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Promotor's Stake Sale Good or Bad: प्रमोटर्स की घट रही हिस्सेदारी, ऐसे स्टॉक में पैसे लगाने चाहिए या नहीं?

Promotor's Stake Sale Good or Bad: इस साल 2024 के पहले छह महीनों में 37 कंपनियों के प्रमोटर्स ने 10.5 अरब डॉलर (लगभग 87,400 करोड़ रुपये) के शेयर बेचे। कोटक इंस्टीट्यूशनल इक्विटीज की रिपोर्ट के मुताबिक पांच साल में सबसे बड़ी बिकवाली है। अब सवाल उठता है कि प्रमोटर्स की हिस्सेदारी कम होने वाले स्टॉक में पैसे लगाने चाहिए या नहीं?

Edited By: Moneycontrol Newsअपडेटेड Oct 23, 2024 पर 4:17 PM
Promotor's Stake Sale Good or Bad: प्रमोटर्स की घट रही हिस्सेदारी, ऐसे स्टॉक में पैसे लगाने चाहिए या नहीं?
इस साल 2024 के पहले छह महीनों में 37 कंपनियों के प्रमोटर्स ने 10.5 अरब डॉलर (लगभग 87,400 करोड़ रुपये) के शेयर बेचे।

Promotor's Stake Sale Good or Bad: देश के बड़े-बड़े उद्योगपतियों ने पिछले कुछ वर्षों में शेयर बाजार में तेजी का फायदा उठाया। उन्होंने कंपनियों में अपनी हिस्सेदारी कम की है। आमतौर पर ऐसा माना जाता है कि यह मार्केट के हाई लेवल पर पहुंचने का संकेत है और निवेशकों को इससे घबराहट भी होती है। हालांकि एडलवाइज ग्रुप के को-फाउंडर राशेश शाह (Rashesh Shah) का मानना है कि प्रमोटर अपनी हिस्सेदारी हल्की कर रहे हैं तो यह एक फायदेमंद बदलाव है। उन्होंने ये बातें मनीकंट्रोल के 'मार्केट्स की धड़कन' में कही। उन्होंने कहा कि भारतीय कंपनियों में प्रमोटर की हिस्सेदारी वैश्विक औसत की तुलना में अधिक है जिसे घटाना इंस्टीट्यूशनल ओनरशिप और गवर्नेंस को बढ़ावा देने के लिए फायदेमंद है। उनका मानना है कि अगर सभी कंपनियों के प्रमोटर्स 80 प्रतिशत या 75 प्रतिशत के मालिक होते, तो मैं निवेशकों की भागीदारी इतनी व्यापक न होती।

प्रमोटर की बिकवाली किस लिहाज से है अच्छी?

कंपनियों के शेयरहोल्डिंग पैटर्न में यह बदलाव ऐसे समय में हो रहा है, जब अधिक से अधिक लोग म्यूचुअल फंड्स के जरिए स्टॉक्स में पैसे लगा रहे हैं। उन्होंने इंफोसिस और एचडीएफसी बैंक का उदाहरण दिया जिसमें पहले प्रमोटर्स की होल्डिंग थी लेकिन अब प्रमोटर्स की होल्डिंग जीरो हो गई है। अपनी बात के समर्थन में और तर्क रखते हुए उन्होंने कहा कि जैसे-जैसे कंपनियां विस्तार करती हैं और बाजार बढ़ते हैं तो स्वामित्व का कुछ वितरण आवश्यक हो जाता है, जिससे इंस्टीट्यूशनलाइजेशन और मजबूत गवर्नेंस को बढ़ावा देता है। शाह के मुताबिक जब किसी कंपनी में रिटेल और इंस्टीट्यूशनल इनवेस्टर्स चलाते हैं तो उनकी उम्र बढ़ जाती है और प्रमोटर्स पर निर्भरता कम हो जाती है। कुल मिलाकर शाह का मानना है कि प्रमोटर्स हिस्सेदारी कम कर रहे हैं तो इससे कंपनी लॉन्ग टर्म तक के लिए अच्छा ग्रोथ करती है और इसमें निवेशक डाईवर्सिफाई होते हैं तो शेयरों का परफॉरमेंस भी अच्छा होता है।

क्या कहतें हैं आंकड़े? कितने शेयर बेचे प्रमोटर्स ने?

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