अब सवाल ये है कि फ्रंट रनिंग कैसे काम करता है और क्या ये इनसाइडर ट्रेडिंग से अलग है? क्वांट म्यूचुअल फंड में जिस फ्रंट रनिंग केस का पता चला है उसका असर कितना पड़ा है। इस स्कैम का छोटे निवेशकों पर क्या असर होगा? और एक बड़ा सवाल ये भी है कि आखिर सेबी इस मामले से कैसे निपट रही है?
तो आइए सबसे पहले जानते हैं कि Front-Running काम कैसे करता है?
म्यूचुअल फंड, डीलर्स जैसे मीडिएटर्स के जरिए शेयरों की खरीद-बिक्री करते हैं। क्योंकि ये डील मीडिएटर्स के जरिए ही होता है तो उन्हें इसका पता पहले ही चल जाता है और वो इसका फायदा कुछ इस तरह उठा सकते हैं।
जब कोई म्यूचुअल फंड या ऐसा ही कोई बड़ा इंस्टीट्यूशनल इनवेस्टर शेयर मार्केट से किसी स्टॉक को खरीदने वाला होता है तो इंटरमीडियरीज कुछ मिनट पहले ही वो शेयर खरीद लेते हैं। कुछ मिनट बाद जैसे ही म्यूचुअल फंड शेयर खरीदते हैं तो भाव तेजी से ऊपर जाते हैं। जैसे ही शेयरों के दाम भागते हैं इंटरमीडियरीज शेयर बेचकर मुनाफा कमा लेते हैं।
वहीं अगर म्यूचुअल फंड शेयर बेचने वाले होते हैं तो इंटरमीडियरीज उनके ऑर्डर से कुछ मिनट पहले खुद शॉर्ट सेल कर देते हैं। खास बात ये है कि इंटरमीडियरीज ये ट्रेड्स अपने खुद के अकाउंट्स से नहीं करते हैं बल्कि एसोसिएट्स के अकाउंट्स के जरिए करते हैं।
अब जान लेते हैं कि फ्रंट रनिंग Insider Trading से कैसे अलग है?
फ्रंट-रनिंग और इनसाइडर ट्रेडिंग दोनों ही गैरकानूनी है। चूंकि दोनों में अंदरूनी जानकारी का इस्तेमाल कर मुनाफा कमाया जाता है तो एक तरह से दोनों एक ही जैसे लग रहे हैं लेकिन ऐसा है नहीं। दोनों का नेचर अलग है और जिस तरह से अंदरूनी जानकारियां का इस्तेमाल किया जाता है, वो भी अलग है।
इनसाइडर ट्रेडिंग में कंपनी की अर्निंग्स रिपोर्ट्स, मर्जर-एक्विजिशन, इंपॉर्टेंट कारोबारी डिवलपमेंट या किसी कॉरपोरेट इवेंट के सार्वजनिक खुलासे की जानकारी से पहले अंदरूनी तौर पर पता चल जाता है। और उसके हिसाब से शेयरों की खरीद-बिक्री की जाती है। जब इसका सार्वजनिक तौर पर खुलासा होता है तो शेयरों की चाल के हिसाब से मुनाफा कमाया जाता है। वहीं दूसरी तरफ फ्रंट-रनिंग में शेयरों की खरीद-बिक्री से जुड़ी जानकारी के हिसाब मुनाफा कमाया जाता है। ये दोनों ही गैरकानूनी हैं।
फिलहाल सबके मन में यही सवाल है कि फ्रंट-रनिंग का छोटे निवेशकों पर क्या असर होता है? इसमें कोई दोराय नहीं है कि फ्रंट-रनिंग का निवेशकों पर निगेटिव असर पड़ता है। जैसे कि जब इंटरमीडियरीज ऐसे ऑर्डर्स करते हैं तो शेयरों की चाल सामान्य से अलग हो जाती है जिससे निवेशकों को घाटा होता है।
इसे ऐसे समझिए, अगर म्यूचुअल फंड बड़ी संख्या में कोई शेयर खरीदने वाला है और इंटरमीडियरीज उनकी खरीदारी से पहले बड़ी संख्या में खुद ढेर सारे शेयर खरीद लेते हैं तो इससे म्यूचुअल फंड्स को महंगे भाव पर शेयर मिलता है जिससे रिटर्न घटने की आशंका बन जाती है। इस प्रकार अगर म्यूचुअल फंडों की बिकवाली के समय भी कम भाव पर शेयर बेचना पड़ जाता है तो रिटर्न घट जाता है।
अब अगर म्यूचुअल फंड्स फ्रंट-रनिंग में शामिल होते हैं तो उन पर पेनाल्टी सहित कई दूसरी पाबंदियां भी लगती हैं। इतना ही नहीं उनकी क्रेडिबिलिटी को भी झटका लग सकता है जिसकी वजह से निवेशक उस फंड हाउस से दूर रह सकते हैं। इसका सीधा असर फंड हाउस की वित्तीय सेहत पर पड़ेगा। क्वांट म्यूचुअल फंड से पहले भी फ्रंट-रनिंग के जो मामले सामने आए थे, उसके बाद म्यूचुअल फंड हाउस को निवेश में सुस्ती और स्कीमों के अंडरपरफॉरमेंस से जूझना पड़ा था।
फ्रंट-रनिंग के मामलों से निपटने के लिए सेबी आमतौर पर डीलर्स, फंड मैनेजर्स और आउटसाउड ब्रोकर्स पर जुर्माना लगाता है। पिछले साल सेबी ने एक्सिस म्यूचुअल फंड के फ्रंट-रनिंग केस में शामिल वीरेश जोशी सहित 21 लोगों के शेयरों की खरीद-बिक्री करने पर रोक लगा दी थी। इसके अलावा इन्होंने गलत तरीके से जो पैसे कमाए थे, उस पर 30.55 करोड़ रुपये का जुर्माना भी लगाया गया था।
फ्रंट-रनिंग के मामले बढ़ने लगे तो सेबी ने हाल ही में सभी डीलर्स और फंड मैनेजर्स की आपस में हुई बातचीत को रिकॉर्ड करने और जाहिर को करने को अनिवार्य बना दिया है। सेबी ने अप्रैल में फंड हाउसों या एसेट मैनेजमेंट कंपनीज (AMCs) को ऐसा मैकेनिज्म बनाने को कहा है जिसमें फ्रंट-रनिंग जैसी मार्केट विरोधी एक्विविटीज को पकड़ा जा सके। इस नए मैकेनिज्म के तहत फ्रंट-रनिंग, इनसाइडर ट्रेडिंग और संवेदनशील जानकारियों के गलत इस्तेमाल पर निगरानी को बढ़ा दिया गया। सेबी ने एसोसिएशन ऑफ म्यूचुअल फंड्स इन इंडिया यानी एम्फी को भी इस प्रकार के इंस्टीट्यूशनल मैकेनिज्म को लेकर डिटेल पैरामीटर तैयार करने को कहा है।