क्रूड ऑयल की ऊंची कीमतें करेंट अकाउंट डेफिसिट, इनफ्लेशन, ग्रोथ सहित हर चीज पर असर डालेगी : निलेश शाह

निलेश शाह ने कहा कि इंडिया आज क्रूड की बढ़ती कीमतों से निपटने के लिहाज से बेहतर स्थिति में है। लेकिन, क्रूड ऑयल की कीमतों का 100 डॉलर प्रति बैरल से नीचे बने रहना जरूरी है। उन्होंने यह माना कि मध्य-पूर्व के घटनाक्रम की वजह से क्रूड का प्राइस क्रूड की कीमतों में उछाल जारी रह सकता है

अपडेटेड Oct 09, 2023 पर 3:35 PM
शाह ने कहा कि इजरायल और हमास के बीच लड़ाई जल्द काबू में नहीं आती है तो ऑयल की कीमतें बेकाबू हो सकती हैं। ऐसा होने पर इकोनॉमी से जुड़ी हर चीज पर असर पड़ेगा। क्रूड ऑयल की कीमतें पहले से ही हाई चल रही हैं।

दुनियाभर की नजरें इजरायल-हमास लड़ाई (Israel-Hamas Conflict) पर लगी हैं। स्टॉक मार्केट में निवेश करने वाले लोगों के मन में कई सवाल चल रहे हैं। अगर यह लड़ाई बढ़ती है तो इसका इंडिया खासकर इंडियन स्टॉक मार्केट्स पर क्या असर पड़ेगा? क्या इस लड़ाई से इंडियन इकोनॉमी को नुकसान हो सकता है? क्रूड ऑयल की बढ़ती कीमतें क्या इंडिया के लिए मुसीबत पैदा कर सकती हैं? मनीकंट्रोल ने इन सवालों के जवाब जानने के लिए कोटक एएमसी के हेड निलेश शाह से बातचीत की। शाह को इनवेस्टमेंट और फाइनेंस की दुनिया का कई दशकों का अनुभव है। उन्होंने इस पूरे मामले पर खुलकर बातचीत की। उन्होंने कहा कि इंडिया आज क्रूड की बढ़ती कीमतों से निपटने के लिहाज से बेहतर स्थिति में है। लेकिन, क्रूड ऑयल की कीमतों का 100 डॉलर प्रति बैरल से नीचे बने रहना जरूरी है। उन्होंने यह माना कि मध्य-पूर्व के घटनाक्रम की वजह से क्रूड का प्राइस क्रूड की कीमतों में उछाल जारी रह सकता है।

इकोनॉमी से जुड़ी हर चीज पर महंगे क्रूड का असर पड़ेगा

शाह ने कहा कि इजरायल और हमास के बीच लड़ाई जल्द काबू में नहीं आती है तो ऑयल की कीमतें बेकाबू हो सकती हैं। ऐसा होने पर इकोनॉमी से जुड़ी हर चीज पर असर पड़ेगा। क्रूड ऑयल की कीमतें पहले से ही हाई चल रही हैं। हाई क्रूड ऑयल प्राइस करेंट अकाउंट डेफिसिट, इनफ्लेशन, ग्रोथ सहित हर चीज पर असर डालेगा। बात सिर्फ प्राइस की नहीं है, सबसे हम क्रूड की सप्लाई है। अगर क्रूड ऑयल की सप्लाई में बड़ी रुकावट आती है तो हम मुश्किल में फंस जाएंगे। अगर इन चीजों को हटा दिया जाए तो इंडिया में चीजें अच्छी दिख रही हैं। कंपनियों की कमाई में हर महीने एक से सवा फीसदी की ग्रोथ है। इसका मतलब है कि अगर छह महीने तक बाजार के सूचकांकों में ज्यादा बदलाव नहीं आता है तो हमारा मार्केट 7-8 फीसदी तक सस्ता हो जाएगा। लेकिन, जियोपॉलिटिकल घटनाक्रम का असर इंडिया पर पड़ सकता है। यहां से चीजें बिगड़ सकती हैं। ऑयल की कीमतें ट्रिपल डिजिट्स में जा सकती हैं।


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शेयरों में निवेश को एक नजरिए से नहीं देखा जा सकता

इंडियन स्टॉक्स में निवेश के बारे में उन्होंने कहा कि पूरे इनवेस्टमेंट को एक तरह से नहीं देखा जा सकता। कुछ इनवेस्टमेंट मैच्योर और स्मार्ट हैं। कुछ का मकसद सिर्फ मौके का फायदा उठाना है। उदाहरण के लिए मिडकैप और स्मॉलकैप में हो रहा निवेश मोमेंटम आधारित है। लेकिन, मैच्योर इनवेस्टमेंट हर गिरावट का इस्तेमाल मार्केट में एंट्री के लिए करेगा। न तो अमेरिकी इंटरेस्ट रेट्स और ऑयल की कीमतें लंबे समय तक हाई लेवल पर रह सकती हैं। इस बार तेल की ऊंची कीमतों की वजह सिर्फ मांग नहीं है। इसकी वजह कार्टेलाइजेशन है। सवाल है कि अमेरिकी में चुनाव से पहले क्या ऑयल की कीमतों को काबू में करने के लिए राजनीतिक दबाव देखने को नहीं मिलेगा? ऑयल की कीमतें लंबे समय तक हाई रहने पर इसके विकल्प की तलाश तेज हो जाती है।

आज महंगे क्रूड से निपटने में मजबूत स्थिति में इंडिया 

महंगे क्रूड से निपटने के उपायों के बारे में शाह ने कहा कि ऐसी स्थिति से निपटने की हमारी क्षमता पहले के मुकाबले बढ़ गई है। 2008 में रुस और ब्राजील के मुकाबले हमारी जीडीपी एक-तिहाई थी। जब तेल की कीमतें बढ़ती थीं, तब हमारी मुश्किल बढ़ जाती थी। अब हम ब्राजील और रूस की जीडीपी के बराबर हो गए हैं। हाई प्राइस से निपटने की हमारी ताकत बढ़ गई है।

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