SEBI Long Term Derivatives Market: जल्द ही फ्यूचर्स एंड ऑप्शंस मार्केट में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता हैं। सेबी के चेयरमैन तुहिन कांत पांडेय के उस प्रस्ताव को मार्केट एक्सपर्ट्स और पार्टिसिपेंट्स का बड़ा समर्थन मिल रहा है, जिसमें उन्होंने बाजार में लंबी अवधि के F&O कॉन्ट्रैक्ट्स को बढ़ावा देने की बात कही थी। एक्सपर्ट्स का मानना है कि इस कदम से भारतीय कैपिटल मार्केट मजबूत होगा।
हालांकि, बाजार के दिग्गजों का यह भी कहना है कि ये लॉन्ग-टर्म कॉन्ट्रैक्ट्स तभी कामयाब हो सकते हैं, जब लिक्विडिटी, मार्केट मेकिंग, मार्जिन नियमों और संस्थागत निवेशकों की भागीदारी जैसी ढांचागत कमियों को दूर किया जाए। आइए समझते हैं कि लॉन्ग-टर्म F&O को लेकर SEBI का क्या है पूरा प्लान और इसके सामने क्या चुनौतियां हैं।
क्यों है लॉन्ग-टर्म F&O पर सेबी का फोकस?
19 जून 2026 को हुई सेबी की बोर्ड बैठक के बाद एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में चेयरमैन तुहिन कांत पांडेय ने कहा था कि शॉर्ट-टर्म के अलावा लॉन्ग-टर्म डेरिवेटिव्स भी मार्केट में मिलने चाहिए। सेबी इस समय रिटेल निवेशकों के नुकसान को लेकर एक बड़ा स्टडी डेटा जुलाई 2026 में जारी करने वाला है, जिसके बाद डेरिवेटिव मार्केट की समीक्षा की जा रही है। सेबी का मानना है कि लॉन्ग-टर्म कॉन्ट्रैक्ट्स आने से बाजार में केवल सट्टेबाजी नहीं, बल्कि लॉन्ग-टर्म हेजिंग यानी जोखिम प्रबंधन को बढ़ावा मिलेगा।
लंबी अवधि के कॉन्ट्रैक्ट्स के लिए मार्जिन कम करना क्यों जरूरी?
हेज फंड मैनेजर मयंक बंसल के मुताबिक, भारत का मौजूदा मार्जिन फ्रेमवर्क लॉन्ग-टर्म डेरिवेटिव्स को आकर्षक नहीं बनाता। इस समय लंबी अवधि के इंडेक्स डेरिवेटिव्स पर मार्जिन काफी ज्यादा है:
रेगुलर इंडेक्स डेरिवेटिव्स मार्जिन: 9.3%
लॉन्ग-टर्म ऑप्शंस के लिए स्पैन फ्लोर: 17.7% (जो कि काफी ज्यादा है)
एक्सपोजर मार्जिन (ELM): 5%
सेबी के पूर्व होल-टाइम मेंबर अनंत नारायण जी ने भी कहा कि लंबी अवधि के कॉन्ट्रैक्ट्स के लिए मार्जिन नियमों को तर्कसंगत बनाने की गुंजाइश है, लेकिन इसके लिए एक विस्तृत स्टडी और रिव्यू की जरूरत है।
मार्केट मेकर्स और STT पर क्या है एक्सपर्ट्स की राय?
क्रॉस सीज कैपिटल के एमडी राजेश बहेती ने कहा कि इन प्रोडक्ट्स की सफलता के लिए 'डेजिग्नेटेड मार्केट मेकर्स' की जरूरत होगी, जो दोनों तरफ यानी बाय और सेल के कोट्स उपलब्ध करा सकें। इसके लिए उन्हें मिलने वाला इंसेंटिव ट्रांजैक्शन कॉस्ट और STT से ज्यादा होना चाहिए।
एनएमआई के नेशनल प्रेसिडेंट कमलेश श्रॉफ का मानना है कि शुरुआत में इन्हें इंडेक्स डेरिवेटिव्स जैसे- निफ्टी, सेंसेक्स में लागू किया जाना चाहिए क्योंकि इनमें उतार-चढ़ाव कम होता है और मैनिपुलेशन का रिस्क नहीं रहता। बाद में इसे चुनिंदा लिक्विड स्टॉक्स में बढ़ाया जा सकता है।
क्या वीकली एक्सपायरी जैसे वॉल्यूम की बराबरी कर पाएगा लॉन्ग-टर्म?
एक्सपर्ट्स का साफ मानना है कि मार्जिन कम होने के बाद भी लॉन्ग-टर्म कॉन्ट्रैक्ट्स कभी भी वीकली या मंथली कॉन्ट्रैक्ट्स के वॉल्यूम की बराबरी नहीं कर पाएंगे। ऑप्शंस ग्रीक्स के काम करने के तरीके के कारण लॉन्ग-टर्म ऑप्शंस में कम अवधि के मुकाबले प्रति यूनिट कैपिटल पर रिटर्न काफी कम मिलता है। अमेरिका, यूरोप और दक्षिण कोरिया जैसे वैश्विक बाजारों में भी वीकली और शॉर्ट-टर्म कॉन्ट्रैक्ट्स का वॉल्यूम ही सबसे ज्यादा रहता है, जबकि लॉन्ग-टर्म का इस्तेमाल पेंशन फंड्स और एसेट मैनेजर्स अपनी होल्डिंग को हेज करने के लिए करते हैं।
BSE के एमडी और सीईओ सुंदररमन आर ने सेबी के इस कदम का स्वागत किया है। उन्होंने कहा कि बीएसई पहले से ही 'BSE Focused IT Index' और 'Bankex' जैसे लॉन्ग-टर्म सुइट्स पर काम कर रहा है। उन्होंने भी माना कि एसटीटी और मार्जिन फ्रेमवर्क की समीक्षा से इसे तेजी से अपनाने में मदद मिलेगी।