक्टरों को ज्यादा महत्व दे रहा है।

ग्रामीण भारत में लगातार बनी कमजोरी सरकार को कुछ बड़ी कल्याणकारी की घोषणाएं करने के लिए प्रेरित कर सकती है, जिसे अक्सर बाजार के लिए अच्छा नहीं माना जाता। इसके अलावा यह चिंता भी हमेशा बनी रहती है कि सरकार बजट में लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन टैक्स में कटौती करेगी की नहीं। यह देखना भी बाकी है कि संस्थागत निवेशक चुनाव से ठीक पहले आक्रामक तरीके से निवेश करने में सहज महसूस करेंगे या नहीं।

 

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