2 कमरों से खड़ी की 3.5 लाख वर्किंग लोगों की कंपनी और 16000 करोड़ का साम्राज्य! RK सिन्हा ने कैसे बनाई थी SIS?
SIS के संस्थापक और BJP के पूर्व राज्यसभा सांसद आरके सिन्हा का शुक्रवार को दिल्ली में निधन हो गया। पटना में ₹250 महीने की पत्रकारिता की नौकरी से शुरुआत करने वाले सिन्हा ने 1974 में SIS शुरू की, जो आज करीब ₹16,000 करोड़ के कंसॉलिडेटेड रेवेन्यू वाली लिस्टेड कंपनी है।
SIS के संस्थापक और BJP के पूर्व राज्यसभा सांसद आरके सिन्हा का शुक्रवार को दिल्ली में निधन हो गया।
BJP के पूर्व राज्यसभा सांसद और सिक्योरिटी कंपनी SIS के संस्थापक आरके सिन्हा का शुक्रवार को निधन हो गया। उन्होंने दिल्ली स्थित अपने आवास पर अंतिम सांस ली। वो लंबे समय से बीमार थे और उन्हें ब्रेन स्ट्रोक भी हुआ था। उनके निधन से राजनीतिक और कारोबारी जगत में शोक की लहर है। आरके सिन्हा की कहानी एक ऐसे इंसान की कहानी है, जिसने पटना में ₹250 महीने की नौकरी से शुरुआत की और एक घर के 2 कमरों से ऐसी कंपनी खड़ी कर दी, जिसका कंसॉलिडेटेड रेवेन्यू आज करीब ₹16,000 करोड़ है। आइए समझते हैं कि बिहार के एक छोटे से गांव से निकले इस लड़के ने इतनी बड़ी कंपनी कैसे बनाई।
कौन थे आरके सिन्हा?
आरके सिन्हा का पूरा नाम रविंद्र किशोर सिन्हा था। उनका जन्म बिहार के भोजपुर जिले के बहियारा गांव में हुआ था। कारोबार में आने से पहले उन्होंने पटना में पत्रकार के तौर पर अपने करियर की शुरुआत की थी। उस वक्त उनकी तनख्वाह करीब ₹250 महीना थी।
5 दशक से ज्यादा वक्त बाद, जिस कंपनी की नींव उन्होंने रखी, वो आज एक लिस्टेड कारोबार बन चुकी है। ये कंपनी है Security and Intelligence Services, जिसे लोग SIS के नाम से जानते हैं।
जयप्रकाश नारायण की सलाह से शुरू हुई SIS
आरके सिन्हा ने 1974 में पटना में SIS की स्थापना की। इस कंपनी का आइडिया समाजवादी नेता जयप्रकाश नारायण की एक सलाह से निकला था। जयप्रकाश नारायण ने सिन्हा को प्रोत्साहित किया कि वो सेना से रिटायर हुए लोगों को सिक्योरिटी गार्ड के तौर पर रोजगार दिलाने में मदद करें।
सिन्हा ने बाद में याद किया था कि शुरुआत में वो इस काम को एक कारोबार की शुरुआत नहीं, बल्कि समाज सेवा मानते थे। ये सोच तब बदली, जब संगठन बढ़ने लगा और उसने ट्रेनिंग, टेक्नोलॉजी और काम करने के तय तरीकों के इर्द-गिर्द अपने सिस्टम बनाने शुरू किए।
पटना का 94, पाटलिपुत्र: घर भी, दफ्तर भी
अपने शुरुआती सालों में SIS का पता था 94, पाटलिपुत्र, पटना। कागजों पर ये रविंद्र किशोर का घर था, लेकिन असल में यही उनका दफ्तर भी था। पहली मंजिल पर वो अपने परिवार के साथ रहते थे, जिसमें उनके माता-पिता भी थे। नीचे के 2 कमरे SIS का दफ्तर बन गए। जब लोग ज्यादा हो जाते और कमरों में जगह कम पड़ती, तो बरामदा दफ्तर का हिस्सा बन जाता। घर के पीछे एक गैराज था, जिसमें आगे चलकर उन डॉग्स का केनेल बना, जिन्हें ट्रेनिंग देकर ग्राहकों की साइट पर तैनात किया जाता था।
रविवार को घर का लॉन बन जाता था भर्ती केंद्र
हर रविवार 94, पाटलिपुत्र एक भर्ती केंद्र में बदल जाता था। घर के लॉन में नौकरी की उम्मीद लिए नौजवानों की लगातार भीड़ लगी रहती थी। वो अपने फॉर्म भरते और यूएन सिंह के निर्देश का इंतजार करते। यूएन सिंह रविंद्र किशोर की ओर से सबसे पहले रखे गए लोगों में से एक थे।
उनके कहने पर नौजवान लाइन में खड़े होते और उनकी लंबाई और वजन नापा जाता। हर उम्मीदवार की लंबाई कम से कम 5 फुट 7 इंच होनी चाहिए थी और वजन ज्यादा से ज्यादा 70 किलो। इसके बाद फिजिकल टेस्ट होता था। ये राउंड पार करने वाले उम्मीदवार को नीचे के 2 कमरों में से एक में इंटरव्यू के लिए बुलाया जाता।
इंटरव्यू पैनल की अगुवाई खुद रविंद्र किशोर करते थे। उनके साथ सेना के रिटायर्ड जनरल, सीनियर ब्यूरोक्रेट और पुलिस अफसर बैठते थे। चुने जाने पर उम्मीदवार को एक किट मिलती, जिसमें उसकी वर्दी होती थी। उसे 1 महीने की ट्रेनिंग के लिए रिपोर्ट करना होता और फिर किसी ग्राहक की साइट पर तैनात कर दिया जाता। SIS के आज के कई सबसे सीनियर अधिकारियों ने अपने करियर की शुरुआत इसी लॉन से की।
बिहार फाउंड्री बना SIS का पहला बड़ा ग्राहक
जब परिवार घर का मोर्चा संभाल रहा था, रविंद्र किशोर कारोबार पर ध्यान दे रहे थे। सिक्योरिटी के कारोबार से उन्होंने उद्यमी बनने की छलांग लगाई थी, और इसे बढ़ाने के लिए जितनी बार हो सके, धक्का देने की जरूरत थी। शुरुआती सालों में हरि बुधिया की बिहार फाउंड्री SIS का सबसे बड़ा ग्राहक रही। 1970 के दशक में जैसे-जैसे बिहार का औद्योगिक नक्शा बदल रहा था, ये ग्राहक रविंद्र किशोर के लिए खुद सीखने का मैदान बन गया। बदलते माहौल ने SIS जैसे स्टार्टअप के लिए नए मौके भी पैदा किए।
उस वक्त का बिहार विरोधाभासों से भरा राज्य था। कुदरत ने इसे दिल खोलकर दिया था। यहां कोयला, लौह अयस्क, बॉक्साइट, चूना पत्थर और कई दूसरे खनिज थे। इनमें से कई खनिज वाले इलाके अब झारखंड का हिस्सा हैं, जो 2000 में बिहार से अलग होकर बना। यही खनिज संपदा Tata Group के संस्थापक जमशेदजी टाटा को लौह अयस्क की तलाश में बिहार खींच लाई थी।
यहां उन्होंने Tata Iron and Steel Company यानी TISCO की स्थापना की, जिसे आज Tata Steel के नाम से जाना जाता है। ये 1907 की बात है। कंपनी का मुख्यालय जमशेदपुर पूरे भारत के पहले औद्योगिक केंद्रों में से एक बना। ये शहर एक आधुनिक प्लान्ड शहर की मिसाल भी है, जहां देश के इस हिस्से के ज्यादातर शहरों से बेहतर नागरिक सुविधाएं हैं।
इतनी खनिज संपदा को देखते हुए 1970 के दशक के आखिर तक बिहार में कई जमशेदपुर होने चाहिए थे। ये भी सच है कि राज्य ने हरि बुधिया जैसे लोगों को आकर्षित किया। रामगढ़ के इलाके में कोयले के बड़े भंडार थे, जो लौह अयस्क के साथ स्टील बनाने की 2 सबसे जरूरी चीजों में से एक है। रामगढ़ के औद्योगिक इलाके में बिहार फाउंड्री जैसी कई कंपनियां खड़ी हुईं। इसी तरह बुधिया जैसे उद्यमियों ने इलाके के चूना पत्थर के भंडार का फायदा उठाने के लिए सीमेंट कंपनियां भी लगाईं।
फैक्ट्री मालिकों की सबसे बड़ी परेशानी बनी मौका
इन कंपनियों के सामने एक बड़ी समस्या थी, मजदूरों से जुड़ी परेशानी। Tata Steel में मैनेजमेंट और लेबर यूनियन के बीच टकराव का लंबा इतिहास रहा था। बुधिया को भी बिहार फाउंड्री में ऐसी ही दिक्कत झेलनी पड़ी। ऐसी किसी फैक्ट्री में तरह-तरह का कच्चा माल और तैयार माल आता-जाता था। कुछ खदानों से आता, कुछ ग्राहकों के पास भेजा जाता। ये सब ट्रकों में परिसर के अंदर-बाहर होता था। इस पूरी आवाजाही के लगभग हर हिस्से में सुरक्षा की जरूरत थी, चाहे वो खदान हो, गेट हो या वो जगह जहां माल की लोडिंग और अनलोडिंग होती थी।
इन औद्योगिक इकाइयों में सैकड़ों या हजारों मजदूर काम करते थे, जिनमें ज्यादातर कॉन्ट्रैक्ट पर थे। उस दौर में न सिक्योरिटी कैमरे थे, न ड्रोन, इसलिए इतने लोगों और उनकी आवाजाही पर नजर रखना मुश्किल काम था। यूनियनें इसे और मुश्किल बना देती थीं। सभी लेबर यूनियनों को एक ही तराजू में तौलना ठीक नहीं होगा, लेकिन उस दौर में यूनियनों का स्थानीय माफिया से रिश्ता बन जाना या उन्हें राजनीतिक संरक्षण मिलना कोई अनोखी बात नहीं थी।
जब चोरी के मामले सामने आते, तो कंपनी मालिक और मैनेजमेंट सीधे दखल देने से हिचकते थे। उन्हें डर रहता था कि यूनियन कहीं औद्योगिक अशांति न खड़ी कर दे, जिसका असर कामकाज पर चोरी से भी बुरा होता। बुधिया जैसे मालिक लोगों और माल की आवाजाही पर नजर रखने के लिए अपने सुरक्षाकर्मियों पर निर्भर थे, और साथ ही यूनियनों पर नजर रखने के लिए भी।
उस वक्त सुरक्षा का मतलब था चौकीदार और दरबान। इन्हें न के बराबर ट्रेनिंग मिलती थी, इसलिए ये अपने काम की जरूरतें ही नहीं समझते थे। इससे भी बुरी बात ये थी कि इनमें से कई ठीक से पढ़-लिख नहीं पाते थे, जबकि गेट पर आने-जाने के दस्तावेज जांचने के लिए ये जरूरी था। क्या इन्हें काम की शारीरिक चुनौतियों के लिए तैयार किया जाता था, जिसमें गलत लोगों से भिड़ना भी शामिल था। ऐसा कम ही होता था। और कई मामलों में तो यही सुरक्षाकर्मी यूनियनों से हाथ मिला लेते थे, जिससे यूनियन और उनके नेता और ताकतवर हो जाते थे।
कोई राहत न मिलने पर कारोबारी उन नेताओं के पास जाते, जिनकी यूनियनों और स्थानीय पुलिस पर पकड़ थी। जो लोग मदद के लिए जयप्रकाश नारायण के पास पहुंचते, उन्हें रविंद्र किशोर के पास भेज दिया जाता। SIS के जरिए रविंद्र किशोर के पास सिक्योरिटी मैनपावर कारोबार का तरीका बदलने का मौका था। बुधिया की परेशानियां सुनकर रविंद्र किशोर ने समझ लिया कि जरूरत किस चीज की है। जरूरत थी ऐसे निडर और ईमानदार सुरक्षाकर्मियों की, जो पढ़-लिख सकें, शारीरिक रूप से फिट हों और जिन्हें ग्राहक की जरूरतें समझने और पूरी करने की ट्रेनिंग मिली हो।
पूर्व फौजियों में मिला हर सवाल का जवाब
रविंद्र किशोर को इस समस्या का हल उन्हीं संसाधनों में मिला, जो उनके पास मौजूद थे, यानी सेना से रिटायर हुए अफसर और जवान। ये पूर्व सैनिक ही ऐसे लोग थे, जिन्होंने वर्दी वाली जिंदगी जी थी और जिनका काम का अनुभव सुरक्षा के इर्द-गिर्द घूमता था। पूर्व सैनिकों की तरह रविंद्र किशोर ने रिटायर्ड पुलिस अफसरों और ब्यूरोक्रेट्स को भी साथ जोड़ा।
रिटायर्ड पुलिस अफसरों ने भी फौजियों की तरह वर्दी वाली जिंदगी जी थी और सुरक्षा देना उनकी खासियत थी। वो ट्रेनिंग को अच्छी तरह अपनाते थे और भर्ती का काम भी समझते थे। इन पुलिस अफसरों में, ब्यूरोक्रेट्स की तरह, एक और खूबी थी। स्थानीय प्रशासन और पुलिस व सरकारी विभागों में अपने पुराने साथियों के बीच उनकी पकड़ थी।
ब्यूरोक्रेट्स, सेना और पुलिस के अफसर अपने साथ सालों का प्रशासनिक अनुभव भी लाए थे। ब्रिगेडियर, सरकारी विभागों के प्रमुख या किसी शहर के सुपरिंटेंडेंट के तौर पर इन लोगों ने लोगों, बजट और दफ्तरों को संभाला था। उन्हें पता था कि चीजें कैसे चलती हैं।
एक युवा उद्यमी के तौर पर रविंद्र किशोर ने इन्हीं से सिस्टम की अहमियत समझी। SIS के पहले सिस्टम और प्रक्रियाएं भी इन्हीं लोगों ने बनाईं। बहुत जल्द रविंद्र किशोर को इसमें महारत हासिल हो गई। अगर कोई नया तरीका सुझाता, तो वो फौरन समझ जाते कि वो काम करेगा या नहीं। अगर करता, तो उसे SIS में लागू करने में भी उतनी ही तेजी दिखाते।
ट्रेनिंग और टेक्नोलॉजी पर शुरुआती दांव
सिन्हा के शुरुआती फैसलों में से एक था ट्रेनिंग में निवेश करना। ये वो वक्त था, जब भारत में प्राइवेट सिक्योरिटी इंडस्ट्री काफी हद तक बिखरी हुई थी। SIS ने 1984 में सिक्योरिटी गार्ड ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट शुरू किया और फिर 1986 में अपना ग्रेजुएट ट्रेनी ऑफिसर प्रोग्राम लॉन्च किया। जैसे-जैसे कामकाज बढ़ा, कंपनी ने धीरे-धीरे अपना ट्रेनिंग ढांचा भी बढ़ाया।
टेक्नोलॉजी भी एक ऐसा क्षेत्र था, जिसमें SIS ने काफी पहले निवेश किया। 1989 में कंपनी ने संगठन की प्रक्रियाओं को संभालने के लिए कंप्यूटर का इस्तेमाल शुरू किया। वक्त के साथ टेक्नोलॉजी कंपनी के कामकाज में गहराई तक उतर गई, जिसमें पेरोल, वर्कफोर्स मैनेजमेंट और सुरक्षा से जुड़ी प्रक्रियाएं शामिल हैं। कंपनी ने तब से अपनी इन-हाउस टेक्नोलॉजी टीम बनाई है और हाजिरी, कर्मचारियों की तैनाती, ट्रैकिंग और घटनाओं के मैनेजमेंट जैसे कामों में डिजिटल सिस्टम का इस्तेमाल करती है।
पूर्वी भारत से ऑस्ट्रेलिया तक का विस्तार
SIS का अगला पड़ाव था पूर्वी भारत के अपने मूल बाजारों से बाहर निकलना। कंपनी 1990 के दशक में उत्तर भारत में पहुंची और फिर दक्षिण और पश्चिम के बाजारों में फैली। 1991 के आर्थिक सुधारों के बाद जब भारत की अर्थव्यवस्था खुली, तो संगठित कारोबार, दफ्तर, फैक्ट्रियां और दूसरे कमर्शियल ठिकाने तेजी से बढ़े। इसने प्राइवेट सिक्योरिटी और फैसिलिटी मैनेजमेंट सेवाओं के लिए एक बड़ा बाजार तैयार कर दिया।
SIS ने गार्डिंग से आगे भी कदम बढ़ाए। 2006 में कंपनी ने कैश लॉजिस्टिक्स और 2009 में फैसिलिटी मैनेजमेंट में एंट्री की। इस तरह धीरे-धीरे एक बड़ा बिजनेस सर्विसेज प्लेटफॉर्म खड़ा हो गया। विदेश में कंपनी का सफर 2008 में ऑस्ट्रेलिया से शुरू हुआ, जब SIS ने Chubb Security का ऑस्ट्रेलियाई कारोबार खरीदा। बाद में कंपनी न्यूजीलैंड और सिंगापुर तक पहुंची।
बेटे रितुराज की एंट्री से लेकर शेयर बाजार में लिस्टिंग तक
SIS के इतिहास में एक और अहम मोड़ 2000 के दशक की शुरुआत में आया, जब सिन्हा ने कंपनी का लीडरशिप ढांचा बदला। उनके बेटे रितुराज किशोर सिन्हा 2002 में 22 साल की उम्र में कारोबार से जुड़े। अगले एक दशक में SIS ने तेजी से विस्तार किया। कंपनी के रिकॉर्ड के मुताबिक 2012 तक SIS की ब्रांच 14 से बढ़कर करीब 100 हो गईं। रितुराज सिन्हा आगे चलकर मैनेजिंग डायरेक्टर बने, जबकि कंपनी का कामकाज अपनी ग्रोथ और अधिग्रहण, दोनों के जरिए बढ़ता रहा।
SIS ने पहली बार 2013 में संस्थागत पूंजी जुटाई, जब प्राइवेट इक्विटी फर्म CX Partners ने कंपनी में निवेश किया। इसके बाद कंपनी ने अधिग्रहण की रफ्तार बढ़ाई। 2016 में SIS ने Dusters Total Solutions Services में बहुमत हिस्सेदारी खरीदी, जिससे फैसिलिटी मैनेजमेंट में उसकी मौजूदगी मजबूत हुई।
एक साल बाद, अगस्त 2017 में, SIS के शेयर NSE और BSE पर लिस्ट हुए। IPO ने कंपनी को पब्लिक मार्केट तक पहुंच दी, जबकि अधिग्रहण उसकी विस्तार की रणनीति का अहम हिस्सा बने रहे। लिस्टिंग के बाद SIS ने भारत में SLV Security Services समेत कई कंपनियों में हिस्सेदारी खरीदी, साथ ही न्यूजीलैंड और सिंगापुर में भी कारोबार खरीदे। इन सौदों से कंपनी का भौगोलिक दायरा बढ़ा और सेवाओं का दायरा भी चौड़ा हुआ। भारत में अपनी पकड़ मजबूत करने का सिलसिला भी जारी रहा। 2025 में SIS ने AP Securitas में 51% हिस्सेदारी खरीदी।
₹3,850 करोड़ से करीब ₹16,000 करोड़ तक पहुंचा रेवेन्यू
कंपनी की वित्तीय ग्रोथ उसके कारोबार के विस्तार की तस्वीर दिखाती है। Trcxn पर उपलब्ध वित्तीय आंकड़ों के मुताबिक SIS का कंसॉलिडेटेड रेवेन्यू FY16 में करीब ₹3,850 करोड़ था, जो FY18 में बढ़कर ₹5,800 करोड़ से ज्यादा हो गया। इसके बाद ये ₹10,000 करोड़ का आंकड़ा पार कर गया और आगे के सालों में भी बढ़ता रहा।
कंपनी की ताजा सालाना रिपोर्ट के मुताबिक FY26 में कंसॉलिडेटेड रेवेन्यू करीब ₹16,000 करोड़ रहा। साल के दौरान कंपनी ने करीब ₹717 करोड़ की EBITDA दर्ज की, जबकि कंसॉलिडेटेड मुनाफा करीब ₹138 करोड़ रहा। रेवेन्यू की ये बढ़त हर साल मुनाफे में उसी रफ्तार से नहीं दिखी। मुनाफे में काफी उतार-चढ़ाव रहा है। FY25 में कंसॉलिडेटेड मुनाफा तेजी से गिरा और फिर FY26 में सुधरा। ग्रुप के रेवेन्यू का बड़ा हिस्सा पेरेंट कंपनी से नहीं, बल्कि उसकी सब्सिडियरी कंपनियों और विदेशी कारोबार से आता है।
आज SIS सिक्योरिटी सॉल्यूशंस, फैसिलिटी मैनेजमेंट और कैश लॉजिस्टिक्स के कारोबार में है। कंपनी भारत के साथ ऑस्ट्रेलिया, सिंगापुर और न्यूजीलैंड जैसे विदेशी बाजारों में काम करती है। कंपनी में 3.5 लाख से ज्यादा लोग काम करते हैं। 1970 के दशक में पटना में पूर्व फौजियों को रोजगार दिलाने की जो कोशिश 94, पाटलिपुत्र के 2 कमरों से शुरू हुई थी, वो आज एक लिस्टेड बिजनेस सर्विसेज ग्रुप बन चुकी है।