सेबी एसेट मैनेजमेंट कंपनियों (एएमसी) के सीनियर अफसरों के लिए अपनी ही स्कीम में अनिवार्य निवेश के नियमों में ढील देने जा रहा है। मार्केट रेगुलेटर ने इस बारे में 6 नवंबर को एक कंसल्टेशन पेपर पेश किया है। अभी एएमसी के सीनियर अफसरों को अपने कुल सैलरी पैकेज का 20 फीसदी निवेश उन स्कीमों में करना अनिवार्य हैं, जो उनके तहत आती हैं। अब एएमसी के उन एंप्लॉयीज को इस नियम में रियायत मिलेगी, जिनके कुल सैलरी पैकेज में नॉन-कैश कंपोनेंट की हिस्सेदारी 20 फीसदी से कम है।
इस वजह से नियमों में बदलाव की तैयारी
SEBI ने इस बारे में ईज ऑफ वर्किंग बिजनेस ग्रुप (EODB) से चर्चा के बाद नियमों में बदलाव करने का प्लान बनाया है। दरअसल 20 फीसदी अनिवार्य निवेश के नियम से एंप्लॉयीज के हाथ में आने वाली सैलरी घट जाती है। उधर, एंप्लॉयीज स्टॉक ऑप्शंस (ESOPs) के रूप में दिए जाने वाले नॉन-कैश कंपोनेंट से अतिरिक्त समस्या पैदा होती है। इसकी वजह यह है कि ईसॉप्स सीनियर एंप्लॉयीज को 4-5 साल के वेस्टिंग पीरियड के साथ दी जाती है। इससे पैकेज के एक बड़े हिस्से का लाभ कई साल तक एंप्लॉयी को नहीं मिलता है। उसके बाद स्कीम में 20 फीसदी के निवेश पर भी 3 साल का लॉक-इन लागू होता है। इससे सैलरी पैकेज का एक बड़ा हिस्सा 7-8 साल तक हाथ में नहीं आता है।
कम सैलरी पैकेज वाले एंप्लॉयीज को मिलेगी राहत
एएमसी के कई सीनियर एंप्लॉयीज ईसॉप्स में निवेश के लिए लोन लेते हैं, जिस पर उन्हें टैक्स चुकाना पड़ता है। इस वजह से 20 फीसदी अनिवार्य निवेश के नियम से एंप्लॉयीज पर बोझ काफी बढ़ जाता है। एंप्लॉयीज की मांग रही है कि 20 फीसदी अनिवार्य निवेश के नियम के दायरे से नॉन-कैश कंपोनेंट को बाहर कर दिया जाए। लेकिन, सेबी ने यह पाया कि एंप्लॉयीज के नॉन-कैश कंपोनेंट को हटा देने पर अनिवार्य निवेश वाला अमाउंट काफी घट जाता है। इसलिए सेबी ने अब यह प्रस्ताव पेश किया है कि सिर्फ ऐसे एंप्लॉयीज के नॉन-कैश कंपोनेंट को हटा दिया जाएगा, जिनकी कुल सैलरी पैकेज में नॉन-कैश कंपोनेंट की हिस्सेदारी 20 फीसदी से कम है।
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न्यूनतम निवेश के लिए कई स्लैब बनेंगे
सेबी ने इस कैटेगरी के एंप्लॉयीज के लिए कई स्लैब बनाने की सलाह दी है। यह स्लैब एंप्लॉयीज की ग्रोस सीटीसी पर आधारित होंगे। जिन एंप्लॉयीज के सैलरी पैकेज में नॉन-कैफ कंपोनेंट की हिस्सेदारी 20 फीसदी से ज्यादा होगी, उनके अनिवार्य निवेश के कैलकुलेशन के लिए नॉन-कैश कंपोनेंट को भी सैलरी पैकेज का हिस्सा माना जाएगा। स्लैब का निर्धारण सीटीसी के आधार पर होगा।